समाज में सद्भाव व आपसी विश्वास का निर्माण करना संघ का कार्य : मोहन भागवत
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समाज में सद्भाव व आपसी विश्वास का निर्माण करना संघ का कार्य : मोहन भागवत

श्री मोहन भागवत ने कहा कि प्रत्येक विकासखंड स्तर पर, विभिन्न जातियों के नेताओं और धार्मिक संप्रदायों के प्रतिनिधियों को महीने में एक बार विचार-विमर्श के लिए मिलना चाहिए

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 8, 2025, 11:46 pm IST
in संघ @100, कर्नाटक
श्री मोहन भागवत

श्री मोहन भागवत

बेंगलुरु, 8 नवंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि संघ का कार्य केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, हमारा लक्ष्य नकारात्मकता से दूर रहकर सकारात्मक विचारों के जरिए समाज में सद्भाव और आपसी विश्वास का निर्माण करना है।डॉ. भागवत संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत यहां आयोजित दो दिवसीय (8 एवं 9 नवंबर) व्याख्यानमाला को संबोधित कर रहे थे। इसका आयोजन यहां के बनशंकरी स्थित पीईएस विश्वविद्यालय में किया गया है।

संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि प्रत्येक विकासखंड स्तर पर, विभिन्न जातियों के नेताओं और धार्मिक संप्रदायों के प्रतिनिधियों को महीने में एक बार विचार-विमर्श के लिए मिलना चाहिए। उन्हें तीन बातों पर विचार करना चाहिए- पहला, उनके समाज के आर्थिक, नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं? दूसरा, समाज के हित के लिए खंड स्तर पर सामूहिक रूप से क्या किया जा सकता है? तीसरा, कमज़ोर वर्गों की मदद के लिए क्या किया जा सकता है? उन्होंने कहा कि ऐसी चर्चाएं नियमित रूप से होने से आपसी विश्वास और एकता की भावना बढ़ेगी। बाहरी लोग मतभेद पैदा नहीं कर पाएंगे। लोगों को विश्वास होना चाहिए कि उनके नेता एक साथ बैठकर सभी के कल्याण के बारे में सोच रहे हैं।

सिर्फ भाषणों से नहीं आएगा सद्भाव

डॉ. भागवत ने कहा कि सद्भाव सिर्फ़ भाषणों से नहीं लाया जा सकता। यह केवल प्रेम और एक-दूसरे के प्रति निकटता की भावना से ही प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे समुदाय हैं जो सदियों से पिछड़े रहे हैं। अगर उन्हें भी समान अवसर चाहिए तो हमें अपना अहंकार त्यागकर उन्हें भी शामिल करना होगा। हमें स्वयं आगे आना होगा, उन्हें भी आगे आना होगा। यही आपसी सहयोग प्रगति का मार्ग है।उन्होंने कहा कि 1857 में मुसलमानों और हिंदुओं ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। बहादुर शाह ज़फर ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया था। इस तरह की एकता ने अंग्रेजों को डरा दिया था। इसीलिए उन्होंने जानबूझकर हमारे समाज में मतभेद बढ़ाए। भले ही हम अब स्वतंत्र हैं, लेकिन उन अवशेषों का अभी भी असर है। हमें फिर से बैठकर उस पर काबू पाने और एक नया अध्याय शुरू करने के लिए चर्चा करने की ज़रूरत है।

‘हिंदू’ शब्द से असहजता महसूस होती है, तो ‘भारतीय राष्ट्र’ कहिए

उन्होंने स्पष्ट किया कि “हम एक राष्ट्र हैं, हिंदू राष्ट्र। अगर आपको ‘हिंदू’ शब्द से असहजता महसूस होती है, तो ‘भारतीय राष्ट्र’ कहिए, लेकिन अर्थ एक ही है, हमारी संस्कृति, हमारी परंपराएं ही राष्ट्र का आधार हैं। राष्ट्र कोई सरकार नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। राजा बदल सकते हैं, लेकिन राष्ट्र तो रहेगा ही।संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि भारत में विभाजन का एक मुख्य कारण हिंदू धर्म का पतन है। सिर्फ़ जनसंख्या ही मायने नहीं रखती, बल्कि उसकी भावना भी मायने रखती है। कुछ मुसलमान भी हिंदू धर्म अपनाते हैं क्योंकि यह एक जीवन शैली है। हमारी राष्ट्रीय पहचान का मूल धर्म में है। इसे सभी तक पहुंचाने के लिए संवाद जरूरी है।सरसंघचालक भागवत ने कहा कि हमने धर्म आधारित ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा के मॉडल बनाने के लिए काम करना शुरू कर दिया है। कुछ जगहों पर हमें सफलता भी मिली है। नए प्रयोगों की ज़रूरत है। समाज में सच्चा सामंजस्य सकारात्मक सोच और प्रेम से ही संभव है।

ये भी पढ़ें – भारत एक हिंदू राष्ट्र है : बेंगलुरु RSS व्याख्यानमाला में भागवत जी ने बताया- हिन्दू होने का अर्थ और उसकी जिम्मेदारी

 

Topics: सरसंघचालकमोहन भागवतआरएसएस के 100 वर्षव्याख्यानमालाराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
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