क्रांतिगीत वंदे मातरम् को भी चाहिए न्याय, कांग्रेस ने किया खंडित करने का पाप
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क्रांतिगीत वंदे मातरम् को भी चाहिए न्याय, कांग्रेस ने किया खंडित करने का पाप

सम्पूर्ण और अखण्डित वंदेमातरम् आज भी राजकीय मान्यता से बाहर है। इसे राष्ट्रगीत का दर्जा तो है, लेकिन उसके केवल एक संक्षिप्त अंश को ही। भारत इस गीत के 150 साल पूरे होने पर इसके मूल स्वरूप को स्वीकार करने की इच्छा और आकांक्षा संजोये है।

Written byसर्वेश कुमार सिंहसर्वेश कुमार सिंह — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 6, 2025, 04:53 pm IST
inभारत
VANDE MATRAM

VANDE MATRAM

वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष हो गए हैं। रोम-रोम देशभक्ति की भावना से पुलकित है। यह सिर्फ गीत नहीं है, यह देशभक्ति का प्रेरणापुंज है, मंत्र है। इसके शब्द, “बीज मंत्रों” से आच्छादित हैं। जब यह अवतरित हुआ तब से आज तक भारत की एकता, विविधता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बना है। गीत ने राजनीतिक दूरियां मिटा दी थीं, उत्तर से दक्षिण तक पूर्व से पश्चिम तक राष्ट्रीय एकता का संदेश और क्रांति की प्रेरणा दी। गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत मां को मुक्त कराने के लिए क्रांति कर दी थी। लाखों युवाओं को क्रांति की मशाल हाथ में थमा दी थी, और वे स्वतंत्रता का लक्ष्य लेकर निकल पड़े थे। आज उसी वंदे मातरम् को न्याय की आवश्यकता है। उसके मूल स्वरूप में स्वीकारोक्ति की आवश्यकता है। राजनीति में तुष्टिकरण के विद्रूप स्वरूप के वशीभूत कांग्रेस ने वंदे मातरम् को खण्डित कर दिया था। राजकीय स्तर पर केवल आरम्भिक दो छन्द ही स्वीकार्य हैं। सम्पूर्ण और अखण्डित वंदेमातरम् आज भी राजकीय मान्यता से बाहर है। इसे राष्ट्रगीत का दर्जा तो है, लेकिन उसके केवल एक संक्षिप्त अंश को ही। भारत इस गीत के 150 साल पूरे होने पर इसके मूल स्वरूप को स्वीकार करने की इच्छा और आकांक्षा संजोये है।

अंग्रेजों के क्रूर शासन में जब भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता खण्डित की जा रही थी। बंगाल के सरकारी अधिकारी बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के हृदय में अंग्रेज सरकार के एक फैसले से क्षोभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने भारत माता की स्तुति में एक गीत लिखने का निश्चय किया। चट्टोपाध्याय ने 7 नवम्बर 1875 को वंदे मातरम् की रचना कर दी। वंदे मातरम् को कांग्रेस के अधिवेशन में प्रथम बार कलकत्ता में 1896 में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने गाया।

इस गीत की यात्रा कई पड़ावों से होकर गुजरी। इस यात्रा में गीत से अनन्य राष्ट्रभक्ति के ज्वार का देशव्यापी प्रसार शामिल है। तो वहीं अंग्रेजों के प्रतिबंध का भी सामना करना पड़ा है, भारत विभाजन की विचारधारा के पोषक वर्ग की मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए इसे खण्डित किया गया। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 28 अक्टूबर 1937 को प्रस्तुत एक रिपोर्ट के बाद इसे खण्डित कर दिया गया। कांग्रेस ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसमें इसके कई महत्वपूर्ण अंशों को काट दिया गया और केवल आरम्भ के दो छन्द ही स्वीकार किये गए। यह सब कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के कारण हुआ। दरअसल रामपुर के अली बन्धुओं का कांग्रेस में काफी दबदबा था। कांग्रेस उन्हें देश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं के रूप में मान्यता देती थी। इन अली बन्धुओं के अनुरोध पर ही कांग्रेस ने खिलाफत आन्दोलन में भाग लेने का फैसला किया था। अली बन्धुओं में छोटे भाई मौलाना मोहम्मद अली जौहर कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उनकी अध्यक्षता में आन्ध्र प्रदेश के काकानाडा में 28 दिसम्बर 1923 से एक जनवरी 1924 तक अधिवेशन हुआ था।

अधिवेशन में परंपरागत रूप से “वंदे मातरम्” गायन होना निश्चित था। इसके लिए प्रख्यात संगीतज्ञ,गायक पंडित विष्णु दिगम्बर पुलस्कर उपस्थित हुए थे। उन्होंने जैसे ही गायन आरम्भ किया तो अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने विरोध किया। उन्होंने गायन रोकने को कहा किन्तु वे नहीं रुके और पूरा गायन किया। क्षुब्ध होकर मौलाना जौहर मंच छोड़कर चले गए। इस विरोध का कांग्रेस के तत्कालीन अन्य नेताओं पर गहरा प्रभाव हुआ। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में धार्मिक एकता बनाए रखने के लिए मौलाना जौहर की मांग पर एक समिति बना दी। इसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर वंदे मातरम् को खण्ड़ित किया गया। इसके साथ ही इसे अनिवार्य गायन से भी मुक्त कर दिया गया। यही खण्डित वंदे मातरम् 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के समकक्ष मान्यता देने का फैसला संविधान सभा के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने सुनाया था।

कांग्रेस ने वह किया जो अंग्रेज भी न कर सके

अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वंदे मातरम् के खण्डित होने के भारत के दर्द को उजागर किया है। उन्होंने 31 अक्टूबर 2025 को एकता नगर (केवडिया) में सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जन्मजयंती पर आयोजित कार्यक्रम में “वंदे मातरम्” के भी 150 वर्ष पूरे होने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने वंदे मातरम् के साथ वह किया जो अंग्रेज भी नहीं कर सके। यानि कि वंदेमातरम् जैसे क्रांतिगीत और अनन्य राष्ट्रभक्ति की प्रेरक प्रार्थना को खण्डित कर दिया।

मोदी जी की इस प्रतिक्रिया के बाद देश को यह उम्मीद बंधी है कि फिर अखण्ड वंदे मातरम् को स्वीकार किया जाएगा। ऐसा करने का यह उचित और सही समय है, यह समय की भी मांग है। आखिर हम क्यों न उस गीत को समग्र रूप में स्वीकार करें, जिसने क्रांति कर दी। लाखों युवाओं के दिलों में क्रांति और देशभक्ति की लौ जला दी। क्या कुछ लोगों के विरोध के कारण हमें मौन बैठे रहना चाहिए ? क्या हम किसी विरोध के भय से हमेशा राष्ट्रीय प्रतीकों के साथ समझौते करते रहेंगे ? आखिर वंदे मातरम् पर समझौता करके भी क्या कांग्रेस ने भारत का विभाजन बचा लिया ? देश के विभाजन के लिये जिम्मेदार “द्विराष्ट्र” का सिद्धान्त क्या वंदेमातरम् की भावना से उपजा था ?

देवबंद दारूल उलूम ने जारी किया था फतवा

जिन लोगों के नाराज होने के डर से वंदे मातरम् को खण्डित किया गया, क्या वे संतुष्ट हो गए थे। क्या उन्होंने खण्डित वंदे मातरम् के दो छंदों को भी कभी स्वीकारा। इस खण्डित वंदे मातरम् के खिलाफ भी देवबंद के दारूल उलूम ने फतवा दिया। इतना ही नहीं 3 नवम्बर 2009 को देवबंद में ही आयोजित जमीअत-उलेमा-ए-हिन्द के अधिवेशन में वंदे मातरम् को नहीं गाने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया। मुरादाबाद और संभल से सांसद रहे डा शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में विरोध किया। उन्होंने दो बार 2013 और 2019 में संसद में इसका विरोध किया। यह सात नवंबर “अखण्ड वंदे मातरम् संकल्प दिवस” बन जाए तो एक बार फिर आनन्द मठ का वंदे मातरम् ही देश में गूंजेगा।

Topics: वंदे मातरमपाञ्चजन्य विशेषवंदे मातरम के 150 वर्षकांग्रेस का पापवंदे मातरम खंडितवंदे मातरम कब रचा गया
सर्वेश कुमार सिंह
सर्वेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार [Read more]
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