कांग्रेस नेता और केरल के तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने ‘इंडियन पॉलिटिक्स आर ए फैमिली बिजनेस’ शीर्षक से लिखे एक लेख में परिवारवाद और वंशवाद की राजनीति पर जोरदार हमला बोला है। प्रोजेक्ट सिंडिकेट में प्रकाशित लेख में उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से गांधी और नेहरू परिवार का नाम लिया है और कहा- परिवारवाद और वंशवाद की राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। भारतीय राजनीति को पारिवारिक व्यवसाय बनाकर रख दिया गया है। वंशवाद की राजनीति ने इस विचार को पक्का कर दिया है कि राजनीतिक नेतृत्व जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है। उन्होंने अपने लेख में परिवारवाद को बढ़ावा देने वाले नेताओं के तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बसपा प्रमुख मायावती ममता का नाम भी लिया है। थरूर लिखते हैं, “ममता बनर्जी और मायावती जैसी महिला नेताओं, जिनका कोई वारिस नहीं हैं उन्होंंने अपने भतीजों को ही अपना उत्तराधिकारी बना दिया है।”
‘परिवारवाद भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा’
कांग्रेस सांसद यही नहीं रूके उन्होंने अपने लेख में देश की सबसे पुरानी पार्टी को लेकर कहा, “दशकों से एक ही परिवार भारतीय राजनीति पर हावी रहा है। नेहरू-गांधी परिवार का असर, जिसमें आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मौजूदा विपक्ष के नेता राहुल गांधी व सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल हैं। भारत की आजादी की लड़ाई इतिहास से जुड़ी हुई है। लेकिन इसने इस विचार को पक्का कर दिया है कि पॉलिटिकल लीडरशिप जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है। भारतीय राजनीति में यह विचार हर पार्टी में, हर क्षेत्र में और हर स्तर पर फैल गया है।”
वंशवाद सिर्फ कांग्रेस तक ही सीमित नहीं
थरूर के अनुसार, वंशवाद सिर्फ कांग्रेस तक ही सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव ठाकरे को पार्टी सौंपी और उनके पोते आदित्य ठाकरे लाइन में हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव आगे आए, जो अब सांसद और पार्टी अध्यक्ष हैं। इसी तरह, बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी के राम विलास पासवान के बाद उनके बेटे चिराग पासवान आगे आए।
अब्दुल्ला परिवार की तीन पीढ़ियों ने सत्ता पर राज किया
कांग्रेस सांसद के शब्दों में, “देश के बाकी हिस्सों में भी वंशवाद की राजनीति जारी है। जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की तीन पीढ़ियों ने राज किया है और मुफ्ती परिवार विपक्ष पर हावी है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (शिअद) का नेतृत्व प्रकाश सिंह बादल से उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल को मिला। इसी तरह तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति (BRS) के संस्थापक के. चंद्रशेखर राव के बच्चों के बीच उत्तराधिकार को लेकर कलह और पारिवारिक विवाद चल रहा है। तमिलनाडु में दिवंगत एम. करुणानिधि का परिवार डीएमके को नियंत्रित करता है, जिसमें बेटे एम.के. स्टालिन मुख्यमंत्री हैं और उनके पोते को वारिस बनाया गया है।
खानदानी विरासत समझ लेने से शासन की गुणवत्ता प्रभावित होती है
‘इंडियन पॉलिटिक्स आर ए फैमिली बिजनेस’ आर्टिकल में कांग्रेस सांसद थरूर आगे लिखते हैं, “वंशवाद की राजनीति कुछ खास परिवारों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, यह गांव की पंचायतों से लेकर संसद के सबसे ऊंचे स्तर तक, भारतीय शासन व्यवस्था में गहराई से जुड़ी हुई है। वंशवादी राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा है। राजनीतिक सत्ता को जब काबिलियत, विश्वास या जमीनी जुड़ाव के बजाय खानदानी विरासत समझ लिया जाता है, तो शासन की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता ही है।”
वंशवाद की जगह योग्यता को महत्व दिया जाए
उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि भारत में वंशवाद और परिवारवाद की जगह योग्यता को महत्व दिया जाए। इसके लिए बड़े सुधारों की आवश्यकता होगी। जैसे,कानून बनाकर नेताओं के लिए समय सीमा तय की जाए। पार्टियों के अंदर भी सही तरह से चुनाव कराए जाएं। साथ ही लोगों को भी जागरूक और ताकतवर करना होगा, जिससे वे नेताओं को उनकी काबिलियत के आधार पर चुन सकें। जब तक भारतीय राजनीति एक पारिवारिक बिजनेस बनी रहेगी, तब तक लोकतंत्र का असली मकसद ,’जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन’ पूरी तरह से पूर्ण नहीं होगा।’
















