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बिहार चुनाव 2025 : सुशासन और उद्यम की नई सुबह

बिहार कभी भारत की सभ्यता और ज्ञान का केंद्र था। नालंदा, वैशाली और मिथिला इसकी सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक थे। लेकिन स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक स्वार्थ, परिवारवाद और संरक्षणवाद ने इस गौरवशाली भूमि को अराजकता में धकेल दिया।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Nov 3, 2025, 08:54 am IST
inसम्पादकीय, बिहार

लालू-राबड़ी शासन के वर्षों ने बिहार को भय और अपमान की परछाई में ढक दिया था। राज्य की सड़कों से लेकर संस्थाओं तक हर जगह अपराध और जातिवाद का बोलबाला था। जनता अपने ही घर में अजनबी बन चुकी थी।
—‘द मेकिंग ऑफ लालू यादव : द अनमेकिंग ऑफ बिहार’, एस. ठाकुर, हार्पर कोलिन्स

राजनीति ने शासन को भ्रष्टाचार का उपकरण बना दिया था। लेकिन जनता ने इतिहास मोड़ दिया-न्याय और जवाबदेही की मांग उठी। यही वह चेतना थी जिसने सुशासन के बीज बोए।
— 2003 की एनसीआरबी की अपराध रिपोर्ट

राज्य के विकास की नींव मानव पूंजी है। सामाजिक असमानता, पलायन और निर्धनता से जूझते बिहार ने 2005 के बाद शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश को नीति का केंद्र बनाया। विकास का नया विमर्श भौतिक निर्माण से सामाजिक पुनर्निर्माण की ओर मुड़ा।
— यूएनडीपी मानव विकास रिपोर्ट 2022

बिहार कभी भारत की सभ्यता और ज्ञान का केंद्र था। नालंदा, वैशाली और मिथिला इसकी सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक थे। लेकिन स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक स्वार्थ, परिवारवाद और संरक्षणवाद ने इस गौरवशाली भूमि को अराजकता में धकेल दिया। 1990 से 2005 के बीच का जंगलराज इस पतन का चरम था। उस दौर में अपराधियों और सत्ता की मिलीभगत ने कानून को मजाक बना दिया। सुगौली शुगर मिल जैसी औद्योगिक इकाइयां बंद हो गईं, मुजफ्फरपुर का सूता पट्टी बाजार वसूली गिरोहों के कारण बर्बाद हो गया और युवाओं का पलायन तेज हो गया। राज्य का ढांचा चरमराने लगा और शासन अविश्वास का पर्याय बन गया।

फिर शुरू हुआ परिवर्तन का दौर। 2005 के बाद बिहार ने सुशासन की नई परिभाषा लिखी। फास्ट ट्रैक न्यायालय, पुलिस आधुनिकीकरण और जवाबदेही आधारित प्रशासन ने अपराध पर अंकुश लगाया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, अपहरण जैसी घटनाओं में 80 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज हुई। सड़क संपर्क 17 प्रतिशत से बढ़कर 92 प्रतिशत हुआ और राज्य का कुल सड़क निवेश 3,200 करोड़ से बढ़कर 64,752 करोड़ रुपये तक पहुंचा। शिक्षा में कॉलेजों की संख्या 75 से बढ़कर 250 से अधिक हो गई और स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड व कौशल विकास मिशन जैसी योजनाओं से लाखों युवाओं को नया अवसर मिला।

यही बदलाव सामाजिक चेतना में भी दिखा। बिहार के युवाओं ने वैश्विक मंचों पर अपनी प्रतिभा का परचम लहराया। पटना के विकास जायसवाल ने ‘लूडोकिंग गेमिंग एप’ को विश्व स्तर तक पहुंचाया, गया के सुजीत कुमार ने ‘उड़ान’ जैसे यूनिकॉर्न की सह-स्थापना की। ये वे चेहरे हैं, जिन्होंने भय और निराशा से निकलकर आत्मविश्वास और नवाचार की कहानी रची।

आज जब दुनिया उथल-पुथल के दौर में है और भारत स्थिरता से आगे बढ़ रहा है, बिहार के लिए यह अवसर है कि वह अपनी स्थिरता को स्थायी दिशा दे। नीति की निरंतरता, कानून का सम्मान और पारदर्शी संस्थागत शासन ही वह मार्ग है जो इस प्रदेश को फिर से भारत के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में लाएंगे। यह वही भूमि है, जिसने कभी ज्ञान और न्याय का प्रकाश फैलाया था और अब वही भूमि फिर से सुशासन और उद्यम की नई सुबह देख रही है। बिहार की यह यात्रा भय से भरोसे और कुशासन से निर्माण की ओर स्थायी परिवर्तन की प्रतीक है।

x @hiteshshankar

Topics: पलायनलालू-राबड़ी शासनgood governanceनिर्धनताअपराधसड़क संपर्कCrimeEnterpriseभ्रष्टाचारउद्यम‘जंगलराज’नई सुबहनवाचारस्थायी परिवर्तनजातिवादcasteismपरिवारवादeducationबिहार चुनाव
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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