अफगानिस्तान, जिसे दुनिया “Graveyard of Empires” कहती रही, भारत के लिए हमेशा एक संस्कृति-संगम और रणनीति-सेतु रहा है। यह भूमि जहां भारत और अफगानिस्तान का रिश्ता भी ऐसा ही है। यह कोई तात्कालिक रणनीति नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों से बहती एक सांस्कृतिक धारा है,जिसमें गांधारी की संवेदना, अशोक का धर्म, बामियान की मूर्तियां, और आधुनिक विकास की परियोजनाएं सब एक सूत्र में बंधी हैं। 1893 में खींची गई डूरंड रेखा ने इस ऐतिहासिक एकता को तोड़ दिया, पर 1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत ने इसे मैत्री और समानता की दृष्टि से पुनर्जीवित किया।
भारत के लिए ईरान का चाबहार बंदरगाह ही नहीं, अफगानिस्तान का वाखान गलियारा भी काफी महत्वपूर्ण है। अमेरिका ने चाबहार पोर्ट पर लगाए गए प्रतिबंधों को छह महीने के लिए हटा दिया है। यह पोर्ट भारत के सहयोग से विकसित हो रहा है। यह भारत, ईरान और अफगानिस्तान के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
आज जब तालिबान की वापसी के बाद दक्षिण एशिया पुनः अस्थिरता से जूझ रहा है, भारत इतिहास की उसी गंधार भूमि से अपनी नयी कूटनीति का सूत्र निकाल रहा है,जहां हथियार नहीं, बल्कि विचार, विकास और विवेक उसकी शक्ति हैं। भारत जानता है कि अफगानिस्तान में स्थिरता के बिना दक्षिण एशिया की शांति, मध्य एशिया की कनेक्टिविटी और वैश्विक सुरक्षा तीनों अधूरी हैं।
वर्तमान परिदृश्य – काबुल में भारत की वापसी
अक्टूबर 2025 भारत-अफगान संबंधों के लिए निर्णायक रहा। अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी की नई दिल्ली यात्रा हुई। भारत ने घोषणा की कि वह काबुल में अपना दूतावास पूर्ण रूप से पुनः सक्रिय करेगा, यह कदम भारत की बिना मान्यता के जुड़ाव (Engagement without ecognition) नीति के अंतर्गत उठाया गया। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा कि हम अफगान जनता के साथ हैं; शासन कोई भी हो, हमारी प्राथमिकता स्थिरता और आतंकवाद-मुक्त क्षेत्र है। यह वक्तव्य भारत की नीति का आधार है व्यवहारिकता के साथ मूल्यों का संतुलन।
भारत के बाद की नीति: मित्रता, विकास और विश्वसनीयता
भारत ने 1950 में अफगानिस्तान के साथ मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए। जवाहरलाल नेहरू ने अफगान नीति को गुटनिरपेक्ष मैत्री का हिस्सा माना। सोवियत आक्रमण (1979) के समय भारत ने गैर-हस्तक्षेप की नीति अपनाई, परन्तु अफगानिस्तान के साथ संपर्क बनाए रखा। 1980 के दशक में भारत काबुल में सांस्कृतिक सहयोग, शिक्षा और चिकित्सा सहायता का केंद्र बना रहा। अमेरिका के नेतृत्व में तालिबान शासन के पतन के बाद भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया। भारत ने वहां न केवल भवन बनाए, बल्कि विश्वास की नींव रखी जैसे संसद भवन (भारत का उपहार), सलमा बाँध ,ज़रंज-डेलाराम हाईवे, विद्यालय, अस्पताल, और टेलीविजन नेटवर्क। भारत ने अफगान छात्रों को छात्रवृत्ति दी, खाद्यान्न सहायता पहुंचाई, और बौद्ध तीर्थों के संरक्षण में भाग लिया। भारत की इन पहलों ने अफगान जनता के मन में भारत के प्रति विश्वास और सम्मान की गहरी छाप छोड़ी। कई अफगान नागरिक भारत में पढ़े, उपचार कराया, और यहां की संस्कृति को अपने समाज का हिस्सा बनाया। 2021 में तालिबान की वापसी के बाद भारत ने बिना मान्यता के मानवीय संपर्क बनाए रखा और 2025 में दूतावास का पुनः सक्रिय होना उसी निरंतरता का परिणाम है।
भारत की नयी दृष्टि – सुरक्षा, कनेक्टिविटी और सहयोग
आतंकवाद को रोकना: भारत के लिए अफगानिस्तान केवल साझेदार नहीं, बल्कि सुरक्षा-दीवार है। काबुल में भारत की उपस्थिति पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी नेटवर्क के लिए चुनौती है। भारत अफगान सुरक्षा एजेंसियों के साथ इंटेलिजेंस-शेयरिंग और काउंटर-टेररिज्म नेटवर्क विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। PoJK, कश्मीर और पंजाब की शांति अफ़ग़ानिस्तान की स्थिरता से सीधे जुड़ी है।
पीओजेके में भारत को सहयोग: अफगान विदेश मंत्री मुत्ताकी ने नई दिल्ली में कहा कि पीओजेके भारत का हिस्सा है; पाकिस्तान ने उस पर अवैध कब्ज़ा किया है। यह वक्तव्य केवल बयान नहीं, बल्कि संकेत था कि अफगानिस्तान अब पाकिस्तान के पक्ष में नहीं, बल्कि स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की ओर बढ़ रहा है। भारत इस परिवर्तन को कूटनीतिक पूंजी के रूप में देख रहा है। यदि अफगानिस्तान भारत के रुख का समर्थन करता है, तो यह पीओजेके पर भारत की वैधता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को मजबूत कर सकता है।
कनेक्टिविटी और व्यापार: भारत की चाबहार से सदाबहार नीति अब केवल बंदरगाह परियोजना नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और भू-राजनीतिक स्वायत्तता का प्रतीक है। इस नीति के लक्ष्य हैं: पाकिस्तान को पार किए बिना व्यापारिक पहुंच। मध्य एशिया और यूरोप तक नए बाजारों की उपलब्धता। भारत इसके माध्यम से ऊर्जा-समृद्ध मध्य एशियाई देशों (उज़्बेकिस्तान, कज़ाख़िस्तान, तुर्कमेनिस्तान) तक पहुंच पाएगा। क्षेत्रीय साझेदारी के माध्यम से साम्राज्यों का कब्रिस्तान (Graveyard of Empires) को आपसी संपर्क का माध्यम (Gateway of Connectivity) में बदलना।
वाखान गलियारा सोने की कड़ी साबित होगा
पीओजेके से पाकिस्तान का अवैध कब्जा हटते ही वाखान गलियारा भारत के लिए सोने की कड़ी साबित होगा। संचार , खनिज रणनैतिक दृष्टिकोण से यदि भारत-अफगान सहयोग से यह मार्ग सक्रिय हुआ, तो भारत की भौगोलिक सीमाएं विचारों और व्यापार दोनों में विस्तारित हो जाएंगी।
यह भी संभव हो सकता है रूस भारत के साथ अफगान नीति में साझा हित देख रहा है। यदि रूस भारत–ईरान–अफगान गलियारे में सक्रिय भाग लेता है, तो यह CPEC का रणनीतिक विकल्प और भारतीय सिल्क रूट की नींव बन सकता है।
अफगानिस्तान केवल पड़ोसी नहीं
भारत अब अफगानिस्तान को केवल पड़ोसी नहीं, बल्कि एशिया के द्वार के रूप में देखता है। चाबहार से अफगानिस्तान, वहां से तुर्कमेनिस्तान, ईरान, कजाखिस्तान और रूस तक एक वैकल्पिक व्यापारिक गलियारा भारत को मध्य-पूर्व और यूरोप के बाज़ारों तक सीधी पहुंच देगा। यह मार्ग न केवल वस्त्र, ऊर्जा और तकनीकी व्यापार का होगा, बल्कि राजनयिक प्रभाव का मार्ग भी बनेगा जहाँ भारत अपने विकास-आधारित नेतृत्व का प्रदर्शन करेगा।
चुनौतियां – जो सामने खड़ी हैं
आतंकवादी संगठन जैसे ISIS-K, अल-कायदा और हक्कानी नेटवर्क अब भी सक्रिय हैं, जो भारत की सुरक्षा के लिए गहरी चिंता का विषय हैं। चीन-पाकिस्तान धुरी भारत की बढ़ती सक्रियता को रोकने का प्रयास कर रही है, जबकि अफगानिस्तान की आर्थिक अस्थिरता निवेश को जोखिमपूर्ण बनाती है। इसके साथ ही महिलाओं, अल्पसंख्यकों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध भारत की मानवीय नीति के लिए नैतिक परीक्षा हैं। इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को संतुलित कूटनीति, बहुपक्षीय सहयोग, सुरक्षा-साझेदारी और सॉफ्ट पावर के विवेकपूर्ण उपयोग से स्थिरता, शांति और क्षेत्रीय संतुलन की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

















