उत्तराखंड का इगास पर्व: वीर माधो सिंह की विजय से भगवान राम की घर वापसी तक की तीन प्राचीन मान्यताएं
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उत्तराखंड का इगास पर्व: वीर माधो सिंह की विजय से भगवान राम की घर वापसी तक की तीन प्राचीन मान्यताएं

उत्तराखंड में इगास या बूढ़ी दिवाली का त्योहार दिवाली के 11 दिन बाद मनाया जाता है। गढ़वाल-कुमाऊं की तीन रोचक मान्यताएं: माधो सिंह भंडारी की युद्ध-विजय, पांडवों की घर वापसी और राम की अयोध्या लौटने की देरी।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by कुलदीप सिंह
Nov 1, 2025, 11:16 am IST
inउत्तराखंड
Igas Diwali

प्रतीकात्मक तस्वीर

देहरादून: उत्तराखंड में इगास या बूढ़ी दिवाली का पर्व एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो दिवाली के 11 दिन बाद मनाया जाता है। इस पर्व से जुड़ी तीन अलग-अलग मान्यताएं हैं।

1. वीर माधो सिंह भंडारी की युद्ध-विजय: गढ़वाल मंडल में इगास को वीर माधो सिंह भंडारी की युद्ध-विजय से जोड़ा जाता है। माधो सिंह भंडारी तिब्बत के सरदारों से युद्ध लड़ रहे थे और दिवाली तक नहीं लौट पाए थे। जब उनकी विजय की खबर आई, तो लोगों ने एकादशी के दिन दिवाली मनाई, जो आगे चलकर इगास बग्वाल के रूप में प्रचलित हो गई।

2. पांडवों की विजय और घर वापसी: कुमाऊं मंडल में इगास को पांडवों की विजय और घर वापसी के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि पांडव युद्ध जीतकर अपने घर लौटे थे और लोगों ने दीप जलाकर उनकी विजय का जश्न मनाया था।

3. राम के अयोध्या लौटने की खबर देर से पहुंची थी: एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब भगवान राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे, तो पहाड़ों तक यह खबर 11 दिन की देरी से पहुंची। इस खुशी में लोगों ने दीप जलाकर इगास मनाया, जो आगे चलकर बूढ़ी दिवाली के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

वर्तमान में गढ़वाल में इगास पर्व को इसी परंपराओं से जोड़ कर देखा जाता है।

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