गत दिनों हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय में ‘राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने किया। इस अवसर पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, पूर्व सांसद और पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक श्री तरुण विजय, प्राच्यम स्टूडियोज के सीईओ श्री प्रवीण चतुर्वेदी, सुदर्शन चैनल के मुख्य संपादक श्री सुरेश चव्हाणके, पूर्व सूचना आयुक्त श्री उदय माहूरकर सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित थे। दिनभर चले इस सम्मेलन में कुल पांच सत्र हुए, जिनमें वक्ताओं ने भारत को विकसित बनाने में मीडिया के योगदान की चर्चा की।
उद्घाटन सत्र में श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में मीडिया की विशेष भूमिका है। मीडियाकर्मियों को अपने देश व धर्म की सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता के समय में भी हमारे नायकों ने मीडिया के कई माध्यमों का उपयोग किया और जनजागरण में मीडिया की उपयोगिता सिद्ध की। उन्होंने कहा कि देश के स्वाधीन होने के पश्चात जो मानसिक स्वतंत्रता चाहिए थी, वह अभी भी नहीं है। ऐसे में देश के अंदर राष्ट्रवादी पत्रकारिता और सशक्त मीडिया की आवश्यकता महसूस होती है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत की महान विभूतियों ने, देश के जननायकों ने मीडिया को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक शस्त्र मानकर चलाया था। देश की विभिन्न विभूतियों ने भिन्न-भिन्न भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया था। आज के मीडिया को उस कालखंड को भी ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि उस समय पत्रकारिता में बड़ा जोखिम था। फिर भी उन लोगों ने उस समय पत्रकारिता की।
देश के स्वतंत्र होने के पश्चात मीडिया जगत में एक नई दिशा आई। फिर आपातकाल के समय सभी प्रकार के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया। उस समय अग्रलेख और संपादकीय सरकार के समर्थन में लिखने पड़ते थे। यदि कोई सरकार के विरुद्ध लिखता था, तो दूसरे दिन उसके दफ्तर में ताला लगा दिया जाता था, उसे जेल में डाल दिया जाता था। उस समय लालकृष्ण आडवाणी जी ने कहा था, ‘सरकार ने मीडिया से कहा कि थोड़ा झुको, लेकिन कुछ मीडिया वाले रेंगने लगे।’ इसके बावजूद उस समय के कुछ पत्रकार आपातकाल के विरोध में खड़े रहे।
आपातकाल के पश्चात खोजी पत्रकारिता शुरू हुई। इस कारण भ्रष्टाचार, बंधुआ मजदूरी, शोषण जैसी हरकतों को रोकने में सफलता मिली। लेकिन लालच की प्रवृत्ति के कारण कुछ पत्रकार गलत काम करने लगे और पत्रकारिता बदनाम हुई। वहीं इसके साथ ही दूसरी तरफ ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी, जो कलम का उपयोग व्यापार के लिए करने लगे। कलम की ताकत से किसी को भी दबाने, गुमराह करने लगे। इसके बाद समाज के सामने पत्रकारिता के लिए प्रश्न खड़ा हो गया। उन्होंने कहा कि पत्रकार सत्य को समाज के सामने लाने के लिए है।
पत्रकार राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाए। उन्होंने कहा कि जब से पत्रकारिता व्यावसायिक हुई है, तब से उसकी मूल भावना खत्म हो गई है, उसकी दिशा बदल गई है। फिर भी कुछ पत्रकारों ने पत्रकारिता के मूल्यों को बचा रखा है। पत्रकारिता व्यापार नहीं है, बल्कि यह एक साधना है, योग है, यह राष्ट्र के प्रति धर्म है।
डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि पत्रकारों को संवेदनशील होना चाहिए और वे ऐसी खबरों का ही विस्तार करें, जो समाज व राष्ट्र के विकास में सहायक हो। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह से आसुरी प्रवृत्ति, अनीति और भ्रष्टाचार ने अपना पैर पसारा है, उसे अब जड़ से मिटाने का समय आ गया है। श्री तरुण विजय ने कहा कि आज हर हाथ में मोबाइल है। कोई भी खबर मिनट भर में फैल जाती है। इसका उपयोग समाज-हित में कैसे किया जाए, इसका ध्यान रखना चाहिए।
तीन दिवसीय इस सम्मेलन में मीडिया से जुड़े अनेक विषयों पर मंथन हुआ। विशेष बात यह रही कि इस सम्मेलन में देशभर के अनेक पत्रकार, बुद्धिजीवी और साहित्यकार शामिल हुए।

















