Bihar Chunav 2025: लालू यादव के शासनकाल में बिहार की सड़कों की जो दुर्दशा हुई, या सच कहें तो जिसने भी देखी, या झेली, वो आज भी उसकी कहानियां सुनाता होगा। 1990 में एक ही स्टोरी के दौरान इस रिपोर्टर के कैमरा क्रू को अलग-अलग टैक्सियों के 13 टायर पंक्चर होने का सामना करना पड़ा। उस “ऑपरेशन झेलो” का मुख्य कारण टूटी हुई सड़कें थीं। कुछ जगहों पर खतरनाक दरारें, गड्ढे और दलदल थे।
टूटी सड़कें, थकी सवारियां
वास्तविकता यह थी कि टैक्सी के टायर उन सड़कों पर चलने से घिस गए थे।बिहार की सड़कों पर यात्रा करने से न केवल टायर, बल्कि पहियों का संरेखण भी खराब हो गया।टैक्सी ड्राइवरों के पास न तो बार-बार टायर बदलने के पैसे थे और न ही हर ट्रिप के बाद पहियों का अलाइनमेंट ठीक करवाने के। उन दिनों पंक्चर ठीक करने वाले लोग सबसे अधिक पैसा कमाते थे। वो ऐसा निराला समय था जब हर यात्री को हर कार यात्रा में घुड़सवारी जैसा अनुभव होता था। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव जानते थे कि उनके शासन में सड़क यात्रा कितनी कठिन थी, और उनके राज्य के गांव कितने अलग-थलग थे। खराब सड़कें वास्तव में बिहार और विकास के बीच बाधा थीं।
निरीक्षण के शोर में दब गया सुधार का सच
सड़कों की कमी के कारण बच्चों को स्कूल और कॉलेज पहुंचने में कठिनाई होती थी, मरीजों को अस्पताल पहुंचने में अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता था, तथा व्यापारियों को अपना व्यवसाय चलाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। लालू यादव की खासियत यह थी कि वे कभी-कभी सरकारी हेलीकॉप्टर से अचानक किसी खेत में उतर जाते थे, पैदल ही सड़क का औचक निरीक्षण करते थे और अधिकारियों को फटकार लगाते थे। वहां मौजूद फोटोग्राफरों ने लालू के एंग्री यंग मैन जैसे प्रदर्शन को कैमरे में कैद कर लिया और उसे अखबारों में प्रकाशित कर दिया। मौके पर मौजूद सरकारी कर्मचारी ‘द-बॉस-इज-ऑल्वेज -राईट’ के फलसफे के अनुसार अपने मुख्यमंत्री का प्रवचन सुन कर, उनके लौट जाने के बाद, पुनः सामान्य जीवन व्यतीत करने में लग जाते थे। ‘चलती का नाम गाड़ी’ के सिद्धांत पर सन् 1990 से 2005 तक लालू यादव का ये कुशासन चला।
बदली सड़कों की तस्वीर, बढ़ा बिहार का सफर
2005 के बाद से सड़कों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। 20,000 करोड़ रुपये की लागत से 36,000 किलोमीटर से अधिक ग्रामीण सड़कों के निर्माण से ग्रामीण बच्चे आसानी से अपने स्कूल जा सकेंगे। गावों का कस्बों से जुड़ना किसानों को मंडियों तक अपने उत्पादों को पहुँचाने का मौका देता है। मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस का उपयोग बहुत आसान हो गया है। हर तरह से गांव की सड़कें जन-जीवन, संपत्ति और विकास के लिए वरदान साबित हो रही हैं।
मोदी-नीतीश काल में बिहार में लगभग चार लाख करोड़ रुपये की लागत से राजमार्गों, पुलों और ग्रामीण सड़कों का निर्माण एक ऐतिहासिक परिवर्तन है। 6-लेन राजमार्गों, 4-लेन राजमार्गों, पुलों, सड़क चौड़ीकरण और सड़क मरम्मत के निर्माण से अकल्पनीय अंतर आया है।आज बिहार में कहीं भी यात्रा करने पर 2 से 5 घंटे के समय की बचत होती है। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार को जोड़ने के लिए गंगा नदी पर चार पुल बनाए गए हैं तथा 10 नए पुलों का निर्माण किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, मुख्यमंत्री ग्राम संपर्क योजना, अनुरक्षण नीति, पुल निर्माण योजना और ग्रामीण सड़क उन्नयन योजना के तहत सड़क विकास से बिहार के शहरों और गांवों में महत्वपूर्ण पूंजी निवेश आ रहा है।

















