झारखंड (तब बिहार) के गुमला जिले के लिटाटोली में जन्मे बाबा कार्तिक उरांव ने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया, बल्कि जब देश को उनकी आवश्यकता पड़ी तो क्षणिक देर किए बगैर अपने स्थापित सुनहरे भविष्य को त्याग कर स्वदेश लौट आए और हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (एचईसी) में अपनी सेवा देने लगे। जब उन्हें लगा कि एचईसी की सेवा से देश की जनजातियों के हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी, तो राजनीति में चले आए। विधायक, सांसद से लेकर केंद्रीय मंत्री तक की यात्रा पूरी की। डॉ. उरांव का व्यक्तित्व ऐसा था कि पक्ष-विपक्ष दोनों ही बड़े सम्मानपूर्वक उनका नाम लेते थे। संसद में जब वे बोलते थे, तो सभी सदस्य बहुत ध्यान से उनकी बातों को सुनते थे। एक मौका ऐसा भी आया जब उन्होंने जनजातीय समाज के हितों की रक्षार्थ अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी। राजनीतिक शुचिता और आर्थिक पारदर्शिता के प्रतीक कार्तिक बाबा का जब देहावसान हुआ तब उनके बैक खाते में मात्र 26 रुपये थे।
बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी डॉ. कार्तिक का जन्म 29 अक्टूबर 1924 को हुआ था। इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका से उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। तमाम विपरीत परिस्थतियों के बावजूद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया। उस समय के सबसे बड़े एटॉमिक पावर स्टेशन, हिंकले प्वाईंट का प्रारूप तैयार किया। दुनिया उन्हें काला हीरा के नाम से जानती है। डॉ. कार्तिक उरांव पहले ऐसे राजनेता थे, जिनके पास अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) की नौ डिग्रियां थीं। अत्यंत सम्पन्न जीवन का भविष्य होते हुए भी उन्होंने समाज की पीड़ा को समझा और जनजाति समाज के दुःखों को दूर करने के लिए सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। 1967 में वे लोहरदगा से लोकसभा के लिए चुने गए।
वे केन्द्र सरकार में मंत्री भी रहे। जनप्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के दौरान उन्होंने जनजातीय समाज की समस्याओं को काफी निकट से देखा। चर्च एवं मिशनरी संस्थाओं द्वारा भोले-भाले जनजातीय लोगों के मतांतरण ने उन्हें व्यथित कर दिया। उन्होने देखा कि कैसे जनजातीय समाज के मतांतरित लोग आरक्षण का लाभ ले रहे हैं और वे मूल जनजातीय समाज के लोगों को अपने अधिकारों से वंचित कर रहे हैं। जनजातीय समाज के लोगों के साथ हो रहे इस अन्याय को लेकर वे दुःखी हो गए।
धोखे को देश के सामने लाने वाले
स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् जनजातीय समाज जिस आवाज को ढूंढ रहा था, डॉ. कार्तिक उरांव न केवल उनकी आवाज बने बल्कि संपूर्ण समाज के शैक्षणिक, सांस्कृतिक उत्थान के साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के अथक प्रयास किए। उन्होंने जनजातीय समाज के साथ हो रहे धोखे को उजागर किया और समाज के हितों की रक्षा के लिए लिए सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष किया। उनका मानना था कि मतांतरित हुए जनजातीय लोग, जो अपनी संस्कृति-परंपरा, आस्था-विश्वास, रीति-रिवाज से कट कर विदेशी संस्कृति अपना लेते हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। संसद में रहते हुए उन्होंने लगातार जनजातियों के हित में प्रखर आवाज उठाई और उन्हीं के प्रयत्नों से संसद द्वारा 1968-69 में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया गया और उसकी अनुशंसाओं के आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक 1969 संसद में प्रस्तुत किया गया। कार्तिक उरांव का यह 20 वर्ष का अनुभव था कि मतांतरित जनजाति सदस्यों द्वारा सारी संवैधानिक सुविधाएं हड़प लिए जाने के कारण वास्तविक जनजातियों के लिए यह ‘20 वर्ष की अवधि : एक काली रात’ के समान है और इसी काली रात के अंधेरे से निकालकर जनजाति समाज को उनके अधिकारों और सुविधाओं को दिलाकर विकास की नई रोशनी में लाना होगा।
अपनी ही सरकार से भिड़े
बाबा कार्तिक उरांव ने जनजातीय समाज की परिस्थिति का चित्रण तीन भागों में किया— पहला, भारतीय संविधान के लागू होने के पूर्व का काल अर्थात् 1950 के पूर्व का काल। दूसरा, संविधान लागू होने के पश्चात् अर्थात् 1950 से उनके जीवन के काल तक और तीसरा, जनजातीय समाज के आने वाले कल की परिस्थिति। संविधान में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति दोनों वर्गों के लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान है। अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को सामाजिक भेदभाव के कारण आरक्षण की सुविधा मिली है, जबकि अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को रीति—रिवाज, संस्कृति व परंपरा को बचाए रखने के लिए उन्हें भी आरक्षण का लाभ दिये जाने का प्रावधान है। यदि अनुसूचित जाति वर्ग का कोई व्यक्ति मतांतरित हो जाता है तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इस बात का प्रावधान संविधान में है। लेकिन यदि कोई अनुसूचित जनजाति वर्ग का व्यक्ति मतांतरित हो जाता है तो उसे आरक्षण का लाभ मिलता रहता है।
वास्तव में इसे संविधान की विसंगति ही कही जाएगी। जनजातीय समाज में सभी रीति-रिवाज, सामाजिक व्यवस्था एवं पारंपारिक उत्सव आदि अपने आराध्य देवी-देवता एवं देव स्थान के प्रति आस्था व विश्वास के प्रति आधारित होते हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ मतांतरित लोग अपनी संस्कृति, आस्था, परंपरा को त्याग कर ईसाई या मुसलमान हो गये हैं, और ये लोग इन सुविधाओं का 80 प्रतिशत लाभ मूल जनजाति समाज से छिन रहे हैं। डॉ. कार्तिक उरांव ने इस बात को भलीभांति अनुभव किया। इस बात ने उन्हें काफी व्यथित कर दिया। उनका दुःख देश भर के जनजातीय समाज का दुःख था। देश भर में जनजातीय समाज द्वारा झेले जा रहे इस अन्याय का उन्होंने विरोध किया। संविधान की इस भयानक विसंगति को लेकर उन्होंने देश भर में एक बड़ी बहस खड़ी की।
डॉ. कार्तिक उरांव ने 10 नवंबर, 1970 को 348 संसद सदस्यों (322 लोकसभा से और 26 राज्यसभा से) के हस्ताक्षरयुक्त एक ज्ञापन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सौंपा जिसमें संयुक्त संसदीय समिति की उक्त संस्तुति को स्वीकार करने की मांग की गई, परंतु सरकार इस विषय पर बहस कराने का साहस नहीं दिखा पाई। तमाम विरोध के पश्चात् 16 नवंबर, 1970 को सरकार इस विषय पर चर्चा करने को तैयार हुई। 16 नवंबर को लोकसभा में बहस शुरू हो गई और 17 नवंबर, 1970 को भारत सरकार की ओर से एक संशोधन प्रस्तुत किया गया कि विधेयक में से संयुक्त संसदीय समिति की उस संस्तुति को हटा लिया जाय, जो समस्त जनजातीय समाज के हितों पर वज्राघात के समान था। इस पर भी कार्तिक बाबू ने हार नहीं मानी और 24 नवंबर, 1970 को लोकसभा में जोरदार बहस करते हुए संयुक्त संसदीय समिति की संस्तुति को मंजूर करने की पुरजोर मांग की।
वे इतने ‘भावुक हो गए कि उन्होंने सरकार से कहा कि या तो आप इस संयुक्त संसदीय समिति की संस्तुति को वापस लेने की बात को हटा दें या मुझे इस दुनिया से हटा दें। इस पर सभी संसद सदस्यों ने संयुक्त संसदीय समिति की संस्तुति का साथ दिया। ऐसी परिस्थिति में सरकार ने बहस को स्थगित कर दिया और आश्वासन दिया कि बहस उसी सत्र के अंत में की जाएगी। परंतु दुर्भाग्य से ऐसा न हो सका क्योंकि 27 दिसंबर, 1970 को लोकसभा भंग हो गई और इसी के साथ जनजातीय समाज के उत्थान और कल्याण का और उन पर हो रहे भीषण अन्याय को दूर करने का सुनहरा अवसर चला गया। यदि वह संस्तुति मंजूर हो जाती और संविधान में जनजातियों की परिभाषा में ईसाई एवं इस्लाम में मतांतरित लोगों का जनजातीय स्टेट्स निरस्त हो जाता तो अपनी संस्कृति और पहचान की रक्षा करने वाला स्वाभिमानी और देशभक्त जनजातीय समाज इस अन्याय से बच जाता।
आज पांच दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुआ है। आज भी यह अन्याय लगातार जारी है। बाबा कार्तिक उरांव आज नहीं हैं, लेकिन उनका दर्द यानी पूरे जनजातीय समाज का दर्द वैसे का वैसा बना हुआ है।
(लेखक सुपरिचित पत्रकार एवं जनजातीय मामलों के अध्येता हैं।)

















