प्राचीन काल से ही हरियाणा की माटी वीरों की जननी स्थल रही है। इस धरती ने ऐसे अनेक सपूत पैदा किए हैं, जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर धर्म और देश का मान बढ़ाया। इन्हीं महान् सपूतों में से एक थे अमर बलिदानी दादा कुशाल सिंह दहिया जी। उनका जन्म सोनीपत जिले के गाँव गढ़ी (जो बाद में बढख़ालसा कहलाया) में हुआ। बचपन से ही वे निडर, साहसी और धर्मपरायण थे। जीटी रोड राजमार्ग पर स्थित सोनीपत के गांव बढख़ालसा का इतिहास भी गुरु तेग बहादुर से जुड़ा हुआ है।
गुरु तेग बहादुर का शहीदी संग्राम
क्रुर मुगल शासक औरंगजेब ने इस्लाम कबूल न करने पर भाई सती दास, भाई मती दास और भाई दयाला को बलिदान कर दिया। 22 नवंबर को औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर का भी शीश कटवा दिया और उनके पवित्र पार्थिव शरीर की बेअदबी करने के लिए शरीर के चार टुकड़े कर के उसे दिल्ली के चारों बाहरी गेटों पर लटकाने का आदेश दे दिया, लेकिन उसी समय अचानक आये अंधड़ का लाभ उठाकर एक स्थानीय व्यापारी बंजारा लक्खी शाह गुरु जी का धड़ और भाई जैता जी, गुरु जी का शीश उठाकर ले जाने में कामयाब हो गए।
लक्खी शाह और भाई जैता की सूझबूझ
लक्खी शाह ने गुरु जी के धड़ को अपने घर में रखकर उसे अग्नि के हवाले करके गुरु जी की चिता के रूप में जला दिया। लक्खी शाह बंजारा की समझदारी और त्याग से गुरु जी के शरीर को बेअदबी होने से बचा लिया। इधर भाई जैता जी ने गुरूजी का शीश उठा लिया और उसे कपड़े में लपेटकर अपने कुछ साथियों के साथ आनंदपुर साहिब को चल पड़े। औरंगजेब ने उनके पीछे मुगल सेना लगा दी और आदेश दिया कि किसी भी तरह से गुरु जी का शीश वापस दिल्ली लेकर आओ। भाई जैता जी किसी तरह बचते-बचाते सोनीपत के पास बढख़ालसा गांव में (जो पंजाब जाते हुए जीटी रोड सोनीपत जिले में स्थित हैं) पहुंच गए।
गांववालों का स्वागत और कुशाल सिंह की भूमिका
मुगल सेना भी उनके पीछे लगी हुई थी। वहां के स्थानीय निवासियों को जब पता चला कि गुरु जी ने बलिदान दे दिया है और उनका शीश लेकर उनके शिष्य उनके गाँव में आये हुए हैं तो सभी गाँव वालों ने उनका स्वागत किया और शीश के दर्शन कर श्रद्धा अर्पित की। चौधरी कुशाल सिंह दहिया को जब पता चला तो वे भी वहां पहुंचे और गुरु जी के शीश के दर्शन किये और बड़ा दुख जताया। उधर अब मुगलों की सेना भी गांव के पास पहुंच चुकी है।
वीर कुशाल सिंह का साहसिक निर्णय
गांव के लोग इकट्ठा हुए और सोचने लगे कि क्या किया जाए? मुगल सैनिकों की संख्या और उनके हथियारों को देखते हुए गांव वालों द्वारा मुकाबला करना आसान नहीं था। तब “दादा कुशाल सिंह दहिया” ने आगे बढ़कर कहा कि – सैनिकों से बचने का केवल एक ही रास्ता है कि गुरुजी का शीश मुग़ल सैनिकों को सौंप दिया जाए। इस पर एक बार तो सभी लोग गुस्से से “चौधरी कुशाल” को देखने लगे। लेकिन उन्होंने आगे कहा – आप लोग ध्यान से देखिये गुरु जी का शीश, मेरे चेहरे से कितना मिलता-जुलता है। उनकी आयु, शक्ल और दाढ़ी गुरु तेगबहादुर से हुबहू मिल रही थी।
बलिदान का अद्भुत उदाहरण
बिना वक्त बर्बाद किये उन्होंने कहा कि अगर आप लोग मेरा शीश काट कर, उसे गुरु तेग बहादुर जी का शीश कहकर, मुगल सैनिकों को सौंप देंगे तो ये मुग़ल सैनिक शीश को लेकर वापस लौट जायेंगे। तब गुरु जी का शीश बड़े आराम से आनंदपुर साहिब पहुँच जाएगा और उनका सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो जाएगा। उनकी इस बात पर चारों तरफ सन्नाटा फ़ैल गया। सब लोग स्तब्ध रह गए कि – कैसे कोई अपना शीश काटकर दे सकता है? पर वीर कुशाल सिंह फैसला कर चुके थे, उन्होंने सबको समझाया कि – गुरु तेग बहादुर को हिन्द की चादर कहा जाता हैं, उनके सम्मान को बचाना हिन्द का सम्मान बचाना है।
बेटे के हाथों दिया गया बलिदान
फिर दादा कुशाल सिंह ने अपने वंशजों अपने बड़े बेटे के हाथों से अपना सिर कटवाकर थाली में रख कर गुरु शिष्यों को दे दिया। एक बेटा धर्म रक्षा के लिए अपने बाप का सिर काटे, ऐसी मिसाल देखने तो क्या सुनने को भी नहीं मिलती। लेकिन ऐसे महावीर बलिदानियों को भुला दिया गया। आज गुरु तेग बहादुर सिंह का 350 वा बलिदान दिवस मनाया जा रहा है, प्रकाश पर्व भी है ऐसे में हमें दादा कुशाल सिंह को भी नहीं भूलना चाहिए, उनकी शहादत को भी 350 वर्ष हो रहे है।
गुरु जी के शीश की सुरक्षित यात्रा
जब मुगल सैनिक गाँव में पहुंचे तो उनके शिष्य दोनों शीश को लेकर वहां से निकल गए। भाई जैता जी गुरु जी का शीश लेकर तेजी से आगे निकल गए और जिनके पास बाबा कुशाल सिंह दहिया का शीश था, वे जानबूझकर कुछ धीमे हो गए। मुग़ल सैनिकों ने उनसे वह शीश छीन लिया और उसे गुरु तेग बहादुर जी का शीश समझकर दिल्ली लौट गए। इस तरह धर्म की खातिर बलिदान देने की भारतीय परम्परा में एक और अनोखी गाथा जुड़ गई।
गढ़ी दहिया और बढ़ख़ालसा का महत्व
जहाँ दादा वीर कुशाल सिंह दहिया ने अपना बलिदान दिया था उसे “गढ़ी दहिया” तथा “गढ़ी कुशाली” भी कहते हैं। चाटुकार लेखकों, इतिहासकारों और सरकारों ने “दादा वीर कुशाल सिंह दहिया” तथा इस स्थान को कोई महत्त्व नहीं दिया। ऐसा वीर आज तक नहीं हुआ जो अपने ही बेटे को अपना सर काटने का भरी पंचायत में आदेश दे और बेटा बिना हिचक उस आदेश का पालन करे।
हरियाणा सरकार का स्मारक और म्यूजियम
हरियाणा सरकार ने अब उस स्थान पर एक म्यूजियम बनवाया है और वहां पर महाबलिदानी अमर वीर चौधरी कुशाल सिंह दहिया (कुशाली) के स्मारक को स्थापित किया है। संपूर्ण विश्व से सिख श्रद्धालु यहां दर्शनों के लिए आते हैं। यह स्थान सोनीपत जिले में बढख़ालसा नामक स्थान पर है, जहां गुरुद्वारा बना हुआ है, आदमकद प्रतिमा और शिलालेख चीख-चीख कर इस महान बलिदान की अमर गाथा की गवाही देते नजर आ जायेंगे।
राज्यस्तरीय कार्यक्रम और स्मृति संरक्षण
जो सिंघु बार्डर से थोड़ी ही दूर है। 14 नवंबर 2025 को हरियाणा सरकार कुशाल सिंह दहिया जी की स्मृति में राज्यस्तरीय कार्यक्रम का आयोजन करने जा रही है जिससे उनके त्याग एवं बलिदान की गाथा जन-जन तक पहुंच सके। कालांतर में दशम गुरु महाराज श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने इस गढ़ी को नया नाम दिया, बढख़ालसा। उस हवेली में, जहां दादा कुशाल सिंह दहिया ने अपना शीश दिया, आज एक भव्य गुरुघर स्थापित है। यहाँ हर साल दादा कुशाल सिंह दहिया की याद में मेला लगता है।

















