देहरादून । उत्तराखंड राज्य स्थापना के रजत जयंती वर्ष में पहुंच रहा है और इन 25 सालों में देवभूमि की सबसे बड़ी समस्या राज्य की बदल रही डेमोग्राफी एक बड़ी समस्या बन रही है जो बीते सालों में गुपचुप तरीको से बढ़ती रही और अब ये नासूर बनती जा रही है।
उत्तराखंड की बीजेपी सरकार ने भी इस समस्या को गंभीरता से समझ लिया है, खबर है कि डेमो ग्राफी चेंज को रोकने के लिए राज्य सरकार संकल्प तो ले रही है किंतु उसका परिणाम आने अभी बाकि है।
देवभूमि उत्तराखंड की पड़ोसी हिमालय राज्य
हिमाचल प्रदेश की स्थापना 1971 में हुई तब से लेकर अब तक मुस्लिम आबादी दो प्रतिशत के ही आसपास है। हिमाचल में सशक्त भू कानून की वजह से मुस्लिम आबादी ने विस्तार हो नही पाया और यही वजह है कि आजतक कोई मुस्लिम विधायक विधानसभा में नही पहुंच पाया।
जबकि उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी सोलह प्रतिशत से अधिक होजाने का अनुमान है और मैदानी जिलों ये आबादी 34 प्रतिशत तक होने जा रही है। जानकारी के मुताबिक 2000 में उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में मुस्लिम आबादी डेढ़ प्रतिशत के आसपास थी।
उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी असम के बाद सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ी है। इस बढ़ती आबादी को राज्य में जनसंख्या असंतुलन की समस्या माना जा रहा है।
उत्तराखंड के मैदानी जिलों की सामाजिक और राजनीतिक समीकरण ऐसे हो गए है कि यहां मुस्लिम वोट निर्णायक हो जायेंगे और अब यहां बीजेपी के लिए सीट निकालना एक सपने जैसा हों रहा है।
उत्तराखंड के चार मैदानी जिलों में हरिद्वार में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी हो गई है यहां कुल आबादी का करीब 38 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम है, इसी तरह उधम सिंह नगर जिले में भी 34 फीसदी,नैनीताल जिले की 32 और देहरादून जिले में 33 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने का अनुमान है और अब पौड़ी जिले के कोटद्वार जैसे मैदानी क्षेत्रों में भी मुस्लिम आबादी का तेजी से विस्तार हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि 2001 में राज्य के पहाड़ी जिलों में मुस्लिम आबादी डेढ़ प्रतिशत थी , हरिद्वार जुड़ जाने से यहां मुस्लिम आबादी ने तेज़ी से विस्तार पाया ,2011 में 13.9 प्रतिशत थी और अब 2025 में इसके 16 प्रतिशत से ज्यादा हो जाने का अनुमान है।
यूपी से लगे हरिद्वार नैनीताल उधम सिंह नगर और देहरादून जिलों में ,यूपी बिहार झारखंड असम बंगाल के मुस्लिमो ने बसावट कर ली है।
जनसंख्या के आंकड़े बता रहे है कि उत्तराखंड भारत में असम के बाद सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ती मुस्लिम आबादी वाला राज्य हो गया है। केरल और बंगाल में मुस्लिम आबादी वृद्धि दर देवभूमि उत्तराखंड से कम है।
बात करे हिमाचल जिसकी भगौलिक सरंचना उत्तराखंड से मेल खाती है, सांस्कृतिक दृष्टि से हिमाचल को भी देव भूमि कहा जाता था है और उत्तराखंड को भी देव भूमि का दर्जा प्राप्त है।
25 जनवरी 1971 को हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला था तब यहां मुस्लिम आबादी कुल राज्य की आबादी का दो प्रतिशत से कुछ कम थी और आज भी ये आबादी प्रतिशत 2.1 प्रतिशत ही है और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह हिमाचल का भू कानून है।
इस कानून की वजह से राज्य से बाहर का कोई भी व्यक्ति यहां जमीन नही खरीद सकता अलबत्ता उसे लीज पर ले सकता है। इस कानून की वजह से हिमाचल में अभी तक हिंदू आबादी वाले राज्य के रूप में संरक्षित है और बाहरी मुस्लिम यहां मूल निवासी नहीं बन पाए है।
2001में हिमाचल में मुस्लिम आबादी 119512 दस साल बाद यानि 2011में 149881और अब 2022 में इसके 163820 हो जाने का अनुमान है।
हिमाचल की तुलना में उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी ने सख्त भू कानून नही होने की वजह से पांव पसार लिए है।
हर दस साल में दो प्रतिशत मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर दर्ज हो रही है। असम में हर दस साल में 3.3 प्रतिशत मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, जबकि केरल में 1.9 और बंगाल में 1.8 प्रतिशत की वृद्धि दर है। ये वो आबादी है जोकि उत्तराखंड के जनसंख्या रजिस्टर में दर्ज होगी,अभी यहां लाखो की संख्या में बाहरी राज्यो से आए मुस्लिम लोग किराए पर रह रहे है
और धीरे धीरे वे भी यहां स्थाई निवासी हो जाने है क्योंकि यहां उनके बसने में हिमाचल की तरह कोई रोक टोक नही है।
राज्य प्रशासन की राजस्व विभाग की भ्रष्ट कार्य प्रणाली भी एक बड़ी वजह है। जो फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुस्लिम आबादी को यहां बसने दे रही है और परिवार रजिस्टर में फर्जी तरीके से नाम दर्ज किए जा रहे है इसके उदाहरण देहरादून जिले में ही मिल गए है जिसके बाद सरकार ने इन परिवार रजिस्टरों की जांच शुरू की है।
देवभूमि उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी में अवैध मदरसों,मस्जिदो की भरमार हो गई है, सरकारी जमीनों पर कब्जे हो चुके है। यहां तक की जंगल की जमीनों पर भी अवैध रूप से मुस्लिमो ने अंदर तक जाकर कब्जे कर लिए है और वहां से बहुमूल्य वन संपदा का दोहन किया जा रहा है।
मुस्लिम आबादी में यूपी बिहार के लोग तो है ही जानकारी के मुताबिक बड़ी संख्या में बंगलादेश और म्यांमार से आए रोहिंग्या भी बसते जा रहे है। ये लोग पहले असम,बंगाल ,झारखंड से अपने आधार कार्ड बनवाते है, फिर उत्तराखंड आकर, यहां के मुस्लिम जनप्रतिनिधियों के संरक्षण में बसावट कर रहे है। मुस्लिम जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक संरक्षण मिला रहता है वो इन्ही के दम पर विधानसभा,जिला पंचायत नगर निकायों में पहुंचते रहे है।
एक जानकारी के मुताबिक कभी उत्तरकाशी में मुस्लिम वोटर संख्या 150 के आसपास हुआ करती थी और ये अब 5000 से भी ज्यादा हो गई है।
देहरादून के विकास नगर में 6000 मुस्लिम वोटर हुआ करते थे जो अब 32 हजार से ज्यादा हो गए है।
हरिद्वार जिले में कुंभ क्षेत्र को छोड़ दिया जाए तो चारो तरफ मुस्लिम आबादी ने हरि चादर फैला दी नजर आती है।
उधम सिंह नगर जिले में यूपी से लगते सीमा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी ने डेरा डाल दिया है, देहरादून में सेलाकुई ,विकासनगर ,सहसपुर क्षेत्र जो यूपी के सहारनपुर जिले से लगता है, मुस्लिम बाहुल्य हो चुका है,यहां तक की धर्म नगरी ऋषिकेश जहां कभी कोई मुस्लिम नही रहता था अब शहर के चारो तरफ यहीं समुदाय रह रहा है।
नैनीताल जिले ,रामनगर , हल्द्वानी शहर में मुस्लिम आबादी ने नदियों किनारे सरकारी वन और रेलवे की जमीनों पर कब्जे कर घर बसा लिए है।
नैनीताल शहर में ही मुस्लिम आबादी ने करीब दसगुना की वृद्धि ले ली है।
राज्य की बीजेपी सरकार डेमोग्राफी चेंज को लेकर संजीदा हुई है लेकिन धरातल पर अभी काम करने की जरूरत है। मुस्लिम आबादी ने वन, रेलवे,यूपी के अधीन चल रही सिंचाई विभाग की भूमि, ऊर्जा विभाग,लोक निर्माण और राजस्व विभाग की सरकारी भूमि पर अवैध रूप से कब्जे कर बसावट की हुई है।जिसपर हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भी सरकार को निर्देशित किया हुआ है बावजूद इसके इन अवैध कब्जों को मुक्त कराने में शासन प्रशासन की ढुलमुल नीति डेमोग्राफी की समस्या को और बढ़ा रही है।
क्या कहते है सीएम पुष्कर सिंह धामी
डेमोग्राफी चेंज की समस्या एक चुनौती है हमारी सरकार ने इसका अध्ययन कराया है।हम इस पर प्रभावी कदम भी उठा रहे है। उत्तराखंड देवभूमि है इसका देव स्वरूप इसका सनातन सांस्कृतिक मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं होने दी जाएगी।

















