कफाला सिस्टम: “हम बस उसी पर लौट रहे हैं जिसे हमने अपनाया था एक ऐसा उदार इस्लाम (Moderate Islam) जो दुनिया और सभी धर्मों के लिए खुला है। सऊदियों का 70% हिस्सा 30 साल से कम उम्र का है, ईमानदारी से कहूँ तो हम अपनी ज़िन्दगी के 30 साल उग्रवादी विचारों से लड़ते व्यर्थ नहीं करेंगे, हम उन्हें अब और तुरंत नष्ट कर देंगे।”
यह कथन सिर्फ़ एक वाक्य नहीं था; अक्टूबर 2017 में मोहम्मद बिन सलमान द्वारा दिया गया वह उद्घोष एक समय की करवट का संकेत था—रेत के सन्नाटों में उठी एक आवाज़ जिसने सदियों की जड़ता को हिलाकर रख दिया। तब दुनिया ने महसूस किया कि जिस धरती से कट्टरपंथ की लहरें उठती दिखीं, वही आज सुधार और उदारता की किरणें दे रही है। प्रिंस सलमान का इरादा साफ़ था: उस गठजोड़ की जंजीरों को तोड़ना जो मौलवियों की कठोर विचारधारा और शाही सत्ता के बीच बंधकर राज्य की आत्मा और समाज की रफ्तार को रोकता आया था।
सऊदी तोड़ रहा इस्लाम की पुरानी दीवार
मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी ने पुरानी दीवारों को तोड़ना शुरू किया महिलाओं के गाड़ी चलाने पर लगी पाबंदी हटाना, गार्डियनशिप कानूनों में राहत देना और इस्लामी कथनों की प्रमाणिकता की वैज्ञानिक जांच के लिए केंद्र स्थापित करना ये सिर्फ़ नीतियाँ नहीं, एक नए सोच का इंकलाब थीं। और अब, जब दिवाली की रोशनी भारत में अंधकार पर विजय का संदेश दे रही है, सऊदी ने भी एक बड़ा कदम उठाया और 50 साल पुराने कफाला सिस्टम को समाप्त कर कट्टरवाद और आधुनिकीकरण के बीच एक निर्णायक रेखा खींच दी है। कफाला, नामतः ‘संरक्षक’, व्यवहार में नियंत्रण और दासता का जाल था; आलोचक वर्षों से इसे आधुनिक गुलामी कहते आए हैं और आज इसका अंत कई लाखों करोड़ों कामगारों के लिए वास्तविक स्वतंत्रता का प्रतीक है।
इस बदलाव को सिर्फ़ कानूनी सुधार न समझिए क्योंकि यह सुधार मजहबी कट्टरता के अंत का वह पाठांतर है जो मज़हबी सोच को नई दिशा देता है। इसलिए इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि कफाला सिस्टम क्या था, यह इतना विवादित क्यों रहा और आखिर सऊदी ने इसे खत्म करने का निर्णय क्यों लिया। साथ ही हम यह भी देखेंगे कि जहां एक ओर इस्लामिक दुनिया खुद इस्लाम के भीतर सुधार और उदारता की राह पकड़ रही है, वहीं दूसरी ओर हमारे ही देश में वो कौन लोग हैं जिनके हाथों में संविधान और मुंह में सेकुलरिज़्म का मीठा घोल तो दिखता है लेकिन मन में अब भी कबीलाई कट्टरवाद की बू सड़ रही है, वो कौन लोग हैं जो महिलाओं को फिर से उसी कबीलाई व्यवस्था के गर्त में धकेलने की बात करते हुए पहले हिजाब फिर किताब जैसे नारे देते हैं?
क्या है कफाला सिस्टम
आपने हाल ही में नेटफ्लिक्स पर मार्च 2024 में रिलीज़ हुई फिल्म “The Goat Life” ज़रूर देखी होगी। यह फ़िल्म सच्ची घटना पर आधारित है और एक भारतीय नागरिक नजीब मोहम्मद की दर्दनाक दास्तान को बयाँ करती है। नजीब को 1990 के दशक में सऊदी अरब में अगवा कर लिया गया था और तीन वर्षों तक वह एक बंजर रेगिस्तान में एक अरब मालिक के बंधन में बकरियां और भेड़ चराने का काम करता रहा। वह किसी से बात नहीं कर सकता था और क्योंकि उसके कफील ने उसका पासपोर्ट पहले ही जब्त कर लिया था इसलिए वो घर भी नहीं लौट सकता था।
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तीन साल बाद किसी तरह वह वहाँ से भाग निकला और बच पाया। इस फ़िल्म में भारतीय अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन और ओमानी अभिनेता तालिब अल-बलूशी ने अभिनय किया। रिलीज़ के बाद इस फ़िल्म को लेकर सऊदी अरब में तीखी प्रतिक्रियाएँ हुईं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि अल-बलूशी को सऊदी में प्रवेश से रोक दिया गया, हालांकि बाद में उन्होंने इन खबरों से इंकार किया। लेकिन इस फ़िल्म का असली महत्व इस बात में है कि इसने उस सच्चाई को परदे पर उतारा जिसे दुनिया ने वर्षों तक अनदेखा किया था। यही वह कुख्यात व्यवस्था थी जिसे “कफाला सिस्टम” कहा जाता है, जो सऊदी अरब में अब आधिकारिक रूप से समाप्त कर दी गई है।
कफाला के जरिए जीवन पर नियंत्रण
कफाला शब्द अरबी भाषा का है जिसका अर्थ होता है संरक्षण, लेकिन वास्तविकता में यह संरक्षण नहीं बल्कि नियंत्रण था। यह एक ऐसा कानूनी ढाँचा था जो विदेशी मजदूरों के जीवन, उनकी नौकरी, उनके रहने और उनके अधिकारों को पूरी तरह नियंत्रित करता था। इस व्यवस्था की जड़ें 1950 के दशक में पाई जाती हैं जब तेल की खोज से समृद्ध हुए खाड़ी देशों को सस्ते श्रमिकों की ज़रूरत पड़ी, पर वे इन मजदूरों को अपने देश की नागरिकता या स्थायी अधिकार देना नहीं चाहते थे। इसीलिए उन्होंने एक ऐसा सिस्टम बनाया जिसमें हर विदेशी मजदूर को किसी स्थानीय व्यक्ति यानी “कफील” के संरक्षण में रहना पड़ता था। यह कफील ही उसका मालिक, उसका निर्णायक, उसका कानून था। उसी की मर्जी से मजदूर काम कर सकता था, नौकरी बदल सकता था या देश छोड़ सकता था यहां तक की उसके बिना मजदूर की कोई पहचान नहीं रहती थी।
मालिक की मंज़ूरी के बिना कोई मजदूर न तो नौकरी बदल सकता था, न देश छोड़ सकता था और न ही अपने ऊपर हो रहे अत्याचार की शिकायत दर्ज करा सकता था। यही नहीं कई केसेस तो ऐसे भी आये हैं जहां मजदूरों के पासपोर्ट जब्त कर लिए गए, तनख्वाह महीनों रोकी जाती और मामूली गलती पर जेल या निर्वासन की धमकियाँ दी जातीं। इस व्यवस्था ने कफिलों को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया था, जबकि मजदूर पूरी तरह बेबस हो गया था। यही कारण था कि दशकों तक कफाला सिस्टम दुनिया के सबसे अधिक आलोचना झेलने वाले श्रम कानूनों में गिना गया। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और मानवाधिकार समूहों ने बार-बार इसे “आधुनिक गुलामी” की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि यह सिस्टम मानव तस्करी और जबरन श्रम को बढ़ावा देता है क्योंकि मजदूर बिना इजाज़त नौकरी छोड़ने पर गिरफ्तारी या निर्वासन के जोखिम में रहता था। परिणामस्वरूप, वह बुरे हालात में भी मजबूरी में काम करता रहता था। यह समस्या विशेष रूप से घरेलू कामगारों, निर्माण श्रमिकों और कृषि मजदूरों में अधिक थी, जहाँ शोषण का स्तर बेहद गहरा था।
सऊदी अरब में 13.2 मिलियन विदेशी श्रमिक
सऊदी अरब में विदेशी मजदूरों की स्थिति को समझना ज़रूरी है। वहाँ की सरकारी संस्था GASTAT यानी General Authority for Statistics के अनुसार देश में लगभग 13.2 मिलियन विदेशी श्रमिक हैं जो कुल कार्यबल का 77 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। वहीं सऊदी नागरिक श्रमिकों की संख्या मात्र चार मिलियन है जो कुल का 23 प्रतिशत है। इसका मतलब यह हुआ कि सऊदी की अर्थव्यवस्था की पूरी रीढ़ उन्हीं प्रवासी मजदूरों पर टिकी थी जो भारत, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और फिलीपींस जैसे देशों से वहाँ रोज़ी-रोटी की तलाश में गए थे। कुल मिलाकर लगभग एक करोड़ चौतीस लाख प्रवासी सऊदी में काम करते हैं जो देश की आबादी का लगभग बयालिस प्रतिशत हैं। इनमें लाखों भारतीय हैं जिन्होंने इस सिस्टम की क्रूरता को अपनी ज़िंदगी में झेला है।
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ILO कफाला को कहता है आधुनिक दासता
संयुक्त राष्ट्र, ह्यूमन राइट्स वॉच और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने इस व्यवस्था को बार-बार आधुनिक दासता कहा क्योंकि यह इंसान को इंसान नहीं बल्कि संपत्ति बना देती थी। नौकरी छोड़ने की अनुमति न मिलने पर गिरफ्तारी और आर्थिक बर्बादी आम बात थी। निर्माण, कृषि और घरेलू कामकाज में लगे श्रमिक सबसे ज़्यादा शिकार बने। वहाँ इंसान की पहचान मिट जाती थी, वह सिर्फ एक वर्क परमिट नंबर रह जाता था बिना आवाज़, बिना वजूद। लेकिन अब वह दौर समाप्त हो चुका है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अपने ‘विजन 2030’ के अंतर्गत इस अमानवीय कानून को खत्म करने का साहसिक निर्णय लिया है। इस विजन का उद्देश्य सऊदी अरब को तेल पर निर्भरता से मुक्त करना, अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाना और मानवाधिकारों के अनुरूप समाज का निर्माण करना है। दुनिया भर में बढ़ते दबाव और मानवाधिकार समूहों की आलोचना के बीच सऊदी ने सुधार का रास्ता चुना। कतर ने 2022 फीफा विश्व कप से पहले अपने श्रम कानूनों में कुछ बदलाव किए, बहरीन और यूएई ने भी सीमित सुधार किए, पर सऊदी ने आगे बढ़कर इतिहास रच दिया।
अब आगे क्या ?
अब जब कफाला सिस्टम को हटाया जा चुका है, सवाल यह उठता है कि आगे क्या होगा? सऊदी अरब ने इसके स्थान पर अनुबंध-आधारित (Contract-Based) नौकरी प्रणाली लागू की है, जो प्रवासी मजदूरों को अब अपने मालिक की मंजूरी के बिना नई नौकरी करने की स्वतंत्रता देती है। देश छोड़ने के लिए भी अब उन्हें ‘एग्जिट वीजा’ या नियोक्ता की सहमति की आवश्यकता नहीं होगी। इसके साथ ही, श्रमिकों के लिए बेहतर लेबर कोर्ट और शिकायत निवारण प्रणाली की भी व्यवस्था की गई है। सरकार का मानना है कि इससे काम करने वालों पर होने वाला शोषण कम होगा और सऊदी अरब की वैश्विक छवि सुधारने में मदद मिलेगी।
कानून बदलने से शोषण नहीं समाप्त होगा
हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि केवल कानून बदल देने से रातों-रात अत्याचार और शोषण समाप्त नहीं हो जाएंगे। कई नियोक्ता अब भी मजदूरों से नौकरी बदलने या देश छोड़ने के लिए अनुमति मांगते हैं, और घरेलू कामगार जैसे सबसे कमजोर वर्ग को नए नियमों का पूरा लाभ मिलना अभी चुनौतीपूर्ण है। भर्ती प्रक्रिया के दौरान होने वाले शोषण, जैसे मध्यस्थों द्वारा अत्यधिक फीस लेना, अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल पहला कदम है, और जमीनी हकीकत को बदलने में समय और सतत प्रयास की आवश्यकता होगी।
फिर भी, इस कदम का प्रभाव विशाल और ऐतिहासिक है। लगभग 1.3 करोड़ विदेशी मजदूरों की ज़िंदगी अब बदलने जा रही है। वे अब नई नौकरियाँ चुन सकते हैं, देश छोड़ने का अधिकार अपने हाथ में रख सकते हैं और कानूनी रूप से अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं। इस सुधार से न केवल शोषण में कमी, बल्कि काम की परिस्थितियों में सुधार, अधिक स्वतंत्रता और सम्मान भी आने की उम्मीद है। मजदूर अब अपने शर्तों पर निष्पक्ष बातचीत कर सकते हैं, जिससे उनकी आर्थिक भागीदारी और सामाजिक स्वाभिमान मजबूत होगा।
भारत को कबीलाई गर्त में धकलने वाले कौन
ऐसे में एक सख्त और पेचीदा सवाल खड़ा हो जाता है: जब सऊदी अरब जैसा इस्लामी राष्ट्र खुद अपनी जड़ें खंगालकर पुराने कमियों और कट्टरपंथ से दूरी बनाकर महिलाओं को अधिकार दे सकता है, तब हमारे यहाँ कुछ घटक क्यों समाज को पीछे खींचने की जिद पर अड़े हैं वही लोग जो संविधान से ऊपर आसमानी किताब को रख देने की हिम्मत करते हैं; और यहाँ मैं बिल्कुल स्पष्ट रूप से दो बातें आपके सामने रखता हूँ: “सऊदियों का 70% हिस्सा 30 साल से कम उम्र का है, ईमानदारी से कहूँ तो हम अपनी ज़िन्दगी के 30 साल उग्रवादी विचारों से लड़ते व्यर्थ नहीं करेंगे, हम उन्हें अब और तुरंत नष्ट कर देंगे।”
और दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने ट्रिपल तलाक़ के विरोध में जो कहा वह भयावह है: “हमारे लिए हमारी पवित्र ग्रंथ, क़ुरआन शरीफ़, सर्वोच्च है, और यदि संविधान की कोई भी धारा या कोई भी कानून क़ुरआन के विरोध में जाएगा, तो हमारी ग्रंथ ही प्रभावी होगी, न कि कानून या संविधान।” यह कथन सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, यह संवैधानिक आत्मघात की तरह है, क्योंकि यह समाज के कमजोर और अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकारों पर कुठाराघात करता है।
महिलाओं को अपना कपड़ा चुनने की आजादी मिली
यही नहीं सऊदी में क्राउन प्रिंस का यह स्पष्ट निर्देश कि महिलाएँ अब अपने वस्त्र पहनने के बारे खुद निर्णय लें यह दिखाता है कि सुधार मज़हब को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि उसकी गरिमा और इंसानी मर्यादा बचाने के लिए होता है; जबकि हमारे देश के ही कुछ मौलानाएँ और नेता आज भी टीवी बहसों में महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियाँ करने से नहीं चूकते और कुछ राजनीतिक ताकतें “पहले हिजाब, फिर किताब” जैसे नारे देकर नन्हीं काया वाले भविष्य को वही पुरानी बेड़ियों में बाँधने की बात करते हैं। ऐसे में सऊदी का यह कदम मज़हब के भीतर सुधार को स्वीकार कर आगे बढ़ना न केवल वहाँ के लाखों प्रवासी मजदूरों के लिए मुक्ति की खबर है, बल्कि भारत में बैठे कट्टरतावादी-विषयक राजनेताओं और उनके समर्थकों के लिए एक सख्त चेतावनी भी है: या तो आप वक्त के साथ चलिए और समाज के कमजोरों के अधिकारों का समर्थन कीजिए, या इतिहास आपकी उस सोच को पीछे छोड़कर आगे निकल जाएगा।













