आज 27 अक्तूबर है। यही वह तारीख है जब जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। यही वह दिन था जिसने भारत का इतिहास मोड़ दिया था और भारतीय गणराज्य को उसकी असल भौगोलिक पहचान दी थी। लेकिन मजहब के नाम पर, द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर भारत को काटकर मोहम्मद अली जिन्ना ने जो देश बनाया वह पाकिस्तान इस सच्चाई को आज तक हजम नहीं कर पाया है और उसने हर पीढ़ी में यही जहर बोया है कि ‘भारत ने कश्मीर जबरन कब्जाया’ हुआ है। जबकि सच यह है कि संपूर्ण जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा। हर वर्ष जब भारत इस दिन को अपने राष्ट्रीय एकीकरण के स्मृति दिवस के रूप में मनाता है, पाकिस्तान इसे को ‘ब्लैक डे’ कहकर अपनी खीझ झलकाते हुए, भारत के खिलाफ नफरती जहर उगलने में जुट जाता है। आज पाकिस्तान की हुकूमत फिर से वही सब किया।
विलय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1947 के भारत विभाजन के बाद जम्मू-कश्मीर सहित तमाम रियासतों को यह निर्णय लेना था कि वे भारत या पाकिस्तान में शामिल हों। इसके पीछे लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदृष्टि और देश के प्रति अगाध श्रद्धा ही थी, जो उस वक्त प्रथम सरकार में गृहमंत्री थे। जम्मू कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह ने 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान द्वारा कबायली हमलावरों और अपनी सेना के जरिए राज्य पर आक्रमण करवाया, तब निर्दोष नागरिकों की हत्या और लूटपाट के बीच श्रीनगर को घेरने की तैयारी थी। महाराजा ने तत्काल फैसला लिया और 26 अक्तूबर को विलय पत्र पर हस्ताक्षर करके भारत से रक्षा सहायता मांगी। अगले ही दिन भारतीय सेना ने आक्रमणकारियों को खदेड़ने का अभियान शुरू किया, जिससे जम्मू-कश्मीर सुरक्षित रहा।

पाकिस्तान का सियासी नाटक
भारत में इस दिन को एकता, साहस की निशानी माना जाता है, लेकिन पाकिस्तान इसे अपनी शरारत की नाकामी के तौर पर याद करता है। प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ से लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तक, लगभग सभी नेता इस दिन भारत विरोधी बयानबाजियां करके यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे ‘कश्मीर के हिमायती’ हैं, जबकि सचाई यह है कि पाकिस्तान का हर कदम कश्मीरियों के हित के विपरीत रहा है।
1947 से लेकर 1999 के कारगिल युद्ध तक, पाकिस्तान की नीति केवल अस्थिरता फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फर्जी शोर मचाने की रही है। परंतु चार युद्धों और असंख्य आतंकवादी धूर्तताओं के बावजूद उसका नफरती उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। 1972 के शिमला समझौते से लेकर अगस्त 2019 में धारा 370 हटने तक, हर चरण में पाकिस्तान की नीति आधारहीन ही साबित हुई है। अब जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय स्पष्ट रूप से कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला मानता है, पाकिस्तान का ‘ब्लैक डे’ मनाना केवल उसके घरेलू राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनकर रह गया है।
कश्मीर में नया दौर
वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र, निवेश और पर्यटक गतिविधियों के नए अध्याय खुल रहे हैं। घाटी धीरे-धीरे आतंकवाद से मुक्त होकर विकास की ओर अग्रसर है। भारत सरकार के प्रयासों से न केवल स्थानीय शासन सशक्त हुआ है बल्कि रोजगार और शिक्षा की नई संभावनाएं बनी हैं। इसके विपरीत, पाकिस्तान राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और गिरते सामाजिक विश्वास के बोझ तले दबा हुआ है।
ऐसे में भारत के खिलाफ ‘ब्लैक डे’ मनाना उसकी खुद की निराशा का सार्वजनिक प्रदर्शन भर है। जिस दिन भारत ने एक वैध और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत अपने संघीय ढांचे को मजबूत किया था, वही दिन पाकिस्तान के लिए उसकी विफलता का प्रतीक बन गया और उसका चेहरा और एजेंडा फीका पड़ गया था।
कश्मीर का भारत में विलय इतिहास की एक वैधानिक और नैतिक सचाई है। पाकिस्तान इसे चाहे जितना नकारे, इतिहास के पन्नों और भूगोल की सीमाओं ने इसे हमेशा के लिए स्थिर कर दिया है। आज जब भारत नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, पाकिस्तान का ‘ब्लैक डे’ बीते युग के शोरोगुल की तरह है, जिसकी आवाज अब दुनिया के सामने उसके ही झूठ की कलई खोलती है।

















