बलूचों को 'आतंकवादी' बता जेलों में ठूंस रहा जिन्ना का देश, Amnesty International की सनसनीखेज रिपोर्ट
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बलूचों को ‘आतंकवादी’ बता जेलों में ठूंस रहा जिन्ना का देश, Amnesty International की सनसनीखेज रिपोर्ट

एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे कई अंतरराष्ट्रीय मंचों ने पाकिस्तान सरकार को अनेक बार चेताया है कि मानवाधिकारों का हनन रोकें और हिरासत में लिए बलूच कार्यकर्ताओं को बिना शर्त रिहा करें। मगर पाकिस्तान सरकार अभी भी 'राज्यों की सुरक्षा' का हवाला देकर इन कानूनों पर टस से मस होने का नाम नहीं ले रही है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Oct 27, 2025, 03:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
Representational Image

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जिन्ना के देश में बलूचिस्तान को अलग देश बताने पर भारत के फिल्म अभिनेता सलमान को ही हाल में आतंकवादी सूची में नहीं डाला है, ऐसे अनेक निर्दोष बलूच नागरिक हैं जिन्हें इस्लामाबद आतंकवादी ठहरा चुका है और उन्हें सींखचों में कैद करके दमन कर रहा है। पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी कानून (Anti-Terrorism Amendment Bill, 2025) के ऐसे दुरुपयोग के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ने अपनी रिपोर्ट में बलूचों के किए जा रहे दमन की कलई खोलकर रख दी है। बताया गया है कि हाल ही में लगभग 35 बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इस कानून की आड़ में जेल में डाला गया है। पाकिस्तान का यह बर्बर कानून आज एक कड़वी सचाई बन चुका है। इसके एक नहीं, अनेक प्रमाण एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में दिए हैं।

पाकिस्तान को आतंकवाद विरोधी (संशोधन) कानून लागू किए बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है लेकिन इसके तहत सुरक्षा बलों को बेतहाशा अधिकार देकर इस देश ने बेसूर नागरिकों के विरुद्ध अत्याचार करने की मानो खूली छूटी दे दी गई है। इस कानून के अंतर्गत राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को ‘खतरा’ होने के संदेह में किसी भी व्यक्ति को बिना आरोप के तीन महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों और सशस्त्र बलों को संदिग्धों को पूर्व सावधानी बरतते हुए किसी को हिरासत में लेने का अधिकार भी दिया है।

बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। जबरन गायब करना, गुपचुप हत्याएं करना और अवैध हिरासत आम घटनाएं हो चली हैं। मानवाधिकार संगठन मांग कर रहे हैं कि हिरासत में लिए गए सभी कार्यकर्ताओं को रिहा करने के साथ ही ऐसे कानूनों में संशोधन किया जाए (File Photo)

इस कानून के तहत दावा तो न्यायिक निगरानी का किया गया है, जिसमें कुछ कानूनी प्रक्रियाएं और समीक्षा शामिल हैं, लेकिन इसके नाम पर भी सिर्फ प्रताड़ित ​ही किया जाता है। इस्लामाबाद में बैठी सरकार का दावा है कि इससे आतंकवाद पर ‘प्रभावी नियंत्रण’ हो सकेगा, मगर मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे मनमानी गिरफ्तारी और असहमति व्यक्त करने वाली आवाजों को दबाने का साधन बताया है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और कई अन्य संगठनों की रिपोर्ट बताती हैं कि इस कानून का दुरुपयोग विशेष तौर पर बलूच कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के खिलाफ किया जा रहा है। रिपोर्ट में है कि गत दिनों ही 35 प्रमुख बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत पकड़ा गया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों, मानवाधिकार की मांग करने तथा सत्ता के विरोध में बोलने वालों को ‘आतंकवादी’ ठहरा देना वहां अब आम हो गया है। हैरानी की बात है कि हिरासत में रखे गए लोगों को आवश्यक चिकित्सा और कानूनी प्रक्रिया से दूर रखा जाता है, यातना व उत्पीड़न की शिकायतें तो आमतौर पर मिलती रही हैं। अपहरण एवं कानून हाथ में लेकर की गई हत्याओं के सैकड़ों मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें कई परिवार अभी भी अपने ‘लापता’ परिजनों के लिए धरने-प्रदर्शन कर रहे हैं, जिनको संज्ञान में लेने वाला कोई नहीं है।

सवाल है कि इस कानून का दुरुपयोग किया कैसे जा रहा है? पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां कानून का पालन करने के बजाय इसकी आड़ में अक्सर अपनी समझ से छापेमारी, गिरफ्तारी और मामले रजिस्टर करती हैं। मानवाधिकार व राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, विद्यार्थियों तक को ‘राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा’ या ‘आतंकवादी’ कह कर गिरफ्तार किया जाता है। कई बार ये आरोप बिना सबूतों के लगाये जाते हैं और परिवारों को सूचित किया भी नहीं जाता। अदालतें इनको जमानत देने से इनकार करती रही हैं या हिरासत को बिना स्पष्ट कारण बताए बढ़ाती रही हैं। ऐसे कार्यकर्ताओं को ‘आतंकवाद की सूची’ में डालने से देश-विदेश में उनकी छवि खराब हो रही है, उनसे आवाज उठाने का अधिकार छीना जा रहा है।

पहले भी एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे कई अंतरराष्ट्रीय मंचों ने पाकिस्तान सरकार को अनेक बार चेताया है कि मानवाधिकारों का हनन रोकें और हिरासत में लिए बलूच कार्यकर्ताओं को बिना शर्त रिहा करें। मगर पाकिस्तान सरकार अभी भी ‘राज्यों की सुरक्षा’ का हवाला देकर इन कानूनों पर टस से मस होने का नाम नहीं ले रही है।

उधर, बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। जबरन गायब करना, गुपचुप हत्याएं करना और अवैध हिरासत आम घटनाएं हो चली हैं। मानवाधिकार संगठन मांग कर रहे हैं कि हिरासत में लिए गए सभी कार्यकर्ताओं को रिहा करने के साथ ही ऐसे कानूनों में संशोधन किया जाए, जिससे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।

कहना न होगा, पाकिस्तान का आतंकवाद विरोधी कानून सैद्धांतिक तौर पर भले राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘जरूरी’ लगता हो, मगर इसके दुरुपयोग ने बलूच समुदाय को गहरे संकट में डाला हुआ है। जब तक कानूनी और न्यायिक निगरानी मजबूत नहीं होती और मानवाधिकारों की रक्षा नहीं की जाती, तब तक यह कानून राज्य के दमन का हथियार बना रहेगा।

Topics: आतंकवाद विरोधी कानूनbaluchistanबलूचAmnesty Internationalanti terrorism act 2025पाकिस्तानPakistanमानवाधिकारhuman rights
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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