पाकिस्तान की फौज में दूसरे नंबर का फौजी अफसर, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का चेयरमैन जनरल साहिर शमशाद मिर्जा कल रात ढाका पहुंचा है। पता चला है कि उसके साथ आईएसआई के अधिकारियों सहित छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल है। आधिकारिक रूप से इस्लामाबाद ने इसे ‘दोनों देशों की सेनाओं के बीच संबंध प्रगाढ़’ करने वाला दौरा बताया है। लेकिन इस बात का पूरा अंदेशा है कि, भारत से विशेष रूप से नफरत से भरा यह जनरल मिर्जा बांग्लादेश में अपनी गोटियां सेट करने पहुंचा है जिससे भारत विरोधी हरकतों को अंजाम दिया जा सके। यहां ध्यान रहे कि पिछले हफ्ते ही भारतीय सेना की तीन सदस्यीय मिलिटरी इंटेलिजेंस टीम सीमा क्षेत्रों का मुआयना करके लौटी है। इसके ठीक बाद, पाकिस्तान के इस जनरल की यात्रा संदेह करने की कई वजहें दे रही है।
जनरल मिर्जा के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना की इस टोली का ढाका दौरा कोई साधारण सैन्य संपर्क मात्र नहीं माना जा सकता। इस टीम में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों—विशेष रूप से इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के अधिकारियों का होना दर्शाता है कि मिर्जा के इस मिशन का उद्देश्य पारंपरिक सैन्य सहयोग से कुछ हटकर है।
पाकिस्तान की विदेश और सुरक्षा नीति लंबे समय से भारत-विरोध केंद्रित रही है। चाहे वह जम्मू कश्मीर का मुद्दा हो, सीमा पार आतंकवाद का या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि कमजोर करने के प्रयास, हर पहलू में इसकी झलक मिलती रही है। बांग्लादेश जैसे देश में इस्लामाबाद और रावलपिंडी के मोहरों सक्रियता बढ़ना यह भी शक पैदा करता है कि जरूर पाकिस्तान की अपनी भारत विरोधी नीति को कोई नई रणनीतिक परत चढ़ा रहा है।

1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता और पाकिस्तान की हार इस्लामाबाद के लिए गहरा सदमा रही है। इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते सतही तौर पर सामान्य बने, लेकिन अविश्वास की जड़ें गहरी बनी रही थीं। पाकिस्तान ने वर्षों तक बांग्लादेशियों के नरसंहार के लिए माफी नहीं मांगी। हालांकि व्यापरिक स्तर पर संबंध बने रहे, लेकिन सुरक्षा और सैन्य क्षेत्र में सहयोग बहुत सीमित रहा था।
अब अगर पाकिस्तानी सेना बांग्लादेश के साथ सीधा संपर्क साध रही है, तो यह उस ऐतिहासिक अविश्वास को दरकिनार करते हुए रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति की कोशिश ही कही जाएगी।
उल्लेखनीय है कि भारत की पूर्वोत्तर सीमा विश्व की सबसे जटिल सीमाओं में एक है। यह भौगोलिक रूप से कठिन, जनजातीय दृष्टि से विविध और सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील इलाका है। पाकिस्तान भलीभांति जानता है कि भारत के पूर्वोत्तर में किसी भी प्रकार की अस्थिरता पैदा करना, भारत के लिए नई सुरक्षा चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
संभव यह भी है कि पाकिस्तान बांग्लादेश के भीतर कुछ मजहबी कट्टरपंथी समूहों या इस्लामवादी राजनीतिक तत्वों को प्रभावित कर भारत विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। इस्लामाबाद की यह दुर्नीति ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ का हिस्सा हो सकती है जिसमें पारंपरिक युद्ध के बजाय सूचना, समाज और राजनीति के माध्यम से अपना एजेंडा पूरा करने की कोशिश की जाती है।
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार भारत के साथ मित्रवत् और सहयोगपूर्ण रही थी। सीमापार आतंकवाद, अवैध घुसपैठ और सीमा चिन्हांकन मुद्दों पर भारत-बांग्लादेश सहयोग उल्लेखनीय रहा था। लेकिन तख्तापलट के बाद यूनुस सरकार के तहत बांग्लादेश में विपक्षी दल, खासकर बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी और कुछ कट्टरपंथी संगठनों में पाकिस्तान समर्थक तत्व सक्रिय हो गए हैं।
हो सकता है पाकिस्तानी जनरल मिर्जा का दौराऐसे भारत विरोधी तत्वों से संपर्क बढ़ाने और भविष्य में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में प्रभाव जमाने की पूर्व तैयारी हो! अगर पाकिस्तान बांग्लादेश के आगामी राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करने में सफल होता है, तो यह भारत के लिए नई कूटनीतिक चुनौती होगी।
पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई की गतिविधियां ऐतिहासिक रूप से दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में चलती रही हैं—भारत, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में इसके तत्वों के सक्रिय होने खबरें बार-बार मिली हैं। बांग्लादेश में 1990 और 2000 के दशक में इसी आईएसआई पर भारत के पूर्वोत्तर के उग्रपंथी गुटों को शरण और प्रशिक्षण देने के आरोप लगते रहे थे।
हालांकि ढाका में शेख हसीना के सत्तारूढ़ होने के बाद इन गतिविधियों पर काफी हद तक रोक लगी थी, लेकिन अब अगर पाकिस्तानी सैन्य टीम फिर से ऐसे संपर्क जिंदा करने की कोशिश कर रही है, तो यह क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के लिए गंभीर मुद्दा है।
भारत ने लंबे समय से ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के साथ व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग को प्राथमिकता दी है। लेकिन अगर पाकिस्तान बांग्लादेश के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करता है, तो भारतीय सुरक्षा तंत्र को इस ओर निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता होगी।
भारतीय खुफिया एजेंसियों को संभवतः इन संभावनाओं की पुख्ता जानाकारी है। उन्हें सिर्फ निगरानी और पैनी करनी होगी। लेकिन मिर्जा के मौजूदा ढाका दौरे से यह संकेत तो मिलता ही है कि पाकिस्तान अपनी ‘प्रॉक्सी पॉलिसी’ को सिर्फ पश्चिमी सीमा तक सीमित नहीं रखना चाहता।
ऐसे में यदि पाकिस्तान बांग्लादेश में अपनी मौजूदगी बढ़ाता है, तो भारत को अपने राजनयिक प्रयास भी तेज करने होंगे ताकि ढाका किसी तीसरे देश के प्रभाव में न आए। भारत-बांग्लादेश संबंधों की मजबूती ही इस संभावित रणनीतिक गठजोड़ का सबसे प्रभावी उत्तर हो सकती है।
इस दृष्टि से जनरल मिर्जा का यह दौरा केवल एक सैन्य शिष्टाचार नहीं कहा जा सकता है, बल्कि उसका यह दौरा दक्षिण एशिया में शक्ति समीकरणों की जोड़—तोड़ की कवायद की भनक देता है। पाकिस्तान, भारत की पूर्वी सीमा पर भी रणनीतिक दबाव बनाने की दिशा में बढ़ता हुआ प्रतीत होता है। इसलिए, रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए यह आवश्यक होगा कि बांग्लादेश के साथ राजनीतिक और सुरक्षा संवाद को और गहरा करे। दोनों देशों में खुफिया सहयोग को मजबूत किया जाए।
मिर्जा के आज विधिवत् रूप से शुरू हो रहे ढाका दौरे में वह किससे, कहां, क्या बात करने वाला है, इसकी खबरें तो अभी आना बाकी हैं, लेकिन इस्लामाबाद की शरारती मंशाओं को लगता है कि उसका ढाका को अपने प्रभाव में लेना ही इस दौरे का एकमात्र मकसद रहने वाला है।

















