त्रिपुरा, अपनी प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध संस्कृति और पारंपरिक शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। यह राज्य कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर आधारित अर्थव्यवस्था रखता है। हाल ही में जीएसटी दरों में की गई कटौती ने त्रिपुरा के कई पारंपरिक और ग्रामीण उद्योगों को नई ताकत दी है। हथकरघा, चाय, रेशम और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में जीएसटी 18% या 12% से घटाकर 5% किए जाने से उत्पादन लागत घटी, प्रतिस्पर्धिता बढ़ी और ग्रामीण आजीविका को बल मिला है।
हथकरघा उद्योग- त्रिपुरा में लगभग 1.37 लाख परिवार हथकरघा उद्योग से जुड़े हैं। यहां के “रीसा” और “पाचरा-रिग्नाई” वस्त्रों को जीआई टैग प्राप्त है। इन पारंपरिक वस्त्रों पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% कर दिया गया है, जिससे कारीगरों की आमदनी बढ़ी और उनके उत्पाद अब बाजार में अधिक सुलभ हुए हैं। महिलाओं के नेतृत्व में चलने वाले ये उद्योग न केवल आजीविका का साधन हैं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान भी हैं।
चाय उद्योग- त्रिपुरा में 54 चाय बागान और 2,755 छोटे उत्पादक हैं। यहां की चाय देश और विदेश दोनों में लोकप्रिय है। पैकेज्ड या इंस्टेंट चाय पर जीएसटी 18% से घटाकर 5% करने से उत्पादन सस्ता हुआ है और निर्यात में बढ़ोतरी की संभावना बनी है। इससे छोटे उत्पादकों और श्रमिकों की आमदनी में सुधार हुआ है।
रेशम उद्योग- लगभग 15,550 किसान रेशम उत्पादन से जुड़े हैं। रेशम पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% करने से यह उद्योग और प्रतिस्पर्धी बना है। इससे स्थानीय उत्पादकों को बाजार तक पहुंच बढ़ाने, नई इकाइयां स्थापित करने और आय में वृद्धि करने में मदद मिली है।
खाद्य प्रसंस्करण– त्रिपुरा में 2,800 से अधिक खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां कार्यरत हैं। यहां का जीआई-टैग प्राप्त “क्वीन अनानास” राज्य की शान है। फलों के रस और प्रसंस्कृत उत्पादों पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% करने से उत्पादन लागत घटी है, जिससे निर्यात और बाजार विस्तार को बढ़ावा मिला है। इन सभी सुधारों से त्रिपुरा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान आई है। स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ा है, कारीगरों और किसानों की आमदनी में सुधार हुआ है, और पारंपरिक उत्पादों को देश-विदेश के बाजारों में पहचान मिली है। जीएसटी में की गई यह कटौती केवल टैक्स सुधार नहीं, बल्कि त्रिपुरा की सांस्कृतिक धरोहर, ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम है।

















