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कित्तूर की रानी चेन्नम्मा: शौर्य, बलिदान और भूले गए इतिहास की गाथा

रानी चेन्नम्मा का जन्म काकती गांव में (कर्नाटक के उत्तर बेलगांव ) 23 अक्टूबर 1778 में हुआ था

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Sudhir Kumar Pandey
Oct 23, 2025, 06:00 am IST
in भारत, कर्नाटक
रानी चेनम्मा

रानी चेनम्मा

“जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूंद है,कित्तूर को कोई नहीं ले सकता।” वीरांगना रानी चेन्नम्मा का ये कथन भारतीयों को स्व के लिए सर्वस्व अर्पित कर देने की सदैव प्रेरणा देता रहेगा। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत की प्रथम बलिदानी वीरांगना कित्तूर की रानी – चेन्नम्मा ही थीं, जिन्होंने 11 दिन लगातार अंग्रेजों को पराजित किया, लेकिन 12वें दिन उन्हें अपने ही लोगों ने धोखा दे दिया। वह उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत की स्वतंत्रता हेतु सक्रिय होनेवाली पहली वीरांगना थीं ।

रानी चेन्नम्मा का जन्म काकती गांव में (कर्नाटक के उत्तर बेलगांव ) 23 अक्टूबर 1778 में हुआ। बचपन से ही उन्हें घोड़े पर बैठना, तलवार चलाना तथा तीर चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ । पूरे गांव में अपने वीरतापूर्ण कृत्यों के कारण से वह परिचित थीं।

रानी चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के शासक मल्लसारजा देसाई से 15 वर्ष की आयु में हुआ। उनका विवाहेतर जीवन सन् 1816 में पति की मृत्यु के पश्चात एक दुखभरी कहानी बनकर रह गया । उनका एक पुत्र था, किंतु दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा था । सन् 1824 में उनके पुत्र ने अंतिम सांस ली।

अंग्रेजों द्वारा व्यपगत की नीति के अंतर्गत रानी चेन्नम्मा की रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने के लिए अल्टीमेटम दिया और कित्तूर रियासत धारवाड़ जिलाधिकारी के प्रशासन में आ गया। चॅपलीन उस क्षेत्र के कमिश्नर थे । दोनों ने नए शासनकर्ता को नहीं माना, तथा सूचित किया कि कित्तूर को अंग्रेजों का शासन स्वीकार करना होगा। अतः वीरांगना रानी चेन्नम्मा को अंग्रेजों के विरुद्ध युद्धघोष करना पड़ा।

अंग्रेजों ने कित्तूर को घेरा

अंग्रेजों के मनमाने व्यवहार का रानी चेन्नम्मा तथा स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया । ठाकरे ने कित्तूर पर आक्रमण किया । इस युद्ध में कई ब्रिटिश सैनिकों के साथ ठाकरे मारा गया । एक छोटे शासक के हाथों अपमानजनक हार स्वीकार करना अंग्रेजों के लिए बड़ा कठिन था । उन्होंने मैसूर तथा सोलापुर से प्रचंड सेना लाकर उन्होंने कित्तूर को घेर लिया ।

रानी चेन्नम्मा ने युद्ध टालने का अंत तक प्रयास किया, उन्होंने चॅपलीन तथा बॉम्बे प्रेसिडेन्सी के गवर्नर से बातचीत की, जिनके प्रशासन में कित्तूर था । उसका कुछ परिणाम नहीं निकला। आखिरकार रानी ने युद्ध की घोषणा कर दी।

देशद्रोहियों ने दिया धोखा 

12 दिनों तक पराक्रमी रानी तथा उनके सैनिकों ने किले की रक्षा की, किंतु अपनी आदत के अनुसार इस बार भी देशद्रोहियों ने तोपों के बारुद में कीचड़ एवं गोबर भर दिया। सन् 1824 में रानी की हार हुई । उन्हे बंदी बनाकर जीवनभर के लिए बैलहोंगल के किले में रखा गया । रानी चेन्नम्मा ने अपने बचे हुए दिन पवित्र ग्रंथ पढ़ने में तथा पूजा-पाठ करने में बिताए। सन् 1829 में उनकी मृत्यु हुई।

शौर्य की देवी रानी चेनम्मा

कर्नाटक में रानी चेनम्मा का नाम शौर्य की देवी के रूप में बडे़ आदरपूर्वक लिया जाता है। दुर्भाग्य देखिए कि तथाकथित वामपंथी इतिहासकारों और एक राजनैतिक दल विशेष के समर्थक परजीवी सेक्युलर इतिहासकारों ने इतिहास लिखते समय – सोलहवीं शताब्दी की महान् वीरांगना रानी अब्बक्का चौटा,अठारहवीं शताब्दी की महान् वीरांगना वेलु नचियार और उन्नीसवीं सदी की भारत की प्रथम बलिदानी रानी चेन्नम्मा के बलिदान को हाशिये में भी नहीं रखा।

Topics: कित्तूर की रानीरानी चेन्नम्मा और अंग्रेजमहिला स्वतंत्रता सेनानीरानी चेन्नम्मा का इतिहासरानी चेन्नम्मा की जयंतीभारत की प्रथम स्वतंत्रता सेनानीकर्नाटक की वीरांगनाशौर्य की देवी चेन्नम्मारानी चेन्नम्मा कौन थीं1824 का कित्तूर युद्धरानी चेन्नम्मा
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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