“जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूंद है,कित्तूर को कोई नहीं ले सकता।” वीरांगना रानी चेन्नम्मा का ये कथन भारतीयों को स्व के लिए सर्वस्व अर्पित कर देने की सदैव प्रेरणा देता रहेगा। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत की प्रथम बलिदानी वीरांगना कित्तूर की रानी – चेन्नम्मा ही थीं, जिन्होंने 11 दिन लगातार अंग्रेजों को पराजित किया, लेकिन 12वें दिन उन्हें अपने ही लोगों ने धोखा दे दिया। वह उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत की स्वतंत्रता हेतु सक्रिय होनेवाली पहली वीरांगना थीं ।
रानी चेन्नम्मा का जन्म काकती गांव में (कर्नाटक के उत्तर बेलगांव ) 23 अक्टूबर 1778 में हुआ। बचपन से ही उन्हें घोड़े पर बैठना, तलवार चलाना तथा तीर चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ । पूरे गांव में अपने वीरतापूर्ण कृत्यों के कारण से वह परिचित थीं।
रानी चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के शासक मल्लसारजा देसाई से 15 वर्ष की आयु में हुआ। उनका विवाहेतर जीवन सन् 1816 में पति की मृत्यु के पश्चात एक दुखभरी कहानी बनकर रह गया । उनका एक पुत्र था, किंतु दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा था । सन् 1824 में उनके पुत्र ने अंतिम सांस ली।
अंग्रेजों द्वारा व्यपगत की नीति के अंतर्गत रानी चेन्नम्मा की रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने के लिए अल्टीमेटम दिया और कित्तूर रियासत धारवाड़ जिलाधिकारी के प्रशासन में आ गया। चॅपलीन उस क्षेत्र के कमिश्नर थे । दोनों ने नए शासनकर्ता को नहीं माना, तथा सूचित किया कि कित्तूर को अंग्रेजों का शासन स्वीकार करना होगा। अतः वीरांगना रानी चेन्नम्मा को अंग्रेजों के विरुद्ध युद्धघोष करना पड़ा।
अंग्रेजों ने कित्तूर को घेरा
अंग्रेजों के मनमाने व्यवहार का रानी चेन्नम्मा तथा स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया । ठाकरे ने कित्तूर पर आक्रमण किया । इस युद्ध में कई ब्रिटिश सैनिकों के साथ ठाकरे मारा गया । एक छोटे शासक के हाथों अपमानजनक हार स्वीकार करना अंग्रेजों के लिए बड़ा कठिन था । उन्होंने मैसूर तथा सोलापुर से प्रचंड सेना लाकर उन्होंने कित्तूर को घेर लिया ।
रानी चेन्नम्मा ने युद्ध टालने का अंत तक प्रयास किया, उन्होंने चॅपलीन तथा बॉम्बे प्रेसिडेन्सी के गवर्नर से बातचीत की, जिनके प्रशासन में कित्तूर था । उसका कुछ परिणाम नहीं निकला। आखिरकार रानी ने युद्ध की घोषणा कर दी।
देशद्रोहियों ने दिया धोखा
12 दिनों तक पराक्रमी रानी तथा उनके सैनिकों ने किले की रक्षा की, किंतु अपनी आदत के अनुसार इस बार भी देशद्रोहियों ने तोपों के बारुद में कीचड़ एवं गोबर भर दिया। सन् 1824 में रानी की हार हुई । उन्हे बंदी बनाकर जीवनभर के लिए बैलहोंगल के किले में रखा गया । रानी चेन्नम्मा ने अपने बचे हुए दिन पवित्र ग्रंथ पढ़ने में तथा पूजा-पाठ करने में बिताए। सन् 1829 में उनकी मृत्यु हुई।
शौर्य की देवी रानी चेनम्मा
कर्नाटक में रानी चेनम्मा का नाम शौर्य की देवी के रूप में बडे़ आदरपूर्वक लिया जाता है। दुर्भाग्य देखिए कि तथाकथित वामपंथी इतिहासकारों और एक राजनैतिक दल विशेष के समर्थक परजीवी सेक्युलर इतिहासकारों ने इतिहास लिखते समय – सोलहवीं शताब्दी की महान् वीरांगना रानी अब्बक्का चौटा,अठारहवीं शताब्दी की महान् वीरांगना वेलु नचियार और उन्नीसवीं सदी की भारत की प्रथम बलिदानी रानी चेन्नम्मा के बलिदान को हाशिये में भी नहीं रखा।













