गुजरात के अहमदाबाद में सड़क विकास के मार्ग में रोड़ा बन रही मांचा मस्जिद के एक हिस्से को तोड़ने के सरकारी फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी है। इसी के साथ कोर्ट ने इसके खिलाफ दायर मस्जिद ट्रस्ट की याचिका को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ये कार्य जनता के हित को ध्यान में रखकर किया जा रहा है और इसमें मंदिरों से लेकर घरों तक सभी को झेलना पड़ रहा है।
इससे पहले इस मामले में मस्जिद ट्रस्ट ने गुजरात हाई कोर्ट में दायर की थी, लेकिन जब वहां भी कोर्ट ने ऐसा ही फैसला दिया तो वे सुप्रीम कोर्ट चले गए। जहां मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्या बागची की बेंच ने मस्जिद की इबादतगाह को सुरक्षित करने की याचिका को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि कानून सबके लिए बराबर है।
सड़क प्रोजेक्ट की शुरुआत
दावा किया जाता है कि करीब 400 साल पहले इस मस्जिद को शहर के सरसपुर इलाके में बनाया गया था। इसकी देखभाल मांचा मस्जिद ट्रस्ट करता है। लेकिन अब शहर की भीड़भाड़ से निजात पाने के लिए गुजरात सरकार ने सड़क चौड़ी करने का प्लान बनाया। कोशिश है ट्रैफिक कम करना, कालूपुर रेलवे स्टेशन को मेट्रो से जोड़ना और शहर को और चमकदार बनाना।
परियोजना में मस्जिद के चबूतरे का एक छोटा सा हिस्सा और बगल की खाली जमीन प्रभावित हो रही है, लेकिन मुख्य इबादतगाह को कोई खतरा नहीं। इसी प्रोजेक्ट में एक मंदिर भी तोड़ा गया, और आसपास के लोग खुद-ब-खुद अपनी दुकानें-घर सौंप रहे हैं। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि ये सब जनहित में हो रहा है, और कोई भेदभाव नहीं।
हाईकोर्ट में नगर निगम का बयान
इस मामले में हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अहमदाबाद नगर निगम ने बताया कि गुजरात प्रांतीय नगर निगम एक्ट (जीपीएमसी एक्ट) के हर नियम को बारीकी से फॉलो किया गया। निगम की वकील आस्था मेहता ने कोर्ट को समझाया कि सिर्फ चबूतरा का एक टुकड़ा जाएगा, मस्जिद का दिल यानी प्रार्थना कक्ष बिल्कुल सलामत रहेगा। हाईकोर्ट ने माना कि निगम ने सब सही किया। ट्रस्ट ने विरोध किया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि जनता का फायदा पहले। ये सुनवाई पहले हुई, जिसके बाद मामला ऊपर चला गया।
सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका खारिज
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने 18 अक्टूबर को सुनवाई की। ट्रस्ट के वकील ने जोर देकर कहा कि इबादतगाह को बचाओ, ये हमारी आस्था का सवाल है। लेकिन निगम की तरफ से आस्था मेहता ने काउंटर किया कि प्रोजेक्ट में मंदिर भी गया, और कोई शोर नहीं मचाया गया। बेंच ने सुनते हुए कहा, “ये अनुच्छेद 25 का धार्मिक अधिकार का केस नहीं।” उन्होंने साफ बोला कि अगर वक्फ बोर्ड साबित कर दे कि जमीन वक्फ की है, तो मुआवजा मिलेगा।
वरना, नमाज के लिए नई जगह ढूंढ लो। जजों ने ये भी कहा कि हाईकोर्ट का फैसला सही है, निगम ने एक्ट का ईमानदारी से पालन किया। जब वकील ने इबादतगाह पर अड़ गए, तो बेंच ने टोका, “ऐसी कोई प्लानिंग नहीं, एक मंदिर तो गया ही।” बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है।















