अमेरिका ने अपने ताजा फरमान के तहत ईरान से तेल-गैस का लेन—देन करने वाली भारत सहित अन्य अनेक देशों की कंपनियों और कारोबारियों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। अमेरिका ने इन प्रतिबंधों की मुख्य वजह बताई है कि ‘ईरान इस कारोबार से प्राप्त पैसे का उपयोग आतंकवादी संगठनों को सहायता देने में कर रहा है।’ इस सूची में भारत के भी 8 व्यापारी शामिल हैं। सवाल है कि इस घटना का भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों, विशेषकर प्रस्तावित व्यापार संधि पर कितना और कैसा असर पड़ सकता है? इसके साथ ही यह फैसला भारत की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन के लिए भी एक चुनौती तो पेश करता ही है।
अमेरिका वर्षों से ईरान पर ‘अधिकतम दबाव’ नीति अपनाए हुए है और इसकी आड़ में अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाता आ रहा है। इस नीति का मकसद ईरान को उसके परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल विकास और आतंकवादी गुटों को कथित समर्थन देने से रोकना है। अमेरिका का मानना है कि ईरान की सरकार तेल और गैस निर्यात से कमाए गए पैसे का उपयोग हिज्बुल्लाह, हूती विद्रोही और अन्य गुटों को आर्थिक सहायता देने में करती है। इसलिए अमेरिका ने अनेक वैश्विक कंपनियों और व्यक्तियों को चेतावनी दी है कि वे ईरान से किसी प्रकार का ऊर्जा व्यापार न करें।
भारत, अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए, विविध स्रोतों से तेल और गैस आयात करता है। इसमें संदेह नहीं है कि ईरान ऐतिहासिक रूप से भारत के लिए एक विश्वसनीय और सस्ता ऊर्जा स्रोत रहा है। साथ ही, भारत-ईरान संबंध रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहे हैं, विशेषकर चाबहार पोर्ट परियोजना जैसे क्षेत्रों में सहयोग के कारण।
हालांकि, भारत का 2019 के बाद से ईरान से तेल आयात लगभग बंद सा ही रहा था। लेकिन हाल के वर्षों में संभवत: कुछ निजी व्यापारियों और कंपनियों ने संभावित रूप से ‘परोक्ष माध्यमों’ के जरिए ईरान से व्यापार फिर से शुरू किया हो। इस कारण अमेरिका ने अब 8 भारतीय कारोबारियों को भी प्रतिबंध सूची में शामिल किया है।
उल्लेखनीय है कि अमेरिका द्वारा भारतीय नागरिकों पर सीधे प्रतिबंध लगाने से दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव उत्पन्न हो। भारत इस पर आपत्ति जताए कि बिना किसी उचित न्यायिक प्रक्रिया के भारतीयों पर आर्थिक कार्रवाई की गई।
दूसरे, भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापक व्यापार समझौते या एफटीए पर लंबे समय से बातचीत चल रही है। अगर प्रतिबंधों को लेकर विवाद बढ़ता है, तो यह वार्ता और समझौता दोनों प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही, यदि अमेरिकी कंपनियों को यह संदेश जाता है कि भारत अमेरिका की प्रतिबंध नीति के विरुद्ध कार्य कर रहा है, तो भारत में निवेश को लेकर उनमें झिझक पैदा हो सकती है।
अमेरिका, भारत को तरल प्राकृतिक गैस और कच्चा तेल निर्यात करने वाला एक प्रमुख देश बनता जा रहा है। अगर यह विवाद गहराया, तो ऊर्जा क्षेत्र में चल रहे सहयोग कार्यक्रमों पर असर पड़ सकता है। भारत—अमेरिका और ईरान–दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करके चल रहा है। अमेरिका के प्रतिबंध भारत पर दबाव बना सकते हैं कि वह ईरान से पूरी तरह दूरी बनाए, जबकि भारत की रणनीतिक जरूरतें (जैसे अफगानिस्तान पहुंच के लिए चाबहार पोर्ट) इसे कठिन बनाती हैं।
भारत को व्यापार संधि को लेकर चल रही वार्ता में अब यह सुनिश्चित करना होगा कि अमेरिका द्वारा लगाए गए ऐसे एकतरफा प्रतिबंध भारत की संप्रभुता और कानून प्रक्रिया का उल्लंघन न करें। भारत के 8 कारोबारियों पर अमेरिका के प्रतिबंध एक संवेदनशील भू-राजनीतिक संकेत हो सकते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका अपने रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए एकतरफा कार्रवाई से नहीं हिचकेगा, भले ही इससे मित्र राष्ट्र प्रभावित हों। भारत को इस स्थिति में संतुलन साधने की जरूरत है। चुनौती है एक तरफ अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और व्यापारिक संबंधों को मजबूत रखना, तो दूसरी ओर अपनी ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करना।
यू.एस. राजस्व/विदेश विभाग के बयानों के आधार पर जिन भारतीय व्यक्तियों और कंपनियों पर प्रतिबंध की सूची दी गई है, उनमें से अधिकांश तेल और गैस के क्षेत्र में कार्यरत निजी कंपनियां और उनके स्वामी हैं, जैसे इंडिसोल मार्केटिंग के नीति उमेश भट्ट, हर्ष पेट्रोकेमिकल्स के कमल कन्हैयालाल कसत आदि। इनके अलावा अमेरिका ने इस कार्य में सम्मिलित जहाज संचालन/शिपिंग कंपनियों को भी सूची में शामिल किया है।

















