गत 7 अक्तूबर को कामठी (नागपुर) में ‘वाल्मीकि समाज सेवा मंडल’ द्वारा महर्षि वाल्मीकि जन्मोत्सव आयोजित किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी की महानता को तो हम सब लोग जानते हैं। हमारे जीवन में राम लाने वाले वही हैं। राम तो थे, और हो गए, परंतु घर-घर में राम महर्षि वाल्मीकि के कारण पहुंचे।
उन्होंने रामायण लिखी और सब तक पहुंचाई, क्योंकि उनके मन की संवेदना सबको अपना मानने वाली थी। दुनिया का दुःख दूर हो, इसलिए उन्होंने यह किया। उस पर चिंतन करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी का जयंती उत्सव मनाने के लिए हम यहां एकत्रित हैं। उत्सव मनाते हैं, तो उत्साह बढ़ता है। लेकिन कौन-सा उत्साह बढ़ना चाहिए? तो जिनका उत्सव मनाते हैं, उनके जीवन के जो गुण हैं, उन गुणों का आचरण, अनुकरण करने का उत्साह बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी ने दुनिया का दुःख दूर करने के लिए रामायण लिखी। अगर दुनिया का दुःख दूर होना है, तो कोई जादू से दूर नहीं होता। दुःख क्यों पैदा होता है? दुःख हम लोग ही पैदा करते हैं। अपने स्वयं के जीवन में भी दुःख पैदा करने वाले हम ही हैं। दोष दूसरों को देते हैं। लेकिन कहीं न कहीं हमारा ही कर्म हमको हानि पहुंचाता है।
हमारे मन में स्वार्थ, भेद है, हम किसी नियम में बैठते नहीं, हम अपने आपको सबसे अलग और बड़ा मानते हैं, बाकी लोगों को नीच मानते हैं, ये बातें मन के अहंकार के कारण उत्पन्न होती हैं, उसके कारण जीवन में दुःख होता है। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि जी ने केवल कथा नहीं लिखी, उनका स्वयं का जीवन ऐसा था। उनके कथा के नायक राम थे, वह वास्तविक थे, कल्पना नहीं थे।
उन्होंने देखकर उनका जीवन लिखा। ऐसा उत्तम चरित्र उन्होंने स्वयं चरितार्थ किया, जो चरितार्थ कर रहा था उसकी कहानी बताई। इसलिए बताई कि यह संस्कारों की परंपरा, गुणवत्ता की परंपरा, विश्व के प्रति सद्भाव की परंपरा सतत चलती रहे। उल्टी-सीधी परिस्थिति आती है। लेकिन दिमाग ठिकाने पर रहे, मन में शांति रहे, मन में प्रेम रहे, सद्भावना रहे और कष्ट उठाकर भी, सहन करके भी, लोग अच्छाई के मार्ग पर चलें, बुराई के मार्ग पर न चलें।
इस अवसर पर सांसद सुमित्रा वाल्मीकि, अंशु रघुवंशी, विदर्भ प्रांत सह संघचालक श्रीधर गाडगे और विधायक आशीष जायसवाल उपस्थित रहे।

















