डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की और संघ का उद्देश्य स्वाधीनता संग्राम को सकारात्मक गति देकर, हिंदुत्व तथा भारत राष्ट्र की रक्षा करना बना। महाकौशल में स्वाधीनता संग्राम के साथ संघ का विस्तार हो रहा था। शाखाएं स्थापित हो रही थीं, जिनमें हिन्दुओं के सभी वर्गों से स्वयंसेवकों का प्रतिनिधित्व बढ़ने लगा था। ऐसे लोगों में व्यौहार राजेंद्र सिंहा का नाम उल्लेखनीय है।
व्यौहार राजेंद्र सिंहा के परिवार का संबंध विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती के मंत्री और सेनापति आधार सिंहा से है। उनका जन्म जबलपुर में भाद्रपद शुक्लपक्ष षष्ठी विक्रम संवत्सर 1957 (14 सितम्बर 1900) को जबलपुर के “व्यौहार” कायस्थ राजवंश में हुआ था। वर्ष 1917 में लोकमान्य तिलक के जबलपुर आगमन के बाद वह स्वाधीनता संग्राम से जुड़ गए। महात्मा गांधी 1933 में जब नगर में पधारे, तब उनके निवास पर अतिथि के रूप में रहे।
जबलपुर में 1934 में संघ कार्यालय सिमरिया वाली कोठी में प्रारम्भ हुआ था और संघ शाखा का शुभारंभ चंद्रकांत ठोसर के अनुसार 6 जुलाई 1935 को हुआ था। केतकर जी के द्वारा पुराना बरफ घर वर्तमान में नर्मदेश्वर मंदिर राइट टाउन में प्रथम शाखा प्रारंभ हुई। ठोसर जी के अनुसार दो-तीन माह बाद शाखा श्रीनाथ की तलैया में लगना प्रारंभ हुई। यह बाबा साहब, व्यौहार राजेंद्र सिंहा और दादा राव परमार्थ की प्रेरणा से कार्य आरंभ हुआ। सन् 1939 में एकनाथ जी रानाडे प्रथम प्रांत प्रचारक बनकर आए।
सिमरिया वाली कोठी से संघ कार्यालय कृष्ण कुंज बना और शाखा लगने लगी तब प्रथम नगर संघ चालक पंडित कुंजीलाल दुबे बने थे, तभी से व्यौहार राजेंद्र सिंहा का जुड़ाव संघ से हुआ। दूसरी शाखा गोल बाजार (वर्तमान में शहीद स्मारक) में प्रारंभ हुई। इस शाखा में 24 मार्च 1939 में परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी एवं परम पूज्य गुरु जी आए थे, वे भी पूर्ण गणवेश में। वहां करीब 400 स्वयंसेवक उपस्थित थे, उक्त कार्यक्रम में पंडित कुंजीलाल दुबे, श्रीराम नन्होरिया एडवोकेट तथा सर कार्यवाह मोती शंकर झा उपस्थित थे।
व्यौहार राजेंद्र सिंहा के पोते डॉ. अनुपम सिंहा जो स्वयं इतिहास मर्मज्ञ हैं, उनसे और उनके अभिलेखागार से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 24 मार्च 1939 को प्रातः काल में शाखा के उपरांत डॉ. हेडगेवार एवं श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का प्रवास व्यौहार राजेंद्र सिंहा के यहां हुआ, जहां संघ पर गहन विचार-विमर्श हुए। उन्होंने व्यौहार वंश के जुगल किशोर मंदिर के दर्शन भी किए। 1939 में वीर सावरकर भी जबलपुर व्यौहार राजेंद्र सिंहा के यहां आए थे और उन्होंने भी जुगल किशोर मंदिर के दर्शन किये थे।
व्यौहार राजेंद्र सिंहा का स्वाधीनता संग्राम में उल्लेखनीय योगदान रहा। वर्ष 1939 में जबलपुर में हुए त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के समय उन्होंने त्रिपुरी का इतिहास लिखा। 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में 6 माह तथा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दो वर्ष का कारावास भोगा।
हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार थे
यद्यपि व्यौहार राजेन्द्र सिंह का संस्कृत, बांग्ला, मराठी, गुजराती, मलयालम, उर्दू, अंग्रेज़ी आदि पर भी बहुत अच्छा अधिकार था परन्तु फिर भी हिंदी को ही राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया। अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व सर्वधर्म सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहां उन्होंने सर्वधर्म सभा में हिन्दी में ही भाषण दिया जिसकी प्रशंसा हुई। हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार थे, जिन्होंने हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने की दिशा में अति महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके पौत्र डॉ. अनुपम सिंहा के अनुसार व्यौहार राजेंद्र सिंहा के पचासवें जन्मदिन के दिन ही, अर्थात् 14 सितम्बर 1949 को, हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। यह शुभ समाचार दिल्ली से सबसे पहले जबलपुर के तत्कालीन सांसद सेठ गोविन्ददास ने भेजा क्योंकि इस विशेष दिन को ही राजभाषा-विषयक निर्णय लिए जाने के लिए उन्होंने प्रयास किये थे।
दुर्लभ पांडुलिपियों, पुस्तकों और पत्रों का अनमोल संग्रह
व्यौहार निवास में दुर्लभ पांडुलिपियों, पुस्तकों और पत्रों आदि का अनमोल संग्रह था। अतिविशिष्टता (वी.आई.पी. संस्कृति) के वो सख्त विरुद्ध थे। यद्यपि अपनी युवावस्था में वे “राजन” के नाम से संबोधित किये जाते थे, परन्तु अपनी सादगी, अपनत्व व्यवहार के कारण कुछ आत्मीय जन उन्हें “काकाजी” भी संबोधित करते थे। वे गांधीवादी थे और वृद्धावस्था व रुग्णावस्था में भी उन्होंने किसी महानगर के अतिविशिष्ट या बहुविशेषज्ञता वाले अस्पताल में जाने से मना कर दिया था। उनका निधन स्थानीय शासकीय विक्टोरिया जिला अस्पताल (अब सेठ गोविन्ददास जिला चिकित्सालय) में 2 मार्च 1988 को हुआ।
100 से अधिक ग्रंथों की रचना की
व्यौहार राजेन्द्र सिंहा ने हिंदी के लगभग 100 से अधिक बौद्धिक ग्रंथों की रचना की, जो सम्मानित-पुरस्कृत भी हुईं और कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से संस्तुत-समाविष्ट भी की गईं। ‘साहित्य वाचस्पति’, ‘हिन्दी भाषा भूषण’, ‘श्रेष्ठ आचार्य’, ‘कायस्थ रत्न’ आदि कई अलंकरणों से व्यौहार राजेन्द्र सिंह को विभूषित किया गया। उनके नाम से ही जबलपुर के एक हिस्से को व्यौहार बाग के नाम से जानते है।
मुख पृष्ठ का डिजाइन व्यौहार राममनोहर सिंहा ने किया
26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान – अंगीकृत, अधिनियमित, आत्मार्पित किया गया (स्वीकार किया गया)और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। संविधान के मुख पृष्ठ – प्रस्तावना पृष्ठ का अभिकल्प (डिजाइन) जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संघ के सहभागी व्यौहार राजेंद्र सिंहा के सुपुत्र व्यौहार राममनोहर सिंहा जी ने तैयार किया तदुपरांत “राम “शब्द भी अंकित किया। संविधान में अंकित भारतीय सांस्कृतिक विरासत के 22 चित्रों में से 12 चित्र डॉ. राममनोहर सिंहा जी के हैं।

स्कंद पुराण में वर्णित सागर मंथन से लिए सप्त प्रतीक
गौरतलब है कि डॉ. राममनोहर सिंहा ने स्कंद पुराण में वर्णित सागर मंथन से सप्त प्रतीक लिए थे, और डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल का समर्थन प्राप्त था, इसलिए इन्हें भी तत्कालीन नेहरु सरकार का कोप भाजन बनना पड़ा।इतना ही नहीं डॉ. राममनोहर सिंहा की रिश्तेदारी जयप्रकाश नारायण जी से होने के कारण, उन्हें सन् 1975 के आपातकाल में चिन्हित करके रखा गया। यह कितना दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है, कि जिस मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू देवियों और भारत माता के नग्न चित्र बनाये, उसे कांग्रेस सरकार ने सभी नागरिक सम्मान दे डाले, दूसरी ओर हिंदू धर्म और संस्कृति के चित्र संविधान में उकेरने वाले चित्रकार डॉ. राममनोहर सिंहा का नाम तो नागरिक सम्मान के लिए दिल्ली गया, परन्तु जानबूझकर कभी दिया नहीं गया।
















