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हृदयों के प्रशिक्षण का महाविद्यालय है संघ

संघ स्थापना के आरंभिक वर्षों में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार का यह उद्गार संघ की कार्यपद्धति का ही नहीं, स्वयं डॉ. हेडगेवार के हृदय का भी दर्पण है। यह वाक्य संघ के मर्म को समझने की आधारभूत कुंजी है।

Written byडॉ. इंदुशेखर तत्पुरुषडॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष — edited by Sudhir Kumar Pandey
Oct 2, 2025, 07:05 pm IST
in संघ @100

“In our country there are so many colleges of arts, but there are no collages for hearts.”

अपने देश में कला प्रशिक्षण के तो कई महाविद्यालय हैं, किन्तु हृदयों के प्रशिक्षण का कोई महाविद्यालय नहीं है। मेरी यह आकांक्षा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हृदयों के प्रशिक्षण का महाविद्यालय बने”– (पृष्ठ सं. 375, “डॉ. हेडगेवार चरित”– ना.ह. पालकर)

संघ स्थापना के आरंभिक वर्षों में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार का यह उद्गार संघ की कार्यपद्धति का ही नहीं, स्वयं डॉ. हेडगेवार के हृदय का भी दर्पण है। यह वाक्य संघ के मर्म को समझने की आधारभूत कुंजी है।

आज एक शताब्दी बाद यह जानना प्रासंगिक होगा कि क्या डॉ. हेडगेवार जी की वह आकांक्षा पूरी हुई? क्या आरएसएस देश में मानव हृदयों के प्रशिक्षण का महाविद्यालय बन सका? जाति, वर्ण, भाषा, भूगोल आदि की विविधताओं और विषमताओं से भरे भारतवर्ष में सभी को एक सूत्र में पिरोने में संघ कितना सफल हो सका?

आज यह प्रश्न इसलिए आवश्यक है कि एक ओर समाज में संघ की स्वीकार्यता निरंतर बढ़ती जा रही है, हर क्षेत्र में संघप्रेरित कार्यकर्ता आगे बढ़कर देश का नेतृत्व कर रहे हैं, तो दूसरी ओर संघ के विरोधी इसे न केवल सांप्रदायिक संगठन कहते रहे, जब तब इस पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग करते रहे हैं। ऐसे में यह देखना प्रासंगिक होगा कि सत्य क्या है? इन सौ वर्षों में जब–जब देश और समाज पर संकट आया, कौन जान हथेली पर रखकर आगे बढ़ा? भारतीय जनता ने किस पर भरोसा किया? संघ पर अथवा संघ की निंदा करने वालों पर?

1925 में भारत में दो संगठनों की नींव रखी गई

इतिहास के झरोखे से देखें तो सन् 1925 में भारत में दो संगठनों की नींव रखी गई। एक था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसका आरम्भ एक जन्मजात देशभक्त युवक ने नागपुर में 15–20 स्थानीय नवयुवकों को साथ लेकर किया। दूसरा संगठन संसारभर में विख्यात हो चुकी कम्युनिस्ट पार्टी का था, जिसका गठन कानपुर में देश के विभिन्न प्रांतों से एकत्र हुए सैकड़ों प्रबुद्ध लोगों ने किया। सन् 1917 की रूस की क्रांति की कीर्ति के कारण कम्युनिस्ट पार्टी आरंभ में ही देशभर में फैल गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तो रूस, चीन जैसी अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों का समर्थन भी मिलने लगा था। देश के सभी प्रमुख संस्थानों पर साम्यवाद और समाजवाद की गहरी छाप थी। जबकि संघ को आरंभिक वर्षों में नागपुर से बाहर कोई नहीं जानता था। देश स्वाधीन होने के बाद उस पर न केवल प्रतिबंध लगाया गया, सरकारों द्वारा संघ के कार्यकर्ताओं को निराधार लांछित और प्रताड़ित किया गया। किन्तु सबकी उपेक्षा और तिरस्कार झेलते हुए भी वे चुपचाप अपना कार्य करते रहे।

आज एक शताब्दी बाद जब हम दोनों संगठनों की स्थिति का आकलन करते हैं तो इनका अंतर स्वत: मुंह बोलता है। सारी दुनिया को बदलने का दावा करने वाले तथा देश में क्रांति करके सत्ता प्राप्ति का स्वप्न देखने वाले कम्युनिस्ट एक कोने में सिमटकर रह गए। जबकि आज देश का कोई ऐसा कोना नहीं, जहां संघ का वर्चस्व नहीं, संघ की उपस्थिति नहीं।

व्यक्ति को संस्कारित कर हृदय से जोड़ता है संघ

किसी संगठन की ऐसी असाधारण ऐतिहासिक उपलब्धि केवल और केवल जनता के हृदयों को जोड़ने से होती है। कोरी बौद्धिकता झाड़ने और सिद्धांत बघारने से वैचारिक हलचल तो होती, लेकिन व्यक्ति नहीं जुड़ता। व्यक्ति का मन नहीं जुड़ता। व्यक्ति जुड़ता है भरोसे से, प्रेमपूर्ण व्यवहार से, निस्वार्थ सेवा और समर्पण भाव से। इसलिए संघ सैद्धांतिक तर्क–वितर्क एवं शास्त्रार्थ के पचड़े में नहीं पड़ता। दिखावटी बौद्धिक वातावरण बनाने में शक्ति खर्च नहीं करता। उसका स्पष्ट ध्येय है व्यक्ति को संस्कारित करना, समाज की संगठित शक्ति खड़ा करना और समाज के बीच में प्रत्यक्ष उपस्थित होकर यथावश्यक कार्य करना। उसके असाधारण कार्यविस्तार एवं व्यापक जनस्वीकृति का यही एकमात्र आधार था। इतिहास साक्षी है कि जिन्होंने तथाकथित वैचारिक क्रांतिकारी पैदा किए वे आपस में ही मार–काट में लग गए। स्वयं को प्रतिष्ठापित करने में ही उनकी शक्ति चुक गई। किन्तु जिन्होंने हृदयों को जोड़ने की पाठशालाएं चलाई, समाज ने उन्हें अपने हृदय में बैठा लिया। व्यक्तियों को जोड़ने की वे छोटी–छोटी पाठशालाएं आज विश्वभर का व्यक्ति निर्माण का सबसे बड़ा विश्विद्यालय बन गया।

संघ का मंत्र है हिंदू जीवनदृष्टि

डॉक्टर हेडगेवार ने संघ प्रारंभ करते समय ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वे संघ के माध्यम से न तो कोई नई विचारधारा खड़ी करना चाहते हैं, न किसी नए वाद का प्रवर्तन। वे उस भारतीय परंपरा को ही सुदृढ़ करना चाहते थे जो देश में हजारों वर्षों से चली आ रही थी एवं भारत की मौलिक पहचान रही है। संघ में नया अगर कुछ था तो वह भारत के सनातन विचार को परिभाषित, प्रस्थापित एवं प्रसारित करने की कार्यप्रणाली थी। उसका युगानुरूप मैकेनिज्म और मैनेजमेंट था। उसका यंत्र–तंत्र नया था। मंत्र वही भारत का शाश्वत, सनातन धर्मबोध था जिसे हिंदू जीवनदृष्टि के रूप में देखा जाता हैं।

डॉ. केशव राव ने अपने समय और समाज का सूक्ष्म अध्ययन कर यह पाया कि भारत में आदिकाल से विद्यमान भारतीय लोग, जो कालान्तर में संसार में हिंदू नाम से प्रसिद्ध हुए, इस परम्परा के संवाहक रहे हैं। यह सभ्यता निर्मित हुई तो इन्हीं के उद्यम से और विकृत हुई तो इन्हीं के प्रमाद से। यूनानी, शक, हूण, कुषाण, अरबी, मुगल और अंग्रेजों से संघर्ष भी इसी हिन्दू समाज ने किया। आतताइयों के आघात भी सर्वाधिक इसी समुदाय ने झेले। जब तक यह हिंदू समाज अपने धर्म का पालन करता हुआ एकात्म रहा, भारतवर्ष ऐश्वर्य सम्पन्न रहा। सम्पूर्ण विश्व में इसकी कीर्ति पताका फहरी। किन्तु जब यह धर्मच्युत होकर भेदग्रस्त हो गया तो देश परकीयों का गुलाम होता चला गया। इसका सारा वैभव, गरिमा जाती रही। इतना ही नहीं, भारत के जिस–जिस क्षेत्र में हिन्दू समाज क्षीण अथवा दुर्बल हुआ, वह भूभाग इस विशाल राष्ट्र से या तो अलग हो गया अथवा वहां से अलगाव के स्वर फूटने लगे। अतः उन्होंने इस राष्ट्र की समृद्धि के मूल कारक हिन्दुओं को संगठित और संस्कारित करने का बीड़ा उठाया।

संघ पर आरोप मढ़ने का कुचक्र चला

पराधीन भारत उस समय एक विचित्र दौर से गुजर रहा था। हिन्दुओं में परस्पर भेदभाव तो चरम पर था ही, अपने हिन्दूपन के प्रति आत्मग्लानि और दैन्यभाव भी शिखर पर था। वह एक ऐसा भीषण कालखंड था कि हिंदू जनमानस में ऐसे विचारों का उठना तो दूर, हिंदू शब्द का उच्चारण भी लज्जास्पद माना जाता था। इस दृष्टिभेद के कारण केशवजी की दृष्टि में जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य था, तत्कालीन नेताओं और समाज सुधारकों की दृष्टि में वही कार्य सबसे उपेक्षित और अनुचित था। संघ पर मिथ्या और मनगढ़ंत आरोप मढ़ने के कुचक्र भी तभी से प्रारंभ हुए। यह लांछन लगाया जाता रहा कि संघ हिन्दू समाज को संगठित करने का उपक्रम है इसलिए यह अहिंदुओं, विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों के विरोध में खड़ा एक सांप्रदायिक संगठन है। जबकि संघ कार्य किसी भी संप्रदाय, मत या मजहब के प्रतिपक्ष में नहीं है, जैसा अधिकतर लोगों को अक्सर और कुछ लोगों को पहली नजर में प्रतीत होता है। हां, यह राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और नीतियों के प्रतिपक्ष में अवश्य रहा है। इन मुद्दों पर गहराई से विचार करना आवश्यक है। यह भी विचार किया जाना आवश्यक है कि भारत में हिंदुत्व का आधार क्यों अपरिहार्य है जो कि किसी भी प्रतिक्रिया में नहीं “सर्वेषाम् अविरोधेन” की प्रेरणा से है?

मुसलमानों का आधिपत्य रहा पर इस्लाम का वर्चस्व नहीं

वस्तुत: हिंदुत्व का आग्रह यदि किसी प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ होता तो इसे बहुत पहले –19वीं शताब्दी से बहुत पहले ही प्रकाश में आ जाना चाहिए था। उस कालखंड में भी हिन्दू समाज पर कम अत्याचार नहीं हुए। जजिया कर, बलात् कन्वर्जन, मंदिरों का विध्वंस होता ही था। उस कालखंड में भी हिंदू समाज को दिशा और गति देने के प्रयास होते रहे, किंतु अपनी पहचान को इस तरह सुपरिभाषित करने, उसे “हिंदुत्व” जैसा नाम देने की चेष्टा नहीं हुई। इस पर विचार करें तो हम पाएंगे कि तब संघर्ष अधिकतर राजनैतिक और किंचित् सामाजिक स्तर पर ही था। उस स्तर का सांस्कृतिक संघर्ष नहीं था कि अपनी पहचान का संकट खड़ा हो जाए। अरब–मुग़ल आक्रमण के समय भी हिन्दुओं का इस्लाम से वैसा संघर्ष नहीं हुआ, जैसा अंग्रेजी राज में था। यह बात ध्यान रखने की है कि उस समय हिंदू शासकों का तो मुस्लिम सत्ता से संघर्ष हुआ पर जन सामान्य का इस्लाम से वैसा संघर्ष नहीं हुआ। भारत में मुसलमानों का आधिपत्य रहा पर इस्लाम का वर्चस्व नहीं रह पाया।

हिन्दुओं के सांस्कृतिक जीवन की धुरी नहीं बदली

मज़हबी अत्याचार भी भारत के मजबूत सांस्कृतिक–सामाजिक ढांचे की टक्कर में हिन्दू परम्परा और पहचान को नष्ट नहीं कर सके। हिन्दुओं के सांस्कृतिक जीवन की धुरी नहीं बदली थी। किंतु इधर 19वीं और 20वीं शताब्दी के मध्य अंग्रेजी राज के साथ आधुनिकतावाद, मानववाद, भौतिकवाद, समाजवाद, साम्यवाद, व्यक्तिवाद, राजनैतिक राष्ट्रवाद, वैज्ञानिकतावाद आदि पश्चिमी विचारों और यूरोपीय शिक्षा ने भारत के सम्मुख जो चुनौतियां खड़ी की उनके प्रतिकार स्वरूप भारत की समग्र मेधा को एक वैचारिक अधिष्ठान की आवश्यकता हुई। इधर मुसलमानों के वे दुराग्रह जो अब तक सांस्कृतिक दृष्टि से चुनौती नहीं बने थे, –अपितु भारत में इस्लाम का भारतीयकरण भी होने लगा था– अब अंग्रेजों के उकसावे में आकर विकृत रूप में प्रकट होने लगे थे। अतः आक्रामक अंग्रेजी राज, इस्लाम, ईसाइयत, पश्चिमी भौतिकवाद आदि के समवेत आक्रमण के प्रतिकार में, –उन सभी दुराग्रहों के प्रतिकार स्वरूप जो भारतीय जीवनदृष्टि के प्रतिकूल थे– हिंदुत्व का आग्रह अपरिहार्य होता चला गया। भारतीय नायकों ने तात्कालीन सभी चुनौतियों का सटीक उत्तर जिस आधार पर दिया, वह हिंदुत्व ही था। अंग्रेजों के वर्चस्व से आहत भारतीया मनीषा ने स्वयं को स्थापित और सुपरिभाषित करने के लिए हिंदुत्व को अपना मूलस्वर बनाया। महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, बालगंगाधर तिलक, महर्षि अरविंद, विनायक सावरकर, डॉ. केशव राव हेडगेवार आदि के प्रयास इसी शृंखला की भिन्न-भिन्न कड़ियां हैं। इनके प्रयासों के नाम भले ही कुछ भी रहे हों, मूल में हिन्दू दृष्टि ही थी।

क्या है हिंदुत्व की अवधारणा

जब तक हम इस बात को नहीं जान लेते संघ के हिंदुत्व दर्शन को हम ठीक से नहीं समझ सकते। महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदुत्व केवल हिंदुओं के लिए नहीं अपितु संपूर्ण राष्ट्र के लिए है। राष्ट्र से आगे संपूर्ण विश्व के लिए है। हिंदुत्व की अवधारणा सर्वसमावेशी और सर्वस्पर्शी है। इसलिए हिंदू राष्ट्र का विचार न मुस्लिम संप्रदाय के विरुद्ध है, न इसाईयों के और न ही किसी अन्य संप्रदाय के। यही नहीं यह किसी नास्तिक मत के विरोध में भी नहीं है। किन्तु संघ विरोधी लोगों द्वारा इस ठोस यथार्थ की अनदेखी कर, प्रतिक्रियावादी राजनैतिक लोगों के वक्तव्यों को आधार बनाकर संघ के प्रति निरंतर मिथ्या प्रवाद फैलाया जाता है। और यह समस्या आज की नहीं, तब से है, जब से संघ प्रारम्भ हुआ। आज जब वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत सबका डीएनए एक होने की बात कहते हैं, तो संघ विचार से अनभिज्ञ लोग इसे आश्चर्य से देखते हैं और इसमें राजनीति खोजने का प्रयास करते हैं। कुछ लोग इसमें संघ के सिद्धांतों में विचलन की आशंकाएं प्रकट करते हैं। संघ तत्वदर्शन के प्रामाणिक व्याख्याकार श्रीगुरुजी इस प्रकार की आशंकाओं को मूर्खतापूर्ण और घातक मानते हैं। ऐसे प्रश्नों का उन्होंने जो उत्तर तब दिया, संघ का आज भी वही उत्तर है। गुरुजी कहते हैं-

“….कुछ लोगों का अनुमान है कि हिंदू राष्ट्र की हमारी कल्पना मुसलमान और ईसाई नागरिकों के अस्तित्व के लिए चुनौती है। वह निकाल बाहर किए जाएंगे तथा उनका उन्मूलन हो जाएगा। हमारी राष्ट्रीय भावना के लिए इससे अधिक मूर्खतापूर्ण अथवा घातक और कुछ नहीं हो सकता यह तो हमारे महान् एवं सर्वग्राही सांस्कृतिक दाय का अपमान है। (पृष्ठ सं. 132, “विचार नवनीत”– ज्ञान गंगा प्रकाशन, जयपुर)

हिंदुत्व के प्रतिक्रियावादी और विरोधमूलक स्वरूप के प्रति गुरुजी सदैव सजग रहते थे। संघ शिक्षा वर्ग–1969 के एक बौद्धिक में वे कहते हैं– “हम हिंदू क्यों हैं? ईसाई नहीं हैं, मुसलमान नहीं हैं, इसलिए हिंदू हैं क्या? ऐसा नकारात्मक विचार रहा तब संगठन की कोई आवश्यकता नहीं। इस हिंदू शब्द का कोई ठोस अर्थ है क्या? इसका विचार करेंगे तभी संगठन करने की प्रेरणा मिलेगी।(पृष्ठ सं. 261, “श्री गुरुजी समग्र”– खंड 4, सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली)

इसी भांति कार्यकर्ताओं की एक बैठक में श्रीगुरुजी कहते हैं– “जो अपने आप को कट्टर हिंदू कहते हैं उनकी भावना का भी यदि हम विश्लेषण करें तो बड़ी विचित्र स्थिति दिखाई पड़ती है। हिंदू हमारा उपनाम मात्र बन गया है। हिंदू याने पॉलिटिकल हिंदू , मुसलमान के खिलाफ बोलने वाला हिंदू, ईसाइयों के विरोध में प्रचार करने वाला हिंदू। हिंदू का यह नकारात्मक रूप ठीक नहीं है। हिंदुत्व की अनुभूति हमें अपनी आत्मा में होनी चाहिए। प्रतिक्रियात्मक हिंदू किसी भी काम का नहीं।…
(पृष्ठ सं. 135, “श्री गुरुजी समग्र”– खंड 3, सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली)

हिंदू राष्ट्र को लेकर संघ का मत है

हिंदू राष्ट्र को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मत है कि भारत सनातन हिंदू राष्ट्र है। हजारों वर्ष पूर्व अपने गौरवकाल में भी यह हिंदू राष्ट्र था, अपने राजनैतिक पराभव और परतंत्रता के काल में भी यह हिंदू राष्ट्र ही रहा और आज भी यह हिंदू राष्ट्र है। किसी राज्य की घोषणा के कारण नहीं, भारत अपने स्वभाव से हिन्दू राष्ट्र है। जब मन्दिर तोड़े जा रहे थे, हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया जा रहा था तब भी यह हिन्दू राष्ट्र था, अंग्रेजों की अधीनता के काल में भी यह हिन्दू राष्ट्र था। और आज जब देश स्वाधीन है, तब भी यह हिन्दू राष्ट्र है। राजनैतिक सामर्थ्य की दृष्टि से भले ही यह कभी सबल, कभी निर्बल रहा हो। राज्य के प्रचलित अर्थों में धर्मनिरपेक्ष अथवा धर्मविरोधी होने पर भी इसका हिन्दू राष्ट्र का स्वरूप तब तक अक्षुण्ण है, जब तक इसका अधिसंख्यक समाज हिन्दू परम्परा के अनुसार अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। हिन्दू राष्ट्र के संबंध में संघ का यही निर्भ्रांत मत है। जो सदियों से एक सांस्कृतिक प्रवाह के रूप में चलता आ रहा राष्ट्र है, उसे क्या बनाना? और क्यों बनाना? उसे तो स्वीकार करने की जरूरत है।

आज परस्पर संघर्ष और प्रतिशोध के दावानल में झुलसते हुए विश्व को हिंदुत्व की दृष्टि ही सहअस्तित्व और समरसता का पाठ पढ़ाती हुई शांति और समृद्धि का मार्ग दिखाने में समर्थ है। हिंदुत्व ही सर्वमंगल एवं सर्वतोभद्र की कामना का चिरंतन स्वर है। इसी में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और संपूर्ण विश्व को एकात्म रूप में देखने वाला भारत का तत्व है, यही भारत का सत्व है।

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