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UNHRC में उघड़ गया जिन्ना का देश, भूला मानवाधिकारों के मायने, Baluchistan में ‘गायब’ हो रहे लोग, अत्याचारों की भरमार

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान से अपील की गई है कि वह इंटरनेट ब्लैकआउट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक खत्म करे, लोगों की शिकायतों पर ध्यान दे और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करे

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Oct 1, 2025, 03:57 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
बलूचिस्तान में जबरन गायब किए गए लोगों की संख्या 2025 के पहले छह महीनों में 785 तक पहुंच चुकी थी (File Photo)

बलूचिस्तान में जबरन गायब किए गए लोगों की संख्या 2025 के पहले छह महीनों में 785 तक पहुंच चुकी थी (File Photo)

जिन्ना का देश एक बार फिर बेनकाब हुआ है। दुनिया में शायद ही कोई और देश होगा जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उससे ज्यादा अपमानित हुआ होगा। ताजा मामला संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद का है। इसका 60वां सत्र चल रहा है। इस सत्र में जिन्ना के देश के अंदर मानवाधिकारों का जिस प्रकार हनन किया जा रहा है और इनसान की जान कितनी सस्ती हो चली है उसका एक अच्छा खासा खाका खींचा गया है और बताया गया है कि इस देश ने नागरिकों पर अत्याचार के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं।

UNHRC में पाकिस्तान की कलई खोली है अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक शोधकर्ता जोश बोव्स ने। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के इस 60वें सत्र की 34वीं बैठक चल रही थी कि उसमें पाकिस्तान में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों और बलूचिस्तान संकट पर लंबा व्याख्यान देकर बोव्स ने उपस्थित प्रतिनिधियों को हक्का बक्का कर दिया। उन्होंने पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों की किस प्रकार धज्जियां उड़ाई जा रही हैं उसकी पूरी तस्वीर सामने रखी।

जोश बोव्स ने अपने संबोधन की शुरुआत में पाकिस्तान में मानवाधिकारों की गंभीर स्थिति पर रोशनी डाली। उन्होंने विशेष रूप से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में हो रहे अत्याचारों की ओर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, बलूचिस्तान में जबरन गायब किए गए लोगों की संख्या 2025 के पहले छह महीनों में 785 तक पहुंच चुकी थी, जबकि 121 लोगों की हत्या की गई है। आंकड़ों के अनुसार, पश्तून समुदाय के 4000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।

पांथिक स्वतंत्रता के मामले में भी पाकिस्तान की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। 2025 की USCIRF रिपोर्ट के अनुसार, 700 से अधिक लोग ईशनिंदा के आरोप में जेल में हैं। यह संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 300 प्रतिशत ज्यादा है। प्रेस तो वहां बिल्कुल भी स्वतंत्र नहीं है। इस मामले में पाकिस्तान का स्थान विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 158वां है।

भूराजनीति के गहन जानकार, बोव्स ने UNHRC से अनुरोध किया कि वह यूरोपीय संघ के साथ सहयोग कर पाकिस्तान की मानवाधिकार स्थिति की निगरानी में और सहूलियत दिलवाए।

जिन्ना के देश में ‘आतंकवाद विरोधी कानूनों’ का दुरुपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। वहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रों और पत्रकारों को “प्रोस्क्राइब्ड पर्सन” घोषित करके उन पर दमन किया जाता है (File Photo)

बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान के भीतर एक उपेक्षित और संघर्षग्रस्त क्षेत्र रहा है। यहां रहने वाले नागरिकों की शिकायत रही है कि उन्हें राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से हाशिए पर रखा गया है। इस्लामाबाद की सत्ता द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाइयों, जबरन अपहरणों और बेलगाम यातनाओं ने इस क्षेत्र को मानवाधिकार संकट का केंद्र बना दिया है।

यहां सामूहिक कब्रों का मिलना और लापता लोगों के शवों का बरामद होना भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झकझोर कर रख गया था। बलूचिस्तान में आएदिन महिलाओं और बच्चों का विरोध प्रदर्शन हो रहा है। पाकिस्तान की पुलिस उन पर बर्बरता के सारे रिकार्ड तोड़ रही है। बच्चों तक पर लाठीचार्ज किया जाता है। लोगों को गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिया जाता है। पाकिस्तान में लोकतंत्र तो बस नाम का बचा है।

हैरानी की बात है कि पाकिस्तान ने हाल ही में एक अस्थायी आदेश पारित किया है। इस आदेश के तहत पुलिस वाले किसी व्यक्ति को 90 दिन तक बिना अदालत में पेश किए हिरासत में रख सकते हैं। यह आदेश हर लिहाज से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के खिलाफ है। और हैरानी की बात यह भी है कि पाकिस्तान खुद उन संधियों पर हस्ताक्षर किए बैठा है।

इतना ही नहीं, जिन्ना के देश में ‘आतंकवाद विरोधी कानूनों’ का दुरुपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। वहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रों और पत्रकारों को “प्रोस्क्राइब्ड पर्सन” घोषित करके उन पर दमन किया जाता है। उनकी आवाज को दबाया जाता है। इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने पाकिस्तान से अनुरोध किया है कि वह जबरन अगवा किए जाने को अपराध घोषित करके उसके दोषियों को सजा देने का प्रावधान करे। कारण यह कि जिन्ना के देश में, खासकर बलूचिस्तान में लोग आएदिन अगवा किए जाते हैं और सालों तक उनका पता नहीं चल पाता। ऐसे हजारों युवक अब तक वहां अगवा किए जा चुके हैं। उनके मुकदमे तक दर्ज नहीं हैं और घर वालों को उनकी कोई खोज खबर नहीं लग पाती।

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान से अपील की गई है कि वह इंटरनेट ब्लैकआउट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक खत्म करे, लोगों की शिकायतों पर ध्यान दे और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करे। कहा गया है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर जुल्म ढहाना बंद करे।

इसमें संदेह नहीं है कि जोश बोव्स जैसे कार्यकर्ताओं की पहल से यह मुद्दा वैश्विक मंच पर आया है। इससे उम्मीद की जा सकती है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के माध्यम से पाकिस्तान को जवाबदेह बनाया जा सकेगा। जोश बोव्स का वक्तव्य पाकिस्तान में, विशेष रूप से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में मानवाधिकार हनन की समस्या को सामने रखता है। इसके बाद भी अगर संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाएं इस पर ठोस कदम नहीं उठातीं, तो यह न केवल पीड़ितों के लिए न्याय मिलने की उम्मीदों पर पानी फेर देगा, बल्कि मानवाधिकार जैसे शब्दों का भी घोर अपमान होगा।

Topics: मानवाधिकारhuman rightsUNbaluchistanunhrcबलूचिस्तानसंयुक्त राष्ट्रपाकिस्तानPakistan
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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