88 हजार ऋषि मुनियों की तपस्थली, चारों वेदों और 18 पुराणों की रचनास्थली और 33 कोटि देव शक्तियों की वासस्थली के रूप में विख्यात तीर्थनगरी ‘नैमिषारण्य’ देश-दुनिया के सनातनधर्मियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। अनेकानेक शास्त्रीय उद्धरण इस सतयुगीन तीर्थ की धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता की पुष्टि करते हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार सतयुग में इसी पुण्यधरा पर जहाँ माँ सती के हृदय का अंग गिरा था; वहाँ आज माँ ललिता शक्तिपीठ स्थापित है। इस शक्तिपीठ की गणना माँ आदिशक्ति के 108 शक्तिपीठों में होती है। शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर आइये जानते हैं कि कौन हैं माँ ललिता और सनातन हिन्दू धर्म में क्या है उनका महात्म्य-
चेतना और सौंदर्य की साम्राज्ञी हैं त्रिपुरसुन्दरी माँ ललिता
माँ ललिता अर्थात आदिशक्ति का तीनों लोकों में सर्वाधिक सुन्दर स्वरूप। हिन्दू धर्मग्रंथों में लालित्य से परिपूर्ण माँ ललिता को त्रिपुर सुन्दरी के रूप में विभूषित किया गया है। कालिका पुराण में दस महाविद्याओं में प्रमुख माँ ललिता को सृष्टि की स्रोत, चेतना और सौंदर्य की साम्राज्ञी के रूप में चित्रित करते हुए महा त्रिपुरसुन्दरी, राजेश्वरी, षोडशी, ललिता, लीलावती और लीलामती, ललिताम्बिका, लीलेशी, लीलेश्वरी और ललिता गौरी के नामों से भी विभूषित किया गया है। श्री विद्या की अधिष्ठात्री माँ ललिता शिव और शक्ति के दिव्य मिलन की प्रतीक हैं।
आत्म-साक्षात्कार की राह दिखाती हैं माँ ललिता
माँ ललिता के अंदर 16 कलाएं विद्यमान हैं, इस कारण इन्हें षोडशी नाम से भी जाना जाता है। इन्हें मुक्ति की देवी भी कहा जाता है। इनकी आराधना करने से आध्यात्मिक उन्नति के साथ भौतिक संपन्नता और रूप-यौवन की भी प्राप्ति होती है। हिन्दू चिंतन के अनुसार निष्काम भाव से पूर्ण श्रद्धा से की गयी त्रिपुर सुंदरी माँ ललिता की आराधना चेतना और ब्रह्मांड की गहनतम आयामों में प्रवेश कराकर आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर से एकाकार होने की राह दिखाती है। माँ के इसी दिव्य स्वरूप के नमन वंदन के लिए शारदीय नवरात्र की पंचमी तिथि को माँ स्कंदमाता के पूजन के साथ माँ ललिता की भी आराधना की जाती है।
हृदय की रक्षा करती हैं माँ ललिता
दुर्गा सप्तशती के ‘देवी कवच’ में माँ ललिता को हृदय की रक्षा करने वाली शक्ति कहा गया है। माँ के ध्यान से हृदय की पीड़ा शांत होती है। वहीं दक्षिणमार्गी शाक्त साधना में देवी ललिता को ‘चण्डी’ का स्थान प्राप्त है। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि माँ ललिता हम सभी के अंतस में कुण्डलिनी ऊर्जा के रूप में विद्यमान हैं। साधना द्वारा जब यह शक्ति जागृत होती है तो साधक अपने भीतर असीम ऊर्जा का अनुभव करता है। शास्त्रों में माँ को प्रसन्न करने के लिए ‘ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै ललिताय नम:’ मंत्र का जाप, ‘ललिता सहस्त्रनाम स्तोत्र’ और ‘ललितात्रिशती’ का पाठ बहुत फलदायक बताया गया है। इन पाठों को करने से मन को व्यर्थ चिंताओं और नकारात्मक विचारों से मुक्ति तो मिलती ही है; माँ भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी कर उन्हें सुख, सौंदर्य, स्वास्थ्य, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करती हैं।
माँ ललिता का प्राकट्य और महात्म्य
पुराण ग्रंथों में माँ ललिता के प्राकट्य और महात्म्य के रोचक वृतांत मिलते हैं। देवीभागवत महापुराण की कथा के अनुसार कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न हुए ‘भांडासुर’ नाम के राक्षस का अंत करने के लिए आश्विन नवरात्र की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को माँ आदिशक्ति की चेतना से माँ ललिता का प्राकट्य हुआ था। एक अन्य कथा अनुसार आदिकाल में जब ब्रह्मा जी द्वारा छोड़े गए चक्र से पाताल समेत संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न होने लगी तो प्रलय की महाविनाश परिस्थितियों से रक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने माँ जगदम्बा की शरण ली। तब आश्विन शुक्ल पंचमी को माँ आदिशक्ति के अंश से प्रकट हुईं माँ ललिता ने उस विनाश चक्र को रोककर सृष्टि की रक्षा की थी।
ऐसे स्थापित हुआ माँ ललिता का शक्तिपीठ
पौराणिक मान्यता है कि पिता दक्ष के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह से क्षुब्ध भगवान शिव द्वारा उनकी देह को अपने कंधे पर टाँगे इधर-उधर डोलने से जब समूची धरती पर हाहाकार मच गया तो भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को 51 भागों में बांट दिया। चूँकि आदिशक्ति भगवान शिव को अपने ह्रदय यानी अंतस में धारण करती थीं और उनके ही अंतस से माँ ललिता का प्रादुर्भाव हुआ था; इसलिए नैमिषारण्य की पुण्य भूमि में जब माँ का हृदय भाग गिरा था तो यह शक्तिपीठ माँ ललिता के नाम से लोक विख्यात हो गया। श्रीमददेवीभागवत महापुराण के अनुसार एक बार परम भागवत परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने जब कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास से माँ आदिशक्ति के जाग्रत तीर्थों के बारे में पूछा था तब उन्होंने देवी के जिन 108 पवित्र स्थानों का वर्णन किया; उनमें उन्होंने प्रथम स्थान पर वाराणसी की विशालाक्षी देवी और दूसरे स्थान पर नैमिष की लिंगधारिणी देवी माँ ललिता को रखा था।
नवरात्रों में माँ के नमन को झुकते हैं लाखों शीश
यूँ तो सामान्य रूप से पुण्यधरा नैमिषारण्य के इस देवी धाम में प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु आते हैं लेकिन नवरात्र काल में यह संख्या लाखों में पहुँच जाती है। मंदिर के गर्भगृह में पूर्व दिशा में स्थापित माँ ललिता की सिद्ध दिव्य प्रतिमा के दर्शन अभीष्ठ फल देने वाले माने जाते हैं। माँ के मंदिर की बाहरी और भीतरी दीवारें इसकी प्राचीनता और भव्यता को दर्शाती हैं। मंदिर पुरोहित के अनुसार नवरात्र काल माँ ललिता धाम में मन्त्र जप के साथ ललिता सहस्रनाम, दुर्गा सप्तशती तथा देवी कवच और देवी चालीसा के अनवरत पाठ चलते रहते हैं।
नवरात्र के नौ दिनों में प्रतिदिन माँ का दिव्य श्रृंगार कर प्रातः और संध्याकाल पूरे विधि-विधान के साथ देवी का आरती वंदन किया जाता है। अष्टमी के दिन माता रानी को छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं। नवरात्र काल में बड़ी संख्या में लोग अपने बच्चों का मुंडन व अन्नप्राशन आदि संस्कार कराने भी माँ ललिता के धाम में आते हैं।












