अशोक जी का स्मरण आते ही श्रीराम जन्मभूमि का आन्दोलन मानस पटल पर घूमने लगता है। श्रीराम जन्मभूमि का स्मरण होते ही भारत के पांच शताब्दियों के संघर्ष की गाथा मानस पटल पर उभर आती है। एक विदेशी आक्रान्ता ने न केवल एक मंदिर को तोड़ा था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना पर कुठाराघात किया था। इस पीड़ा को लेकर भारत सदियों तक व्याकुल रहा। इन पांच सौ वर्षों में 76 बड़े संघर्ष हुए और लगभग पौने चार लाख लोगों ने बलिदान दिया। स्वतंत्र भारत में जब यह आंदोलन पुनः जागृत हुआ, तो यह केवल एक मंदिर निर्माण का आंदोलन न होकर राष्ट्रीय स्वाभिमान का उद्घोष बन गया।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी का संधिकाल हिंदू समाज के नवजागरण का काल बना। इस आंदोलन ने समाज में व्याप्त आत्मविस्मृति और हीनता की भावना को तोड़ते हुए हिंदू समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से पुनः जोड़ा। यह आंदोलन भारत की आत्मा, उसकी संस्कृति और अस्मिता के पुनर्निर्माण का यज्ञ था। इसमें राष्ट्र के कोने-कोने से जुड़कर जनसामान्य ने एकता और भक्ति का अद्भुत परिचय दिया।
इस ऐतिहासिक आंदोलन के महानायक श्रद्धेय अशोक सिंहल जी थे। उन्होंने न केवल आंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि भारत की संत शक्ति को एक सूत्र में पिरोने का अनुपम कार्य भी किया। संतों के प्रति उनकी श्रद्धा और संत समाज का उनके प्रति विश्वास इस आंदोलन की आत्मा बना। शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख सभी परंपराओं के धर्माचार्यों का सहयोग प्राप्त हुआ, जो भारत की आध्यात्मिक एकता का प्रतीक था।
यह आंदोलन सामाजिक समरसता का भी अद्वितीय उदाहरण बना। वर्ण, जाति, पंथ, क्षेत्र- सभी भेदभाव भूलकर सम्पूर्ण भारत श्रीराममय हो गया। “रामलला हम आएंगे, मंदिर भव्य बनाएंगे” जैसे उद्घोष हर गली, गाँव और नगर में गूंजते थे। राम केवल देवता नहीं, भारत की आत्मा बन गए। त्रेता युग की शबरी और भरत जैसी प्रतीक्षा की भावना पूरे समाज में जागृत हो गई थी।
श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की लोक-चेतना का पुनर्जागरण है। श्रीराम की परंपरा ही भारत की आत्मा है। जब यह परंपरा जाग्रत होती है, तो भारत सशक्त होता है। आज जब मंदिर का निर्माण पूर्णता की ओर अग्रसर है, तब यह आवश्यक है कि श्रीराम केवल मंदिरों में नहीं, भारत के लोकजीवन में, जन-मन में प्रतिष्ठित हों। श्रीराम की भावना को यदि सुदृढ़ किया जाए, तो कोई भी आक्रान्ता भारत की ओर वक्र दृष्टि डालने का साहस नहीं कर सकेगा। यही श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का अंतिम लक्ष्य है — एक शक्तिशाली, आत्मसम्मान से पूर्ण, सांस्कृतिक रूप से जागृत भारत।
















