न्यूयॉर्क में 24 सितंबर 2025 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र में सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शराआ ने पहली बार मंच संभाला। 1967 के बाद कोई सीरियाई नेता वहाँ नहीं पहुँचा था। शराआ, जो कभी विद्रोही जिहादी समूह के सरगना थे और अल-कायदा से जुड़े रहे, अब एक नए दौर की बात कर रहे थे। उन्होंने इज़रायल के हवाई हमलों की कड़ी निंदा की, लेकिन साथ ही कहा कि दमिश्क संवाद के लिए तैयार है। 1974 के अलगाव समझौते का पालन करेंगे। उन्होंने अमेरिकी प्रतिबंध हटाने की गुहार लगाई और बताया कि कैसे बशर अल-असद को दिसंबर 2024 में उखाड़ फेंकने के बाद सीरिया ‘संकट का निर्यातक’ से ‘शांति का अवसर’ बन रहा है।
इज़रायल के हमलों पर गुस्सा, लेकिन डर भी
शराआ ने कहा, “इस आक्रामकता के सामने भी सीरिया संवाद के लिए प्रतिबद्ध है। हम 1974 के सेनाओं के अलगाव समझौते का पालन करेंगे।” ये समझौता 1973 के योम किप्पुर युद्ध के बाद बना था, जो दोनों देशों के बीच बफ़र ज़ोन तय करता है। लेकिन इज़रायल के लगातार हवाई हमले? शराआ ने इन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सीरिया समर्थन के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि ये हमले क्षेत्र की स्थिरता को ख़तरे में डाल रहे हैं।
असद के आखिरी दिनों में ईरान और हिज़बुल्लाह से समर्थन लेने वाली उसकी सेना के ठिकानों पर इज़राइल ने कई हमले किए। 2025 की शुरुआत में तो इज़रायल ने द्रूज़ अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा का हवाला देकर हमले किए, जब शराआ की ताक़तों पर द्रूज़ के ख़िलाफ़ नरसंहार के आरोप लगे। इज़रायल में करीब 1.5 लाख द्रूज़ रहते हैं, और वे सीरियाई द्रूज़ की चिंता करते हैं।
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ट्रंप से की मुलाकात
प्रतिबंध हटाने की मांग शराआ ने असद काल के दौरान लगे सारे प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाने की मांग की। उन्होंने बताया कि 14 मई 2025 को रियाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से उनकी मुलाक़ात हुई, जहाँ ट्रंप ने ज़्यादातर प्रतिबंध हटा दिए। लेकिन 2019 का सीज़र सिविल प्रोटेक्शन एक्ट अभी भी अमेरिकी क़ानून है। शराआ कहते हैं, सीरिया संस्थाएँ बना रहा है, क़ानून ढाल रहा है ताकि हर नागरिक के हक़ हिफ़ाज़त हों। उन्होंने तुर्की, क़तर, सऊदी अरब, सभी अरब-इस्लामी देशों, अमेरिका और यूरोपीय संघ का शुक्रिया अदा किया।
शराआ ने वादा किया कि वे विस्तारवाद को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे, देश को और बाँटने नहीं देंगे। उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2024 में असद को गिराने वाली उनकी ताक़तें 14 साल के गृहयुद्ध और 60 साल की “ख़ूनी तानाशाही” को ख़त्म करने वाली थीं। 14 साल के गृह युद्ध में करीब 10 लाख लोग मारे गए, लाखों विस्थापित हुए, 20 लाख घर तबाह हो गए। शराआ कहते हैं कि सीरिया ने जो दर्द झेला, वो किसी पर न हो। हम युद्ध की भयावहता जानते हैं।”

















