हमारी सनातन वैदिक संस्कृति के पर्व-त्योहारों की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि ये पर्व हमें उपासना-आराधना के साथ शक्ति और सेहत के अनूठे अनुदान-वरदान भी देते हैं। माँ शक्ति के नमन वंदन के नवरात्र पर्व में हमें आध्यात्मिक साधना के उत्कर्ष के साथ स्वास्थ्य संवर्धन के मणिकांचन सुयोग का दिव्य दिग्दर्शन होता है। दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों क्षेत्रों में सुसंस्कारिता का संम्वर्धन इस देवपर्व का युगों-युगों से कार्यक्षेत्र रहा है। निर्मल आनन्द की पर्याय नवरात्र साधना हमारे भौतिक जीवन को देवजीवन की ओर मोड़ती है। यही वजह है कि हिन्दू दर्शन में “नवरात्र” को सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना जाता है। जिस प्रकार ईश आराधना के लिए प्रात:काल की ब्रह्मबेला सर्वोत्तम होती है, ठीक उसी तरह ऋतु परिवर्तन की बेला में की जाने वाली नवरात्रिक साधना शक्ति संचय के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। आध्यात्मिक मनीषियों ने इस समय को ‘मुहूर्त विशेष’ की मान्यता दी है। इस अवधि में वायुमंडल में सक्रिय दैवीय शक्तियों के स्पंदन मानवी चेतना को गहराई से प्रभावित करते हैं।
शक्ति का विश्वरूप हैं आदिशक्ति माँ दुर्गा
ऋषि मनीषा के अनुसार आदिशक्ति माँ दुर्गा का स्वरूप वस्तुत: शक्ति का विश्वरूप है। माँ दुर्गा के नौ स्वरूप उनके शक्ति वैविध्य के ही विस्तार हैं। शक्ति के बिना लोकमंगल का कोई भी प्रयोजन सफल नहीं हो सकता। यही वजह है कि हमारे यहां शक्ति के बिना शिव को भी “शव” की संज्ञा दी गयी है। जिस तरह युद्ध के संकट काल में दुर्ग में रहने वाले लोग सुरक्षित बच जाते हैं। ठीक उसी तरह माँ दुर्गा की शरण में आये हुए की दुर्गति कदापि नहीं हो सकती। दुर्गा शब्द का यही निहितार्थ है। इसीलिए वे दुर्गतिनाशिनी कहलाती हैं। मातृशक्ति के इसी सृजनात्मक व दिव्य स्वरूप को प्रतिष्ठित करने के लिए मार्कण्डेय ऋषि ने देवी भागवत पुराण में अलंकारिक भाषाशैली में विविध रोचक कथा प्रसंगों की संकल्पना की है।
दुर्गतिनाशिनी शक्ति ही कर सकती है आसुरी शक्तियों का विनाश
“दुर्गासप्तशती” में भगवती दुर्गा की अभ्यर्थना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की गयी है। माँ जगदम्बा के इस महात्म्य की वर्तमान संदर्भों में युगानुकूल व्याख्या करते हुए युगद्रष्टा पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य लिखते हैं कि महिषासुर वस्तुतः पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। जब-जब मानव समाज में सात्विकता व नैतिकता का हृास होता है तब-तब पाशविक प्रवृत्तियां सिर उठाकर संसार में हाहाकार मचाती हैं। मूल भाव यह है कि प्रत्येक असुर एक दुष्प्रवृत्ति का अंलकारिक प्रतीक है; जिनका विनाश दुर्गा जैसी दुर्गतिनाशिनी शक्ति के द्वारा ही हो सकता है। शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ आदि असुर और कुछ नहीं; हमारे भीतर स्थित आलस, लालच और घमंड जैसी दुष्प्रवृत्तियां ही हैं। हमारी मानव देह को ‘सत’, ‘रज’ और ‘तम’ तीनों गुणों का समुच्चय है। नवरात्र के नौ दिन मन, वाणी, कर्म तीनों में शुद्धता लाकर इन तीनों गुणों का संतुलन साधते हैं। इस तरह यह साधना आत्मा, मन और शरीर तीनों का शोधन करती है। वर्तमान के आपाधापी और तनावपूर्ण समय में जब आम लोगों के पास आदमी के पास न तो कड़ी तपश्चर्या का समय है और न ही उतना सुदृढ़ मनोबल; फिर भी आध्यात्मिक विभूतियों की मान्यता है कि यदि नौ दिनों की इस विशेष अवधि में जब वातावरण में परोक्ष रूप से देवी शक्तियों के अप्रत्याशित अनुदान बरसते रहते हैं, छोटी सी संकल्पित साधना से भी चमत्कारी परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।
दैहिक शुद्धिकरण का भी सशक्त माध्यम है नवरात्र उपवास
सनातन हिंदू धर्म में नवरात्र व्रत केवल धार्मिक परंपरा भर नहीं है बल्कि यह शरीर और मन के शुद्धिकरण का भी सशक्त माध्यम है। तत्वदर्शियों का कहना है कि नवरात्र साधना और दुर्गा पूजा, दोनों ही केवल धार्मिक अनुष्ठानों से कहीं अधिक हैं। यह उपवास पर्व प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक समझ से जोड़ते हुए मानवी स्वास्थ्य के बारे में गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। यह आत्मसंयम, श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम है जो जीवन को संतुलित और पवित्र बनाता है। नवरात्र के समय प्रकृति में एक विशिष्ट ऊर्जा होती है जिसको आत्मसात कर लेने पर व्यक्ति का कायाकल्प हो सकता है। भारतीय आयुर्वेद की मान्यता है कि पाचन क्रिया की खराबी से ही शारीरिक रोग होते हैं। व्रत उपवास का प्रयोजन यही है कि हम अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपने मन-मस्तिष्क को केद्रित कर सकें। इसीलिए आयुर्वेद विज्ञान में शारीरिक शुद्धि के लिए पंचकर्म का प्रावधान नवरात्र में करने का किया गया है। ज्ञात हो कि ऋतु परिवर्तन के इस समय प्रकृति अपना स्वरूप बदलती है। संपूर्ण सृष्टि में एक नई ऊर्जा होती है। इस ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करने के लिए हमें व्रतों का संयम-नियम बहुत लाभ पहुंचाता है। यही नहीं, नवरात्र काल में हमारी भारतीय कृषि-संस्कृति को भी सम्मान दिया गया है। मान्यता है कि सृष्टि की शुरुआत में पहली फसल जौ ही थी। इसलिए इसे हम प्रकृति (मां शक्ति) को समर्पित करते हैं।
वैज्ञानिक शोधों से प्रमाणित हुई नवरात्र व्रत की उपयोगिता
आधुनिक वैज्ञानिक शोधों से नवरात्र व्रत की बहुआयामी उपयोगिता साबित हो चुकी है। इस दिशा में हुए अध्ययन बताते हैं कि नवरात्र व्रत में तैलीय और भारी भोजन की जगह हल्का और सात्विक आहार लिया जाता है। इससे शरीर को खुद को शुद्ध करने का समय मिलता है। चूँकि ऋतु परिवर्तन के इस समय में हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता सामान्य तौर पर कम हो जाती है। इसलिए इस मौसम में सात्विक भोजन करने से हमारे पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर की अशुद्धियाँ दूर होती हैं। सात्विक शब्द सत्व से बना है, जिसका अर्थ है शुद्ध, प्राकृतिक, प्राणवान, स्वच्छ, ऊर्जावान और चेतन। सात्विक खाद्य पदार्थों में ताजे फल, दही, सेंधा नमक, मौसमी सब्जियां और धनिया व काली मिर्च जैसे सूक्ष्म मसाले शामिल होते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, यह उपवास प्राकृतिक डिटॉक्स की तरह काम करता है जो पाचन को बेहतर बनाकर ऊर्जा स्तर को बढ़ाता है। नवरात्र उपवास के इस दौरान फल, सब्जियां, मेवे और दूध का सेवन किया जाता है जो विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं। व्रत के दौरान हल्के सात्विक और सीमित भोजन से कैलोरी नियंत्रित रहती है। इससे शरीर में फैट जमा नहीं होता और धीरे-धीरे वजन कम होने लगता है। इसके साथ ही, एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों वाले फल और ड्राई फ्रूट्स का सेवन से शरीर की सूजन को भी कम करता है। नवरात्र उपवास में भारी भोजन की जगह साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा और फल खाए जाते हैं। यह आहार पचने में आसान होता है, जिससे पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर ज्यादा सक्रिय महसूस करता है।
मन को भी शक्ति प्रदान करता है नवरात्र का व्रत
लखनऊ के वरिष्ठ योग विशेषज्ञ डॉ. श्रेय श्रीवास्तव के अनुसार व्रत केवल शरीर को नहीं बल्कि मन को भी शक्ति प्रदान करता है। पूजा-पाठ और ध्यान से तनाव कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है। यही कारण है कि नवरात्र का व्रत मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद उपयोगी माना जाता है। मनोविज्ञान यह भी कहता है कि कोई भी व्यक्ति जब शुद्ध भावना के साथ व्रत-उपवास रखता है तो उसकी सोच का सकारात्मक प्रभाव शरीर पर पड़ता है, जिससे वह अपने भीतर नई ऊर्जा महसूस करता है। यही नहीं, नवरात्र मन को नौ बुरी शक्तियों से शुद्ध करने का भी काल है। ये दुष्प्रवृतियां हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, संदेह, आसक्ति और घृणा। ये बुरी शक्तियां ही हमारे नैतिक पतन और अपराध के लिए जिम्मेदार हैं। नवरात्र के दौरान की जाने वाली व्रत व साधना से हम अपने जीवन को पतन से बचाने के लिए इन दुष्प्रवृतियों पर नियंत्रण पा सकते हैं।

















