सऊदी अरब से रक्षा समझौता करके कागजी शेर बना जिन्ना का देश Taliban को धमका रहा, तालिबान ने जारी किया कड़ा संदेश
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सऊदी अरब से रक्षा समझौता करके कागजी शेर बना जिन्ना का देश Taliban को धमका रहा, तालिबान ने जारी किया कड़ा संदेश

पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान उसकी कठपुतली की तरह काम करेंगे, लेकिन इससे उलट तालिबान स्वतंत्र नीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान अंतरराष्ट्रीय शर्तें मानकर काम करे। लेकिन तालिबान अपने कठोर इस्लामी शासन से पीछे हटने को तैयार नहीं है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 22, 2025, 02:55 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
तालिबान प्रवक्ता जबीउल्लाह का बयान है कि पाकिस्तान 'हर गड़बड़ के लिए काबुल को जिम्मेदार न ठहराए'

तालिबान प्रवक्ता जबीउल्लाह का बयान है कि पाकिस्तान 'हर गड़बड़ के लिए काबुल को जिम्मेदार न ठहराए'

जिन्ना के देश लंबे समय से उस अफगान तालिबान पर उसके यहां गड़बड़ियां फैलाने के आरोप उछालता आ रहा है जिसे हर तरह की मदद देकर काबुल की गद्दी तक पहुंचाया है। लेकिन अब दोनों के बीच ऐसा छत्तीस का आंकड़ा बना है कि एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं। पाकिस्तान और अफगान तालिबान का रिश्ता जटिल और द्वंद्वात्मक होता जा रहा है। वही जिन्ना का देश जो लंबे समय तक तालिबान को अपने ‘रणनीतिक तुरुप के पत्ते’ के रूप में देखता आ रहा था अब रोज उलटे बयान जारी कर रहा है। तालिबान द्वारा 2021 में अफगानिस्तान पर नियंत्रण करने के बाद इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि अब काबुल उसकी जी—हुजूरी करेगा। लेकिन तालिबान प्रवक्ता के ताजा कड़े बयान के बाद मामला और उलझता दिखाई दे रहा है। तालिबान प्रवक्ता जबीउल्लाह का बयान है कि पाकिस्तान ‘हर गड़बड़ के लिए काबुल को जिम्मेदार न ठहराए, नहीं तो रिश्ते और बिगड़ेंगे।’ बेशक, आज दोनों देशों के बीच भरोसा उठता जा रहा है।

पाकिस्तान लंबे समय से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की तरफ से पाकिस्तान की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। पाकिस्तान का आरोप है कि टीटीपी को अफगानिस्तान में तालिबान से शरण और समर्थन मिलता है। काबुल पर पाकिस्तान का यह दबाव रहा है कि वह TTP को पनाह न दे, उसके खिलाफ कार्रवाई करे।

हालांकि तालिबान सरकार ने आधिकारिक तौर पर टीटीपी को काबू करने का वादा तो किया था, लेकिन व्यावहारिकता में काबुल ने उस जिहादी गुट पर कभी लगाम नहीं लगाई, उसके खिलाफ निर्णायक कदम नहीं उठाए। इससे उलट, तालिबान ने बार-बार यही तर्क दिया कि वह अपने ‘मुजाहिद भाइयों’ के खिलाफ हथियार नहीं उठा सकता। यही स्थिति पाकिस्तान को सबसे ज्यादा खटक रही है।

जिन्ना के देश में साल 2021–2024 के बीच, विशेष रूप से तालिबान के अफगानिस्तान में सत्ता में आने के बाद आतंकवादी हमलों में तेजी देखने में आई। खासकर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में टीटीपी ने आत्मघाती धमाकों और घात लगाकर किए हमलों में दर्जनों सैनिकों को निशाना बनाया। पाकिस्तान ने कई बार कहा कि इन आतंकियों के ठिकाने अफगानिस्तान में हैं। लेकिन तालिबान ने पुख्ता सबूत मांगे जो पाकिस्तान के पास नहीं थे। इतना ही नहीं, तालिबान ने साफ कहा कि पाकिस्तान अपनी नाकामी छुपाने के लिए काबुल पर दोष मढ़ रहा है।

फिर जनवरी 2023 में पेशावर में मस्जिद पर हुए हमले में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। पाकिस्तान ने संकेत दिया कि हमलावर अफगानिस्तान से आया था और हमले की योजना वहीं बनी थी। काबुल ने इस आरोप को भी सिरे से खारिज कर दिया था। जुलाई 2023 में बलूचिस्तान में सेना पर हमला हुआ तब भी पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि हमलावर अफगान सीमा पार से घुसे थे। इस घटना के बाद इस्लामाबाद ने तालिबान हुकूमत को ‘चेतावनी’ दी थी कि यदि उसने टीटीपी को काबू नहीं किया, तो दोनों देशों के संबंध पटरी से उतर जाएंगे।

इस बीच पाकिस्तान की अपरिपक्व सरकार ने कई बार सीमा बंद करके कड़ी वीसा नीतियां लागू कीं। इसके पीछे उसका तर्क था कि अफगानिस्तान से आतंकियों की घुसपैठ बढ़ रही है। दूसरी ओर तालिबान ने पाकिस्तान पर व्यापार और आवाजाही रोककर आम लोगों को आहत करने का आरोप लगाया था।

तालिबान प्रवक्ता का हाल का बयान इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। काबुल का कहना है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक नीतिगत और सुरक्षा विफलताओं का दोष अफगानिस्तान पर डाल रहा है। तालिबान सरकार का कहना है कि अफगानिस्तान किसी भी देश को दूसरे पर हमले बोलने के लिए अपनी जमीन का उपयोग नहीं करने देगा। साथ ही वह यह भी कहती है कि पाकिस्तान को अपनी ‘नीतियां और रवैया’ बदलना होगा।

तालिबान इस बात से भी नाराज है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार अफगानिस्तान को ‘आतंकवाद का केंद्र’ बताता है। तालिबान को लगता है कि इससे उनकी वैधता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता पर असर पड़ता है। इसमें संदेह नहीं है कि टीटीपी को पाकिस्तान अपने अस्तित्व के लिए खतरे की तरह देखता है।

तालिबान पाकिस्तान की खींची ड्यूरंड रेखा को मान्यता नहीं देता। इसे लेकर कई बार सीमा पर हिंसक झड़पें भी हो चुकी हैं। जैसा पहले बताया, पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान उसकी कठपुतली की तरह काम करेंगे, लेकिन इससे उलट तालिबान स्वतंत्र नीति अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान अंतरराष्ट्रीय शर्तें मानकर काम करे ताकि उसे मान्यता मिले। लेकिन तालिबान अपने कठोर इस्लामी शासन से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

तालिबान का पाकिस्तान को चेतावनी भरा ताजा संदेश दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ती खाई को दर्शाता है। पाकिस्तान तालिबान को आतंकवाद पर अंकुश लगाने में विफल मानता है, जबकि तालिबान पाकिस्तान को ‘आंतरिक असफलताओं का दोष दूसरों पर डालने वाला देश’ बताता है। दोनों देशों के बीच अगर यही स्थिति बनी रही तो न सिर्फ पाकिस्तान–अफगानिस्तान संबंध बिगड़ेंगे बल्कि इस पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है। पाकिस्तान पहले ही आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। सउदी अरब के बूते भले वह फिलहाल हवा में उड़ रहा है, लेकिन असल में तो उसके यहां रोटी के लाले पड़े हुए हैं। जनता में असंतोष है। सत्ता पर उसका भरोसा नहीं रहा है। सेना बेलगाम है।

Topics: talibanआतंकवादतालिबानdiplomacyTerroristMuslimIslamपाकिस्तानPakistanइस्लामafghanistan
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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