जीएसटी बचत उत्सव: नवरात्रि संग कर सुधार का नया पर्व
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जीएसटी बचत उत्सव: नवरात्रि संग कर सुधार का नया पर्व

नागरिक देवो भवः से आत्मनिर्भर भारत तक: कर सुधारों की नई परिभाषा

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by Sudhir Kumar Pandey
Sep 21, 2025, 08:43 pm IST
inबिजनेस
जीएसटी रिफॉर्म

जीएसटी रिफॉर्म

भारत में कर सुधारों की यात्रा में ‘वस्तु एवं सेवा कर’ (जीएसटी) हमेशा से एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम माना जाता रहा है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवरात्रि की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में जिस भावनात्मक और दूरदर्शी भाषा में जीएसटी सुधारों की नई किस्त की घोषणा की, उसने इस पूरे परिदृश्य को केवल प्रशासनिक या तकनीकी विमर्श के दायरे से निकालकर एक राष्ट्रीय उत्सव का रूप दे दिया। उनके भाषण में कर सुधारों को सीधे नागरिक जीवन की खुशियों, बचत और आकांक्षाओं से जोड़ा गया। यही कारण है कि प्रधानमंत्री की यह पहल केवल अर्थशास्त्रियों के लिए नीति-निर्माण का विषय नहीं रह गई बल्कि आम भारतीय परिवारों के लिए ‘जीएसटी बचत उत्सव’ के रूप में आत्मीयता का अनुभव बन गई।

कर सुधार का उत्सव से जुड़ना

कर सुधारों को सामान्यतः जटिल शब्दावली, कानूनी प्रावधानों और राजस्व आंकड़ों के दृष्टिगत समझाया जाता है लेकिन प्रधानमंत्री ने इसे नवरात्रि की पृष्ठभूमि से जोड़ते हुए कहा कि जिस प्रकार यह पर्व शक्ति, नवचेतना और उत्सव का प्रतीक है, उसी प्रकार नई जीएसटी व्यवस्था भी भारत को आर्थिक जटिलताओं से मुक्त कर एक नई सरलता और पारदर्शिता देने जा रही है। धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़ाव का यह तरीका भारतीय जनमानस में अधिक प्रभावी साबित होता है क्योंकि यह सुधार को केवल वित्त मंत्रालय की फाइलों तक सीमित नहीं रखता बल्कि इसे त्योहार की तरह जन-भागीदारी का अवसर बना देता है।

मध्यवर्ग के लिए बड़ा संदेश

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में विशेष रूप से ‘नियो मिडिल क्लास’ यानी उभरते मध्यवर्ग का उल्लेख किया। यह वर्ग न तो पूरी तरह गरीब है और न ही उच्च आय वर्ग का हिस्सा बल्कि यह मेहनतकश भारतीय परिवारों का वह तबका है, जिसकी महत्वाकांक्षाएं और जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। यही वर्ग राष्ट्र की खपत, मांग और आर्थिक गति का मुख्य आधार है। सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अब रोजमर्रा की वस्तुएं (भोजन सामग्री, दूध, दवाईयां, टूथपेस्ट, साबुन, बीमा जैसी सेवाएं) या तो कर-मुक्त होंगी या न्यूनतम 5 प्रतिशत के कर दायरे में रहेंगी। जहां पहले इन वस्तुओं पर 12 प्रतिशत तक टैक्स लगता था, अब 99 प्रतिशत वस्तुओं को 5 प्रतिशत स्लैब में ला दिया गया है। इससे सीधे तौर पर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों की मासिक बचत बढ़ेगी। यह अतिरिक्त राशि उपभोग में जाएगी और मांग को प्रेरित करेगी। भारत जैसे उपभोक्ता-प्रधान देश में उपभोग का बढ़ना ही विकास की सबसे बड़ी कुंजी है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री ने दावा किया कि जीएसटी और आयकर छूट को मिलाकर प्रतिवर्ष 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत देशवासियों के पास बचेगी। यह केवल एक सूखा आंकड़ा नहीं बल्कि आम भारतीय परिवारों की क्रय शक्ति को बढ़ाने वाला ठोस आर्थिक कदम है।

पुराने दौर की जटिलताएं

2014 के एक उदाहरण का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि उस समय भारत में परिवहन और कर व्यवस्था इतनी जटिल थी कि एक कंपनी का अनुभव था, बेंगलुरु से हैदराबाद तक माल भेजने के बजाय वे उसे यूरोप भेजकर वापस लाना सस्ता और आसान मानते थे। यह स्थिति दर्शाती थी कि किस प्रकार बहुस्तरीय कर, टोल और प्रशासनिक विवशताओं ने भारत की उत्पादन क्षमता और लॉजिस्टिक गति को बाधित किया था। उपभोक्ता को अंततः बढ़े हुए दामों का बोझ झेलना पड़ता था। 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद स्थिति बदली और अब इस नई पहल के जरिए इसे और सरल बनाया गया है।

नई संरचना: दो स्लैब की सरलता

नई जीएसटी व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब केवल दो मुख्य कर स्लैब होंगे, 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। इससे न केवल आम नागरिकों और व्यापारियों के लिए सरलता आएगी बल्कि कर संग्रहण में भी पारदर्शिता बढ़ेगी। अनावश्यक जटिलताओं और बहुस्तरीय कर दरों के समाप्त होने से कर चोरी की संभावनाएं घटेंगी। डिजिटल इंडिया की दिशा में भी यह एक बड़ा कदम है क्योंकि जीएसटी पूरी तरह आईटी-आधारित तंत्र पर टिकी है। इसके जरिए छोटे व्यवसायियों से लेकर बड़े उद्योगपति तक, सभी को ऑनलाइन व्यवस्था में पारदर्शी तरीके से टैक्स भरना होगा।

संघीय ढांचे की साझेदारी

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने यह रेखांकित किया कि जीएसटी सुधार केवल केंद्र का कदम नहीं था बल्कि यह भारत के संघीय ढांचे का जीवंत उदाहरण है। राज्यों की शंकाओं और आशंकाओं को दूर कर सहमति बनाना आसान नहीं था लेकिन संवाद और सहकार से यह संभव हुआ। कर प्रणाली में सुधार केवल अर्थव्यवस्था का तकनीकी पक्ष नहीं बल्कि राजनीतिक सहमति और साझेदारी की परंपरा का भी प्रतीक है। उन्होंने जीएसटी सुधार को स्वदेशी आंदोलन की परंपरा से भी जोड़ा और नागरिकों से अपील की कि वे ऐसे उत्पाद खरीदें, जो भारत में बने हों और जिनमें भारतीय युवाओं की मेहनत हो। आर्थिक दृष्टि से यह संदेश अत्यंत प्रभावी है क्योंकि घरेलू उत्पादन बढ़ने का अर्थ है, आयात पर निर्भरता घटाना, रोजगार सृजन करना और देश को अधिक आत्मनिर्भर बनाना। यहां प्रधानमंत्री ने सांस्कृतिक और आर्थिक धारा को एक सूत्र में पिरोया। स्वदेशी केवल भावनात्मक अपील नहीं बल्कि नीति का वह आयाम है, जो घरेलू उत्पादन और उपभोग को मजबूती देकर दीर्घकालीन विकास मॉडल का आधार बनेगा।

नागरिक केंद्रित दृष्टिकोण

‘नागरिक देवो भवः’ का मंत्र देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हर नीति का केंद्र नागरिक ही है। कर सुधारों को उन्होंने केवल राजस्व संग्रहण की दृष्टि से नहीं बल्कि नागरिक कल्याण और जीवन की सरलता से जोड़ा। यह दृष्टिकोण प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यदि नागरिक विश्वास और संतोष महसूस करता है तो सुधार न केवल सफल होते हैं बल्कि टिकाऊ भी सिद्ध होते हैं। संभावित प्रभावों की बात की ताए तो अर्थशास्त्रियों के अनुसार, कर प्रणाली में यह सरलता और पारदर्शिता निवेश आकर्षित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। विदेशी निवेशक यह संदेश लेंगे कि भारत अब और अधिक व्यवसाय-अनुकूल हो रहा है, वहीं आम जनता को यह राहत मिलेगी कि उनकी दैनिक जरूरतों पर कर का बोझ घटेगा। राज्यों के लिए यह अवसर है कि सुधरे हुए कर ढ़ांचे के जरिए वे संग्रहण की दक्षता बढ़ाएं। कर संग्रह बढ़ने से राज्यों के पास विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। साथ ही, प्रतिस्पर्धा और सहयोग का नया स्वर भी संघीय ढ़ांचे में मजबूत होगा।

सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ा सुधार

प्रधानमंत्री का संवाद केवल आर्थिक नहीं था। उन्होंने इसे नवरात्रि, स्वदेशी और उत्सव जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों से जोड़ा। यह एक प्रकार का आर्थिक राष्ट्रवाद है, जिसमें आर्थिक नीतियों को सांस्कृतिक मूल्यों से संबद्ध किया जाता है। इस तरह सुधार केवल ‘सिस्टम की तकनीक’ न रहकर एक सामूहिक राष्ट्रीय अनुभव बन जाते हैं। यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संबोधन तीन स्पष्ट संदेश देता है, पहला, आर्थिक सुधार निरंतर और भविष्याभिमुख प्रक्रिया हैं, दूसरा, सुधार केवल वित्त मंत्रालय की नीति नहीं बल्कि जनभावनाओं और सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़े राष्ट्रीय पर्व भी बन सकते हैं औी तीसरा, आत्मनिर्भर भारत की दिशा में नागरिकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है और सुधार का वास्तविक लक्ष्य उनके दैनिक जीवन को सरल और समृद्ध बनाना है। नवरात्रि जैसे पर्व से जोड़कर प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाला युग केवल उपभोग, बचत और विकास का नहीं बल्कि साझेदारी और आत्मनिर्भरता का भी पर्व होगा। नई जीएसटी संरचना यदि सही ढ़ंग से लागू होती है तो निश्चित ही यह भारत की विकास यात्रा को नई गत्यात्मकता प्रदान करेगी और प्रधानमंत्री के शब्दों में, हर भारतीय परिवार की खुशियों में नया इजाफा करेगी। कुल मिलाकर, यह सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘शक्ति पर्व’ है, जिसमें सरलता, पारदर्शिता और बचत का संगम उसे आत्मनिर्भर भारत की राह पर आगे बढ़ा रहा है।

 

Topics: पीएम मोदीजीएसटीGSTजीएसटी रिफॉर्मजीएसटी बचत उत्सवसामान सस्ते
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