गत 16 सितंबर को नोएडा में प्रख्यात साहित्यकार डॉ. सीतेश आलोक का स्वर्गवास हो गया। डॉ. सीतेश आलोक गृहस्थ के बाने में तपस्वी जैसा ही जीवन जीते थे। राजनीतिक गलियारों ने उन्हें कभी आकर्षित नहीं किया।
वे अलग मिट्टी के बने थे। जातिगत भाव से इतने दूर कि पति-पत्नी ने अपना नाम डॉ. सीतेश आलोक और अरुणा सीतेश रख लिया, जिससे यह जानकारी नहीं मिलती कि वे किस जाति से थे।
साहित्य तो उनके रक्त में था। प्रख्यात नाटककार दया प्रकाश सिन्हा उनके बड़े भाई हैं। डॉ. सीतेश आलोक ने गीता और रामायण को सही अर्थों में अपने जीवन में उतारा था।
उन ग्रंथों के आधार पर उन्होंने संक्षिप्त रामायण और भावार्थ गीता भी लिखी। महाभारत का भी उन्होंने गहरा अध्ययन किया था। इस आधार पर उन्होंने ‘महागाथा’ पुस्तक भी लिखी। इसके अलावा उनकी अनेक पुस्तकें हैं। साहित्य की कौन सी विधा थी जिसमें उनकी गति नहीं थी!
उन्होंने पाञ्चजन्य के लिए भी अनेक लेख लिखे थे। वे घर में संगीतकारों – साहित्यकारों के लिए मासिक गोष्ठी करते जिसमें देश के नामचीन रचनाकर्मी भाग लेते थे। यही कारण है कि उनके निधन के समाचार से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। डाॅ. सीतेश आलोक के प्रति पाञ्चजन्य अपने भावभीनी श्रद्धासुमन अर्पित करता है।

















