बाहरी लोगों के कारण किसी भी शहर के बच्चे घर में कैद हो जाएं? माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजना कम कर दें? क्या ऐसा हो सकता है? ऐसे परिदृश्य की कल्पना भी भयावह है। लेकिन ब्रिटेन में ऐसा हो रहा है।
express.co.uk के अनुसार यूके में 1500 से अधिक स्कूल ऐसे हैं, जो उन होटलों के पास हैं, जहां बाहरी लोगों को लाकर बसाया जा रहा है। वुमन्स सेफ़्टी इनीशियेटिव की एक रिपोर्ट के हवाले उसने लिखा है कि ऐसा होने से अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरने लगे हैं। इस रिपोर्ट का नाम है, Schools on the Frontline: Migrant Hotels and Their Proximity to Schools और इसके अध्ययन में पाया गया कि यूके में 1539 स्कूल ऐसे हैं, जो आप्रवासियों के निवास से केवल 20 मिनट की पैदल दूरी पर हैं और लगभग 393 स्कूल् ऐसे हैं, जो मात्र दस मिनट की पैदल दूरी पर हैं।
हर्टफोर्डशायर के ब्रॉक्सबोर्न में ऐसा ही एक प्रवासी होटल है। वहां की सत्रह वर्षीय छात्रा ने एक्सप्रेस को बताया कि वह लगातार “हाई अलर्ट” पर रहती है। लोग डरे हुए हैं, क्योंकि उन्हें यह नहीं पता कि वे लोग आखिर कहां से आए हैं? वे लोग नहीं जानते कि जो इन होटल में रह रहे हैं, वे कौन हैं और उनका अतीत कैसा था और इसके साथ ही न ही अधिकारी और न ही वे लोग इन बाहरी लोगों के बारे में जानते हैं, जिनपर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी है। इन बाहरी लोगों के आने के बाद श्वेत लड़कियों पर यौन हमले की घटनाओं में अचानक से वृद्धि देखी गई है। मन में डर बैठा हुआ है और अब लोग अपने बच्चों को अकेले बस से भी सफर नहीं करने दे रहे हैं।
ऐसी ही कक्षा छह की एक छात्रा ने सरकार से अनुरोध किया कि प्रवासियों को स्कूल के पास क्यों बसाया जा रहा है? एपिंग में, 49 वर्षीय महिला एवं तीन बच्चों की मां ऑरला मिनीहेन ने कहा, “उन्हें उनके बच्चों के स्कूल जाने में डर लगता है।“ हाल ही में बेल होटल में टिकने वाला एक इथियोपियाई प्रवासी 14 वर्षीय बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार हुआ था। ऑरला का कहना है कि वह अपनी 17 साल की बेटी को अकेले बस में सफर नहीं करने देती हैं।
पुरुषों की संख्या में हो रही बढ़ोतरी
जब भी शरणार्थियों और प्रवासियों की बात होती है तो प्रश्न उठते हैं कि आखिर क्या कारण हैं कि केवल युवा और मध्य आयु वर्ग के पुरुष ही शरण लेने के लिए आते हैं। लड़कियां या बच्चे क्यों नहीं आते? यह प्रश्न ऑरला का भी है, वह कहती हैं, “पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वे लोग आसपास से घेर लेते हैं और फिर वे उसके पास बैठेंगे और उससे बात करेंगे!”
ऑरला अपने 11 वर्षीय बेटे को भी अकेले स्कूल भेजने से डरती हैं। हालांकि उन्होंने सभी अप्रवासी शरणार्थियों को यौन अपराधी नहीं ठहराया। वह कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि सभी अप्रवासी शरणार्थी संभावित यौन अपराधी हैं, लेकिन 50 प्रतिशत हो सकते हैं। उनका कहना है कि प्रवासियों को ऐसे स्थानों पर रखना चाहिए, जहां पर वे किसी के लिए खतरा न बनें।
राजनीतिक लाभ हावी
वुमन्स सेफ़्टी इनीशियेटिव की संस्थापक और निदेशक जेस गिल कहती हैं कि ब्रिटिश स्कूलों की सुरक्षा के स्थान पर राजनीतिक सुविधा को ध्यान में रखा जा रहा है। उनके पास ऐसे असंख्य अभिभावक हैं, जिन्होंने अपने बच्चों की सुरक्षा के विषय में चिंता जताई है। बच्चे शिकायत करते हैं कि स्कूल के बाहर ये लोग मल-मूत्र करते हैं। स्कूल के बच्चों की तस्वीरें खींचते हैं, उनके वीडियो बनाते हैं और डर का माहौल पैदा करते हैं। गिल का कहना है कि यह डर कहीं से गलत नहीं है क्योंकि अप्रवासी होटलों के आसपास अपराधों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, जबकि बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर अपराध उन्हीं बाहरी लोगों ने किए हैं, जो ब्रिटेन के ही लोगों के टैक्स पर मुफ्त में रह रहे हैं।
एक्सप्रेस पर जो आंकड़े दिए गए हैं, वे वाकई भयावह हैं। सिर्फ तीन साल में 312 शरणार्थियों पर 708 कथित आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। इनमें बलात्कार के 18, बलात्कार के प्रयास के पांच, यौन उत्पीड़न के 35 और चोरी के 51 आरोप शामिल हैं। गिल का कहना है कि जो भी अप्रवासी आते हैं, वे अधिकांश ऐसे देशों से आते हैं, जहां महिलाओं के साथ हिंसा चरम पर है। जहां पर अभी भी जबरन शादियां होती हैं और लड़कियों को कैद करके रखा जाता है और लड़कियों पर होने वाली हिंसा आम है, तो हम यह कैसे सोच सकते हैं कि जब ये लोग ब्रिटेन आएंगे तो अपनी इन आदतों को छोड़ देंगे?
सरकार क्यों ऐसा कर रही?
इस बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही उभरकर आता है कि आखिर सरकार ऐसा क्यों कर रही है कि उसके अपने ही नागरिक अपने शहर, अपने घरों में असुरक्षित महसूस करने लगें? क्यों बच्चे उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं और केवल बाहरी महत्वपूर्ण हो गए हैं। वे भी ऐसे बाहरी जो ब्रिटिश मूल्यों को ही नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों को भी मानने से इनकार करते हैं? यह प्रश्न रह-रह कर उभरता है, परंतु दुर्भाग्य से इसका उत्तर ब्रिटेन की सरकार नहीं दे रही है।

















