पं. श्रीराम शर्मा आचार्य : गायत्रीमय थी जिनकी प्रत्येक श्वास
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य : गायत्रीमय थी जिनकी प्रत्येक श्वास

युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का जीवन, गायत्री मंत्र को सर्वसुलभ बनाने, युग निर्माण सत्संकल्प व अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना में अद्वितीय योगदान।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Sep 18, 2025, 08:16 pm IST
in श्रद्धांजलि

इतिहास में विरले ही ऐसे लोग होते हैं जो विचार क्रांति का साहस रखते हैं। युग निर्माण के सूत्रधार पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भारत की महान संत परम्परा की ऐसी ही दिव्य विभूति माने जाते हैं। एक सदी तक विदेशी शासन की गुलामी में रहने के कारण भारतीयों की यह गुलाम मानसिकता सिर्फ सांस्कृतिक जनजागरण से ही परिवर्तित हो सकती है। आचार्यश्री को यह तथ्य भलीभांति अवगत था। इसी कारण उन्होंने अपने समूचे जीवन को राष्ट्र के संस्कृति यज्ञ में होम कर दिया। आचार्यश्री की हर श्वास गायत्रीमय थी। “लाइट ऑफ एशिया” की गरिमामय उपाधि से सम्मानित इस महामनीषी ने धर्म के गहरे सत्यों की समीक्षा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करके अध्यात्म को एक नये तरीके से परिभाषित किया था।

आचार्यश्री का युग निर्माण सत्संकल्प  

बीती सदी के रूढ़ परम्परावादी समाज में ‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’, ‘इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य’, ‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’ और ‘इक्कीसवीं सदी-नारी सदी’ जैसे उद्घोष करने का साहस उनके जैसा कोई गायत्री महाविद्या का सिद्ध तपस्वी ही कर सकता था। आचार्यश्री के जीवन के प्रारम्भिक 30 वर्ष जन्मस्थली आंवलखेड़ा व जनपद आगरा में एक नैष्ठिक गायत्री साधक, समाज सुधारक व आजादी के सेनानी के रूप में बीते और बाद के तीस वर्ष मथुरा में सच्चे कर्मयोगी साधक व विलक्षण संगठनकर्ता के रूप में। इस अवधि में उन्होंने “युग निर्माण सत्संकल्प” के रूप में गायत्री मिशन का घोषणा पत्र जारी कर सतयुगी समाज की आधारशिला रखी। अपनी लेखनी के द्वारा उन्होंने ऐसे युग साहित्य का सृजन किया जिसमें लोगों की प्रत्येक समस्या का समाधान निहित है। उन्होंने वेद, उपनिषद, स्मृति, पुराण आदि आर्ष साहित्य के भाष्य कर उन्हें जन सुलभ कराया। समय की मांग के अनुरूप जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अभिनव प्रेरणा व संवेदना जगाती “युग संजीवनी” के रूप में 3200 पुस्तकों का सृजन उनकी अद्वितीय लेखकीय क्षमता का द्योतक है। जिसमें प्राचीन धर्मशास्त्रों के गूढ़ सत्यों को सरल शब्दों में समझाया गया है। मानवी चेतना के उन्नयन से लेकर सुसंस्कारिता संवर्धन, अध्यात्म व विज्ञान के समन्वय, पर्यावरण व लौकिक जीवन का शायद कोई ऐसा पक्ष हो जो इस युग व्यास की लेखनी से अछूता रहा हो। बताते चलें कि मानव की चेतना में आध्यात्मिक जागृति के उद्देश्य से सन् 1938 वसंत पंचमी से शुरू हुई आचार्यश्री की प्राण ऊर्जा से अनुप्राणित “अखंड ज्योति” पत्रिका आज के घोर व्यावसायिक युग में एक आध्यात्मिक जनजागरण की अनूठी मिसाल है।

गायत्री महामंत्र को सर्वसुलभ करने का महापुरुषार्थ

तत्कालीन परिस्थितियों में गायत्री महामंत्र वैदिक ब्राह्मणों तक सीमित था। खासतौर पर स्त्रियों के लिए यह वेदमंत्र पूरी तरह वर्जित माना जाता था। किन्तु इस महामनीषी ने अपनी प्रचंड तपश्चर्या के बल पर उसे सर्वसुलभ बना दिया। बताते चलें कि गायत्री महामंत्र की साधना को जाति, धर्म, लिंग, भेद से परे सबके लिए सुलभ बनाने के महापुरुषार्थ के कारण बीसवीं सदी के समूचे संत समाज ने एक स्वर ने उन्हें ‘आधुनिक युग के विश्वामित्र’ की उपाधि से अलंकृत किया था।

महिलाओं के माध्यम से गायत्री यज्ञों की परम्परा का शुभारम्भ

बीती सदी के आठवें दशक में नारी की वैदिक कालीन गौरव गरिमा को आधार बनाकर दिये गये आचार्य जी के ओजस्वी प्रवचनों से देश भर में वह तूफान आया कि स्त्रियों को गायत्री उपासना से वंचित रखने वाली विचारधारा देखते ही देखते क्षीण हो गयी तथा नारी को गायत्री उपासना एवं यज्ञ, संस्कार करने का ही नहीं, करवाने का अधिकार भी मिल गया। जानना दिलचस्प हो कि महिला पुरोहितों के माध्यम से गायत्री यज्ञों की परम्परा के शुभारम्भ का श्रेय भी आचार्य प्रवर को ही जाता है।

धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रगतिशील परम्परा

राष्ट्रव्यापी जनजागरण के बल पर आचार्यश्री ने अपने जीवनकाल में ‘अखिल विश्व गायत्री परिवार’ के रूप में समाज के संस्कृतिनिष्ठ व्यक्तियों का जो आध्यात्मिक संगठन खड़ा किया था, वह आज 15 करोड़ से अधिक सदस्यों वाले विशाल वट वृक्ष के रूप में रूपांतरित हो चुका है। यही नहीं, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रगतिशील परम्परा, ग्राम-तीर्थों की स्थापना, भेदभाव रहित धार्मिक आयोजन, गायत्री व यज्ञ के माध्यम से देव संस्कृति का घर-घर विस्तार, हर समुदाय के लोकसेवियों को पौरोहित्य शिक्षण, बाल संस्कारशालाओं द्वारा सुसंस्कारिता व साक्षरता संवर्धन तथा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यज्ञ विज्ञान की विज्ञान सम्मत विधा के रूप स्थापना इत्यादि अनेकानेक जनकल्याणकारी योजनाओं के संचालन के साथ अखिल विश्व गायत्री परिवार आज जिस तरह सेवापथ पर निरंतर गतिमान है, उसके मूल में मिशन के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का जीवन दर्शन ही  निहित है।

 ‘’गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है’’ का साधना सूत्र

बताते चलें कि आगरा के आंवलखेड़ा गांव में वर्ष 1911 में आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तिथि (इस वर्ष 19 सितम्बर) को एक प्रतिष्ठित जमींदार ब्राह्मण परिवार में जन्म बालक श्रीराम की गायत्री साधना सात वर्ष की बाल उम्र से ही शुरू हो गयी थी। काशी में पं. मदनमोहन मालवीय ने गुरुदीक्षा देते समय बालक श्रीराम को यज्ञोपवीत पहनाते समय कहा था, “गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है।‘’ इस सूत्र को उन्होंने जीवनभर के लिए गांठ बांध लिया। इसके बाद 15 वर्ष की आयु में बसंतपंचमी के दिन अपनी हिमालयवासी गुरुसत्ता से प्रथम भेंट में ही उन्होंने गुरुआज्ञा शिरोधार्य कर समूचा जीवन राष्ट्र व संस्कृति के पुनरोद्धार को समर्पित कर दिया था।

युगऋषि ने जलायी उज्ज्वल भविष्य की मशाल

युगऋषि ने उज्ज्वल भविष्य को लेकर समाज में आशावाद की एक अनूठी मशाल जलायी थी। सूत्र दिया ‘’मन:स्थिति बदले तो परिस्थिति सुधरे।‘’ समाज के नव निर्माण के लिए इक्कीसवीं सदी के संविधान के रूप में उनके द्वारा बनाये गये युग निर्माण घोषणापत्र में वह सब कुछ है, जिसके आधार पर नूतन समाज की मजबूत आधारशिला रखी जा सकती है। इस सच्चे राष्ट्रसंत के जीवन का गहन अवलोकन करने पर सच्चे कर्मनिष्ठ ब्राह्मण व लोकमंगल में सतत संलग्न ऐसे अनुकरणीय व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं जिसने अपने जीवन में “साधना से सिद्धि” का सूत्र सार्थक का दिखाया। यह आचार्यश्री के विचारक्रांति अभियान का ही नतीजा है कि आज गायत्री परिवार के 70 फीसद सदस्य युवा हैं जो अपने आप में एक अनूठी उपलब्धि है। उनकी स्पष्ट घोषणा थी कि भारत की भूमि दिव्य ऋषि सत्ताओं की भूमि है। लाख परेशानियां व आपदाएं आएं पर हमारा भविष्य उज्जवल ही होगा।

आध्यात्मिक विभूतियों के आचार्यश्री के बारे में उद्गार

देश की जानी मानी आध्यात्मिक विभूति देवरहा बाबा के आचार्यश्री के बारे में उद्गार थे, ‘’मैं नित्य प्रति सूर्य को प्रणाम कर गायत्री के सिद्ध साधक आचार्य श्रीराम शर्मा का अभिनंदन करता हूं।‘’ इसी तरह कांची काम कोटिपीठ के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र तीर्थ स्वामी जी का कहना था, ‘’आचार्य जी का एकाकी पुरुषार्थ सारे संत समाज की सम्मिलित शक्ति के स्तर का है।‘’ काशी के सिद्ध संत करपात्री जी महाराज ने आचार्यजी के बारे में कहा था कि वे उन्होंने गायत्री को सबका बना दिया है। यदि इसे मात्र ब्राह्मणों की मानकर उन्हीं के भरोसे छोड़ दिया गया होता तो अब तक गायत्री महाविद्या संभवत: लुप्त हो जाती।‘’ इसी क्रम में पूर्व राष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा ने आचार्य श्री पर डाक टिकट जारी कर उनका अभिनंदन करते हुए कहा था, ‘’आचार्य जी ने उपासना, साधना और आराधना की त्रिवेणी रूपी सिद्धांत देकर सामाजिक परिवर्तन का जो रास्ता दिखाया है, उसके लिए आने वाली पीढ़ियां युगों-युगों तक उनकी कृतज्ञ रहेंगी। वहीं पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम आजाद ने पं. श्रीराम शर्मा आचार्य को भारत में विचार क्रांति का जनक कहा था।

Topics: गायत्री मंत्रअखिल विश्व गायत्री परिवारभारतीय संत परंपरायुगऋषियुग निर्माण सत्संकल्पगायत्री यज्ञआध्यात्मिक जनजागरणविचार क्रांति
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