दिल्ली के द अशोक होटल में आयोजित पाञ्चजन्य के ‘आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मुकुल कानिटकर ने कहा- सुबह से जब मैं बैठा था, तब मेरे मन में समस्या के समाधान को लेकर जो विचार आ रहे थे, प्रश्न भी उसी प्रकार के थे और उत्तर भी उसी प्रकार के। वास्तव में जब हम विकास के आधार को समझने का प्रयत्न करते हैं तो पाते हैं कि आधुनिक अर्थशास्त्र भी विकास के उद्देश्य की परिभाषा सुख से ही करता है। अर्थशास्त्र का मूल उद्देश्य ही मानव मात्र को सुखी करना है। इसलिए लक्ष्य केवल “सुख” नहीं, बल्कि “सुखी करना” है। सुख की संकल्पना के बिना विकास की कोई बात पूरी नहीं हो सकती।
पश्चिमी और भारतीय दृष्टिकोण में सुख की परिभाषा
पश्चिमी दृष्टि में सुख की संकल्पना अक्सर नकारात्मक रूप में ली जाती है—अभाव दूर करने और सुविधाएँ उपलब्ध कराने को ही विकास माना जाता है। यह सुख की अधूरी संकल्पना है। भारत में विकास की परिभाषा “समुत्कर्ष” कही गई—संस्कृत का शब्द “सम्यक उत्कर्ष”, अर्थात संतुलित उत्कर्ष। महाभारत में धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया कि धर्म का लक्ष्य “अभ्युदय” (भौतिक प्रगति) और “निःश्रेयस” (आध्यात्मिक कल्याण) दोनों है।
अभ्युदय का उदाहरण और विवेकानंद का दृष्टिकोण
दृश्य में जो बड़े-बड़े पुल, बांध और अधोसंरचना दिखाई देती है, वह अभ्युदय का उदाहरण है। स्वामी विवेकानंद जब 1893 में शिकागो गए, उससे पहले उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया था। कोलकाता से कन्याकुमारी तक की यात्रा में उन्होंने भारत की गरीबी, भुखमरी और अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए अनाचार को निकट से देखा। शिकागो में जिस घर में वे ठहरे थे, वहां की छत से चारों ओर की समृद्धि और ऊँची-ऊँची बिजली से जगमग इमारतें देखकर उन्होंने अपने शिष्य आला सिंह का पेरूमल को पत्र लिखा—“मेरा भारत ऐसा कब होगा?”
जमशेदजी टाटा से मुलाकात और प्रेरणाएँ
शिकागो जाने से पहले वे जापान गए थे। जापान से वैंकूवर जाते समय जहाज में उनकी भेंट जमशेदजी टाटा से हुई। जमशेदजी टाटा वहां की स्टील तकनीक सीखने आए थे ताकि भारत में उद्योग स्थापित कर सकें। जापानी लोगों ने उन्हें समझाया कि यदि वे जापान में ही फैक्ट्री लगाएँ तो सस्ता पड़ेगा; भारत में न लगाएँ।
इसी यात्रा में स्वामी विवेकानंद के साथ हुई चर्चा का उल्लेख जमशेदजी टाटा ने अपने पत्र में किया। विवेकानंद ने उन्हें दो प्रेरणाएँ दीं। पहली, जिसे आज हम “स्वदेशी” या “आत्मनिर्भरता” कहते हैं—भारत में ही फौलाद का कारखाना स्थापित करें। टाटा स्टील की फैक्ट्री में आज भी इस प्रेरणा का उल्लेख मिलता है।
दूसरी प्रेरणा—भारत में विज्ञान अनुसंधान संस्थान की स्थापना। विवेकानंद ने बताया कि प्राचीन काल में भारत की स्टील तकनीक विश्व प्रसिद्ध थी। ग्रीस और रोमन साम्राज्य तलवार बनाने के लिए भारत आते थे, क्योंकि वैसा शुद्ध फौलाद बनाने की तकनीक और कहीं नहीं थी। 18वीं शताब्दी तक प्लासी की लड़ाई के बाद इंग्लैंड को भेजी गई रिपोर्टों में अंग्रेज़ कलेक्टरों ने भी भारतीय स्टील तकनीक की कम लागत और कम ऊर्जा खपत की प्रशंसा की थी।
भारतीय विज्ञान संस्थान की स्थापना
स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से ही जमशेदजी टाटा ने भारतीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए संस्थान बनाने का निर्णय लिया। आज जिसको हम “इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस” (बेंगलुरु) कहते हैं, उसकी नींव उसी विचार से रखी गई। संस्थान की लॉबी में आज भी जमशेदजी टाटा का पत्र और स्वामी विवेकानंद का चित्र साक्षी है।
भारत की प्राचीन विकास दृष्टि
भारत की विकास दृष्टि सदियों से विश्व को संचार और संवाद की कला सिखाती रही है। आज हम सिक्स-लेन, एट-लेन और बारह-लेन के बड़े हाईवे देखते हैं, किंतु विश्व के ज्ञात इतिहास में साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व इस प्रकार के हाईवे की संकल्पना करने वाला देश भारत ही था।
प्राचीन व्यापारिक मार्ग और सिल्क रूट की सच्चाई
आदरणीय मोती चंद्र जी की पुस्तक सार्थवाह-सार्थक भाई में उल्लेख है कि भारत में “उत्तरापथ” और “दक्षिणापथ” नाम से दो बड़े व्यापारिक मार्ग थे, जिनसे विश्व से व्यापार होता था। आज चीन ने प्रभाव दिखाने के लिए इसे “सिल्क रूट” कहना शुरू किया और हमारी पुस्तकों में भी वही नाम प्रचलित हो गया, जबकि वहाँ से रेशम से अधिक मसालों का व्यापार होता था। मीनाक्षी जैन ने लिखा है कि इसे “स्पाइस रूट” कहना अधिक उचित है। भारत में इसका पुराना नाम “उत्तरापथ” है।
उत्तरापथ का महत्व और नेविगेशन का स्रोत
इसी उत्तरापथ से चाणक्य तक्षशिला से मगध आए थे। यह मार्ग भारत को पूरे सेंट्रल एशिया और भूमध्यसागर तक व्यापार से जोड़ता था। भारत ने विश्व को जलमार्ग से संचार की तकनीक भी दी। अंग्रेजी का शब्द “नेविगेशन” संस्कृत के “नावगति” से बना है—ग्रीस के विद्वान निकोलस ने 2011 में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में यह सिद्ध किया।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का योगदान
सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगन, राखीगढ़ी, धोलावीरा जैसे नगर उत्खनन में मिले हैं। प्रारंभ में इतिहासकार सोचते थे कि नदियों के किनारे संस्कृति का विकास केवल संसाधनों के कारण हुआ, किंतु वस्तुतः भारत ने नदियों के माध्यम से जल-व्यापार और नौकायन का अद्भुत विज्ञान विकसित कर विश्व को मार्ग दिखाया।
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