नई दिल्ली: पाञ्चजन्य के ‘आधार इंफ्रा कॉन्फ्लुएंस 2025’ का शुभारंभ दिल्ली के द अशोक होटल में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मुकुल कानिटकर, भारत प्रकाशन (दिल्ली) लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अरुण कुमार गोयल और पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने दीप प्रज्जवलित कर किया।
“Policy – Innovation – Implementation” थीम पर आधारित यह सम्मेलन शाम सात बजे तक चलेगा। इस भव्य आयोजन में राजनीति, उद्योग और सामाजिक क्षेत्रों की कई नामी हस्तियां शामिल हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता, केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली सदस्य व वरिष्ठ प्रचारक मुकुल कानिटकर, अमृता अस्पताल फरीदाबाद के प्रशासनिक निदेशक स्वामी निजामृतानंद पुरी, पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष हेमंत जैन, विधान परिषद के सदस्य अवनीश सिंह, पूर्व आईएएस राघव चंद्रा और रंजन कुमार धींगरा जी सहित कई प्रतिष्ठित वक्ता अपने विचार साझा करेंगे।
दिनभर चलने वाले इस कॉन्फ्लुएंस में कई सत्र हैं। कार्यक्रम में “100 Years RSS” पुस्तक विमोचन, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की चुनौतियों, नवीकरणीय ऊर्जा, सड़क एवं जल संसाधन, और उद्योग के भविष्य पर पैनल चर्चाएं होंगी।
कार्यक्रम का उद्देश्य है- विकसित भारत’ के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए नीति निर्माण, नवाचार और क्रियान्वयन पर ठोस रोडमैप तैयार करना। पाञ्चजन्य का यह प्रयास नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों और उद्योग जगत के नेताओं को एक मंच पर लाकर देश के इंफ्रास्ट्रक्चर भविष्य को नई दिशा देने की कोशिश करेगा।
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कार्यक्रम के प्रारंभ में पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने कहा- “आज पाञ्चजन्य का विस्तृत परिवार, हमारे शुभचिंतक, सहकर्मी, और निर्देशन व प्रेरणा देने वाले अनेक महानुभाव सभी इस सभागार में एक साथ उपस्थित हैं। पाञ्चजन्य की यात्रा कैसी रही है, इसके लिए मुझे बहुत विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह यात्रा स्वयं में बोलती है। जब देश में पत्रकारिता की परिभाषा गढ़ी जा रही थी- उसका स्वरूप क्या हो, उसकी दिशा, उसकी चुनौतियाँ और उसके लक्ष्य क्या हों—इन सब पर चिंतन करते हुए वर्ष 1948 में मकर संक्रांति के दिन ‘पाञ्चजन्य’ नामक एक संकल्प पत्र का शुभारंभ किया गया। यह मात्र एक प्रकाशन नहीं, बल्कि एक विचार यात्रा की शुरुआत थी। और आज जब हम इस जगमगाते, ऊर्जा से भरे सभागार को देखते हैं, तो लगता है मानो वह संकल्प आज एक व्यापक, सशक्त और समर्थ स्वरूप में हमारे सामने खड़ा है। सबके चेहरों पर मुस्कान है, आत्मविश्वास है, लेकिन यह सब एक लंबी यात्रा का परिणाम है- अभाव से प्रभाव की ओर की यात्रा। उस समय पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने यह निर्णय लिया और अटल बिहारी वाजपेयी जी इसके प्रथम संपादक बने। उस दौर में जब अधिकांश समाचार संस्थान या तो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे या बंद हो रहे थे, तब यह एक साहसिक पहल थी। स्वतंत्रता से पहले पत्रकारिता का लक्ष्य था- देश को आज़ाद कराना। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह प्रश्न उठा कि अब पत्रकारिता का उद्देश्य क्या होगा? bइस संग्रह और इस मंच को देखकर यह स्पष्ट होता है कि सरकारें आएंगी और जाएंगी, लेकिन राष्ट्र और समाज के प्रति चिंतन, संवाद और दिशा देने की भूमिका पत्रकारिता की बनी रहेगी। पाञ्चजन्य इसी सतत चिंतन का जीवंत प्रतीक है।”

















