यूक्रेन युद्ध के बहाने अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं, लेकिन तेल और ऊर्जा के सबसे बड़े उत्पादक के नाते रूस इन दोनों का पश्चिमी देशों और खाड़ी देशों को निर्यात करता रहा है। रूस ने जीवाश्म ईंधन (तेल, कोयला, गैस) के निर्यात से राजस्व का एक बड़ा हिस्सा अर्जित किया है। उसने उन पश्चिमी देशों की ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा किया है जो यूक्रेन के विषय पर उसके विरुद्ध बयान देते आ रहे हैं। भारत पहले भी अनेक बार स्पष्ट कर चुका है कि वह अपने राष्ट्रीय हित को देखते हुए रूस से तेल आयात करता रहेगा।
सेंटर फॉर रीसर्च आन एनर्जी एंड क्लिन एयर की रिपोर्ट है कि यूक्रेन रूस युद्ध शुरू होने के बाद से, भारत ने रूस से लगभग 112.5 अरब यूरो का कच्चा तेल खरीदा है, और अन्य जीवाश्म ईंधन मिलाकर हाल में यह राशि और बढ़ गयी है।
भारत, चीन तथा कुछ अन्य एशियाई देश रूस से ऊर्जा निर्यात के बड़े खरीदार बने हैं। उदाहरण के लिए, 2025 में अभी तक भारत ने रूस से लगभग 40 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों को पूरा किया है। भारत रूस से कच्चा तेल खरीदकर, उसे परिष्कृत करके ईंधन में बदल कर अन्य देशों (यूरोप सहित) में बेचता भी है। लेकिन यह व्यापारिक परंपराओं में गलत नहीं है। अनेक देश ऐसा करते आ रहे हैं।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने जी 7 और यूरोपीय संघ से अपील की है कि भारत और चीन से आयात पर टैरिफ लगाए जाएं ताकि ये देश रूस से तेल खरीदना बंद करें। राष्ट्रपति ट्रंप की दबाव की यह राजनीति कोई नई नहीं है। वे खुद भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए बैठे हैं।

लेकिन ट्रंप का यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में यह आरोप आधारहीन है कि भारत-चीन रूस को ‘पूरी तरह से मदद कर रहे हैं’ या कि वे उन्हीं की वजह से रूस की युद्ध क्षमता बनी हुई है। रूस को तो जीवाश्म ईंधन बेचते समय, पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से एक बड़ी कीमतों में एक बड़ी छूट देनी पड़ती है। कच्चा तेल आम बाजार दर से सस्ता बेचना पड़ता है ताकि खरीदार मिलें। इस छूट की वजह से रूस की प्रति बैरल आय कम हो रही है।
जी 7 देशों ने रूस के जीवाश्म ईंधन पर कीमत की सीमा बांध देने की कोशिश की है और कुछ जहाज़ों/इंश्योरेंस सेवाओं को प्रतिबंधित किया है, जिससे ट्रांसपोर्ट और बीमा महंगा और जटिल हो गया है। यह बेशक, रूस की कुल आय को प्रभावित करने वाला कदम है।
भारत और चीन की अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए कुछ जरूरतें हैं। रूस से सस्ता तेल खरीदना उनके हित में है, विशेषकर जब अन्य जगहों से यह उत्पाद लेना महंगा पड़ रहा हो या कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा आ रही हो। इसके अलावा, दोनों देशों ने कहा है कि वे प्रतिबंधों और मूल्य सीमाओं के नियमों के भीतर काम कर रहे हैं और वे यह निर्णय स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र हैं कि किससे क्या व्यवहार रखना है, क्या खरीदना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद कह चुके हैं कि सरकार किसी के दबाव में नहीं आएगी और राष्ट्रीय हित में निर्णय लेने जारी रखेगी।
रूस का बजट बहुत बड़ा है और तेल-गैस निर्यात आय का एक महत्वपूर्ण लेकिन एकमात्र स्रोत नहीं है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि कीमतों में कमी और छूट से रूस को लाभ कम हो रहा है, लेकिन युद्ध खर्चों को पूरी तरह से बंद करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है।
भारत और चीन आरोप लगाते आ रहे हैं कि पश्चिमी देशों ने पहले ऐसे नियम नहीं लागू किए थे, लेकिन अब ऊर्जा बाजार में लेन—देन के साथी बदलने के बाद उन्हें निशाना बना रहे हैं। कुछ का कहना है कि टैरिफ और प्रतिबंध लगाने से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार में हलचल बढ़ेगी, जिससे उन देशों को भी नुकसान होगा।

















