American Tariff के विरुद्ध चीनी राजदूत का बड़ा बयान, India ही नहीं, यह विश्व व्यापार संतुलन के लिए भी खतरा!
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American Tariff के विरुद्ध चीनी राजदूत का बड़ा बयान, India ही नहीं, यह विश्व व्यापार संतुलन के लिए भी खतरा!

चीन में गत दिनों संपन्न एससीओ सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति और सक्रिय भागीदारी से जो तस्वीर उभरी थी उसने एक नए समीकरण के बनने के संकेत दिए हैं। यह समीकरण भारत, रूस और चीन में बनता दिख रहा है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 9, 2025, 03:08 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंस

भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंस

भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंस अमेरिका द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के विरोध में खुलकर उतर आए हैं। शू चीन के एक प्रमुख राजनयिक और आर्थिक विश्लेषक माने जाते हैं, उन्होंने अमेरिका की भारत पर टैरिफ नीति को अनुचित और अविवेकपूर्ण बताते हुए इस पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि अमेरिका भारत पर 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाने की योजना बना रहा है, जो न केवल भारत के आर्थिक हितों के लिए हानिकारक है, बल्कि वैश्विक व्यापार तंत्र के संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता है।

ध्यान रहे कि गत कुछ वर्षों में अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने वैश्विक व्यापार के संदर्भ में चीन सहित कई देशों पर उच्च टैरिफ लगा कर अपने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। लेकिन अब इस नीति को चौतरफा विरोध से उसका ऐसा करना उसके ​ही गले की फांस साबित होता दिख रहा है। इस नीति पर चलते हुए अमेरिका भारत से आयातित वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा कर भारतीय उत्पादों की पहुंच सीमित करने की सोच रहा है।

इस नीति के पीछे अमेरिका का उद्देश्य संभवतः यह हो सकता है कि भारत को चीन के करीब आने से रोका जाए। विश्लेषकों का मानना है चूंकि भारत और चीन दोनों ही एशिया के महाशक्ति माने जाने देश हैं, इसलिए अमेरिका इन दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति बनाए रखना चाहता है, ताकि क्षेत्रीय संतुलन उसके पक्ष में बना रहे। साथ ही, ट्रंप प्रशासन का यह कदम भारत को चीन के विरुद्ध एक वैकल्पिक साथी बनाने के बजाय अमेरिका पर निर्भर बनाए रखने की कोशिश भी हो सकती है।

राष्ट्रपति शी और प्रधानमंत्री मोदी के बीच तियानजिन में हुई द्विपक्षीय वार्ता (File Photo)

चीनी राजदूत शू फेइहोंस का उक्त बयान सीधे तौर पर संकेत करता है कि चीन इस टैरिफ नीति को केवल भारत के खिलाफ नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार के नियमों के उल्लंघन के रूप में देख रहा है। उनका तर्क है कि यह कदम विश्व व्यापार संगठन की मूल भावना के खिलाफ है, जो मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करता है। इसके अलावा, चीन का यह भी कहना है कि अमेरिका की ऐसी नीति क्षेत्रीय आर्थिक अस्थिरता को बढ़ावा देगी, जिससे सभी विकासशील देशों के हितों पर उलटा असर पड़ेगा।

चीन में गत दिनों संपन्न एससीओ सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति और सक्रिय भागीदारी से जो तस्वीर उभरी थी उसने एक नए समीकरण के बनने के संकेत दिए हैं। यह समीकरण भारत, रूस और चीन में बनता दिख रहा है। यह सही है कि भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक सीमा विवाद और राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के मौके भी महत्वपूर्ण हैं और ये कम नहीं हैं। शू फेइहोंस का यह सुझाव कि भारत और चीन मिलकर इस खतरे का मुकाबला करें, दरअसल एक रणनीतिक सोच की झलक देता है। दोनों देशों के लिए यह समय एक दूसरे के साथ सहयोग बढ़ाने का है ताकि वे संयुक्त रूप से अमेरिका की आर्थिक नीतियों का प्रतिकार कर सकें। राष्ट्रपति शी और प्रधानमंत्री मोदी के बीच तियानजिन में हुई द्विपक्षीय वार्ता इसी संदर्भ में देखी जा सकती है।

भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ उसे अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखना है, खासकर हिन्दू प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को सीमित करने के उद्देश्य से। तो दूसरी तरफ, अमेरिका द्वारा लगाए जा रहे टैरिफ से भारत की निर्यात नीति, विदेशी निवेश और घरेलू बाजार पर पड़ने वाले असर को भी समाप्त करना है जिसके लिए भारत ने नए बाजारों की तलाश शुरू भी कर दी है। भारत का मुख्य उद्देश्य इस स्थिति से बचते हुए, स्वतंत्र व संतुलित विदेश नीति पर आगे बढ़ते रहना है।

भारत के पास कुछ विकल्प तो सामने हैं। एक ओर भारत डब्ल्यूटीओ में अमेरिका की टैरिफ नीति को चुनौती दे सकता है। वहां यदि उचित प्रक्रिया अपनाई जाए तो अमेरिका को अपने कदम वापस लेने पर मजबूर किया जा सकता है। दूसरी ओर, भारत चीन के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाकर क्षेत्रीय सामरिक संतुलन बनाने की दिशा में बढ़ सकता है। भारत-चीन व्यापार का व्याप पहले से कहीं बड़ा है और दोनों देशों के बीच सहयोग से आर्थिक दबाव अमेरिका पर बनाया जा सकता है।

अमेरिकी टैरिफ के संदर्भ में राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ताजा आह्वान भी गौर करने लायक है। राष्ट्रपति शी ने ब्रिक्स देशों से अमेरिकी टैरिफ के विरुद्ध एकजुट होने का आह्वान किया है। इससे वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा बदल सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति की हठधर्मिता भरी नीति से न केवल चीन की बल्कि ब्रिक्स के अन्य देशों यथा, भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और रूस जैसे देशों की आर्थिक स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स देशों की सामूहिक अर्थव्यवस्था वैश्विक जीडीपी की लगभग एक तिहाई है और इनके पास वैश्विक व्यापार को संतुलित करने की वास्तविक क्षमता है। यदि ब्रिक्स एकजुट होकर अमेरिका की टैरिफ नीतियों का विरोध करे तो यह मंत्र वैश्विक व्यापार व्यवस्था में एक बड़े विकल्प के रूप में उभर सकता है।

Topics: भारतचीनrussiawtochianscoIndiaट्रंप टैरिफअमेरिकी टैरिफamerican tariffworld tradetrump tarrif
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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