उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: आज (9 सितंबर, 2025) 17वें उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए चुनाव आहूत है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने उम्मीदवारों के पक्ष में समर्थन को बढ़ने की कवायद में लगे हुए हैं। हालांकि, उपराष्ट्रपति चुनाव में वोटों के गणित में ज्यादातर मौकों पर सत्ता पक्ष का ही पलड़ा भारी रहा है और इस बार भी ऐसा ही होता नजर आ रहा है। चार मौकों को छोड़ दिया जाए तो हर बार देश के दूसरे शीर्ष संवैधानिक पद के लिए चुनावी मुकाबला हुआ है। चार बार उपराष्ट्रपति के पद पर निर्विरोध निर्वाचन हुआ है। इस बार के उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा नीत एनडीए ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है जबकि विपक्षी गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी को अपना उम्मीदवार बनाया है।
आज होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव में भी सत्ताधारी बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए और विपक्षी दलों के उम्मीदवारों के बीच उम्मीदवार के बीच मुकाबला है। लेकिन यह मुकाबला कांग्रेस पार्टी नीत विपक्षी इंडि गठबंधन द्वारा अपनी पहचान को बनाये रखने के लिए हो रहा है। इस बार उपराष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पक्ष एनडीए के सीपी राधाकृष्णन और विपक्षी इंडि गठबंधन के सुदर्शन रेड्डी के बीच मुकाबला है। एनडीए की संख्या बल के कारण राधाकृष्णन की जीत तय नजर आ रही है। वहीं विपक्षी उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी को सांसदों की अंतरात्मा की आवाज पर भरोसा है।
अंतर बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा एनडीए
एनडीए अपनी जीत को तय मानकर को बड़े अंतर से करने की रणनीति पर काम कर रहा है। एनडीए निर्दलीयों और तटस्थ दलों को अपने साथ लाने की रणनीति पर भी काम किया है, क्योंकि एनडीए की एक-एक वोट पर नजर है। यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि दोनों ही उम्मीदवार दक्षिण भारत से है। एनडीए के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन तमिलनाडु से हैं, वहीं विपक्षी गठबंधन के उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी तेलंगाना से हैं। इंडी गठबंधन अपने घटक दलों को एकजुट रखने के साथ-साथ कुछ अतिरिक्त संख्या भी जुटाने की उम्मीद में है। संख्या बल एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में है, इसलिए विपक्षी गठबंधन के उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी ने वीडियो अपील जारी करके विपक्षी सांसदों को साधने के लिए अंतरात्मा की आवाज जो कभी इंदिरा गांधी ने दी थी, उसी अंतरात्मा की आवाज का सहारा लेकर अपनी संख्या बढ़ाने का दांव चला है। वहीं भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सीपी राधाकृष्णन की जीत के मार्जिन को बढ़ाने के लिए तमाम दलों का समर्थन जुटाने की कवायद कर रहा है।
अंतरात्मा की आवाज पर मतदान की बात इसलिए कही जा रही है, क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव की तरह ही उपराष्ट्रपति चुनाव में भी वोटिंग के लिए कोई भी राजनीतिक दल व्हिप जारी नहीं कर सकता। उपराष्ट्रपति चुनाव में प्रत्येक सांसद (मतदाता) अपनी इच्छा से जिसे चाहे वोट दे सकता है और वोट नहीं भी दे सकता है। मतदान गुप्त होता है। संविधान के अनुच्छेद 66 के मुताबिक, भारत में उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक मंडल के जरिए किया जाता है। निर्वाचक मंडल में लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 245 निर्वाचित सदस्य शामिल होते है। इन 245 सदस्यों में राज्यसभा के 12 मनोनीत सदस्य भी उपराष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल का हिस्सा होते हैं।
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इस तरह निर्वाचक मंडल में कुल 788 सदस्य होते हैं। लेकिन, वर्तमान में लोकसभा में सांसदों की संख्या 542 है, क्योंकि एक सीट खाली है। जबकि राज्यसभा में 245 सांसदों में से छह सीटें खाली हैं। अतएव इस बार के उपराष्ट्रपति चुनाव में निर्वाचक मंडल में लोकसभा और राज्यसभा दोनों मिलाकर 781 सदस्य हैं। बहुमत के लिए 391 सांसदों के समर्थन की जरूरत है। अगर सभी सांसद पार्टी लाइन पर वोट करें तो एनडीए उम्मीदवार राधाकृष्णन के पक्ष में 428 सांसदों का समर्थन है, जबकि विपक्षी उम्मीदवार के पक्ष में सिर्फ 318 सदस्यों का। आंकड़े बता रहे हैं कि एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना लगभग तय है।
तटस्थ दल
तटस्थ दलों की भूमिका भी खुल कर सामने आ गई है। के चंद्रशेखर राव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति (BRS) और नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल (BJD) ने साफ कर दिया है। उनका दल उपराष्ट्रपति चुनाव में शामिल नहीं होंगी। दोनों पार्टियों के इस दांव से एनडीए उम्मीदवार की राह और भी आसान हो गई है।
उपराष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया
उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए संसद भवन में एक कक्ष मतदान स्थल के रूप में तय किया जाता है। उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान करने का तरीका राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति निर्वाचन नियम 1974 के नियम 17 में स्पष्ट तौर पर दिया गया है। मत पत्र में उम्मीदवारों के नाम तो होते हैं, लेकिन इसमें कोई भी निर्वाचन प्रतीक नहीं होता। मत पत्र में दो कॉलम होते हैं एक तरफ उम्मीदवार का नाम और दूसरी तरफ वरीयता क्रम दर्शाने का कॉलम होता है। वोट देते समय निर्वाचक उम्मीदवार के नाम के सामने वरीयता अंकित कर सकते हैं।
कई बार निर्विरोध हो चुका है उपराष्ट्रपति चुनाव
उपराष्ट्रपति चुनाव भी कई बार निर्विरोध तो कई बार दिलचस्प मुकाबले वाला रहा है। 1952 के चुनाव में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जनाब शेख खादिर हुसैन ने नामांकन किया था। लेकिन, खादिर हुसैन का नामांकन खारिज हो गया था और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन निर्विरोध निर्वाचित हुए। 1957 के उपराष्ट्रपति चुनाव में भी एक बार फिर डॉ. राधाकृष्णन निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। 1962 में तीसरे उपराष्ट्रपति चुनाव में डॉक्टर जाकिर हुसैन ने एनसी सामंत सिंगर को 500 से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया था। 1967 में चौथे उपराष्ट्रपति चुनाव में दिलचस्प मुकाबला हुआ था, जब वीवी गिरी और प्रोफेसर हबीब आमने-सामने थे। इस चुनाव में वीवी गिरी को 483 वोट मिले जबकि प्रोफेसर हबीब को 193 वोट मिला था। पांचवा उपराष्ट्रपति चुनाव 1972 के बजाय 1969 में ही कराना पड़ा। क्योंकि 1969 में तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के निधन के बाद वीवी गिरी कार्यवाहक राष्ट्रपति बने थे।
बाद में उन्होंने कार्यवाहक राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया और राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था। ऐसे में उपराष्ट्रपति का पद खाली हो गया और चुनाव करवाना पड़ा। 1969 में पांचवें उपराष्ट्रपति चुनाव में छह उम्मीदवार थे, लेकिन गोपाल स्वरूप पाठक ने मतगणना के पहले ही राउंड में 400 प्रथम वरीयता के वोट हासिल कर शानदार जीत दर्ज किया था। 1974 में हुए छठे उपराष्ट्रपति चुनाव में भी बी डी जत्ती और एनई होरो के बीच मुकाबला हुआ। जिसमें बी डी जत्ती ने 521 वोट हासिल कर जीत दर्ज की जबकि एनई हीरो को 141 वोट मिला था। 1979 में हुए सातवें उपराष्ट्रपति चुनाव में मोहम्मद हिदायतुल्लाह निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। आठवां उपराष्ट्रपति चुनाव 1984 में हुआ था, जिसमें आर वेंकटरमण ने बापू चंद्रसेन कांबले को 301 वोटों के अंतर से हराया था।
आर वेंकटरमण का कार्यकाल 30 अगस्त 1989 तक था लेकिन जुलाई 1987 में राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन्होंने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया और इस तरह 1987 में नौवा उपराष्ट्रपति चुनाव कराना पड़ा था। इस चुनाव में 27 उम्मीदवारों ने नाम नामांकन किया था। लेकिन सिर्फ डॉ.शंकरदयाल शर्मा का नामांकन ही वैध माना गया और उपराष्ट्रपति वह निर्विरोध निर्वाचित हो गए। 10वां उपराष्ट्रपति चुनाव के. आर नारायण और काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ में हुआ था। के आर नारायण को 700 वोट मिले। वहीं धरती पकड़ को सिर्फ एक वोट मिला था। 1997 में 11 वे उपराष्ट्रपति चुनाव में कृष्णकांत ने सुरजीत सिंह बरनाला को हराया था। कृष्णकांत को 441 मत मिला था, वहीं बरनाला को 273 मत मिला था।
12वें उपराष्ट्रपति चुनाव में भैरव सिंह शेखावत ने सुशील कुमार शिंदे को हराया था। भाजपा के भैरव सिंह शेखावत को 454 मत मिला था वही कांग्रेस पार्टी के सुशील कुमार शिंदे को 305 मत ही मिला था। 13वें उपराष्ट्रपति का चुनाव त्रिकोणीय हुआ था। इसमें मोहम्मद हामिद अंसारी को 455, वहीं भाजपा की डॉ. नजमा हप्तुल्लाह को 222 मत मिला था। वहीं तीसरे उम्मीदवार रशीद मसूद को 75 वोट मिला था। हामिद अंसारी इस प्रकार यह चुनाव जीत गए थे। मोहम्मद हामिद अंसारी सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद दो बार उपराष्ट्रपति बनने वाले एकमात्र दूसरे व्यक्ति थे। 14वें उपराष्ट्रपति के चुनाव में मोहम्मद हामिद अंसारी को 490 मत मिला था। वहीं जसवंत सिंह को 238 वोट मिला था। 15वां उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के एम वेंकैया नायडू 516 वोट लेकर जीत गए थे। महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी को 244 वोट मिला था और वे हार गए थे। 16वां उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के जगदीप धनखड़ को 582 मत मिला था वही कांग्रेस पार्टी की मार्गरेट अल्वा को महज 182 मत ही मिल सका था।

















