राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 70 से अधिक देशों पर आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ाने के फैसले ने अमेरिका के भीतर ही विवाद खड़ा कर दिया है। अमेरिकी अदालतों ने इसे 1977 के उस कानून का उल्लंघन बताया है, जिसे घरेलू संकटों से निपटने के लिए बनाया गया था। अदालत का कहना है कि इतने देशों पर एकतरफा टैरिफ अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और अमेरिकी कानून के खिलाफ है।
29 अगस्त को अदालत ने ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ नियमों को अनुचित ठहराया और ट्रंप प्रशासन को 14 अक्टूबर तक उच्च अदालत में अपील करने का समय दिया। इसके जवाब में ट्रंप प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट से नवंबर में जल्द सुनवाई की अपील की है। इस फैसले का अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर हो सकता है। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के फैसले को खारिज करता है, तो सरकार को अब तक वसूले गए टैरिफ का बड़ा हिस्सा, लगभग 750 अरब डॉलर तक, लौटाना पड़ सकता है। कस्टम विभाग ने अब तक नई टैरिफ दरों से 70 अरब डॉलर की वसूली की है, जो सालभर की कुल वसूली का आधा है।
ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भी दबाव बनाना शुरू कर दिया है। उन्होंने उन पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। बेसेंट के अनुसार, यदि अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मिलकर द्वितीयक प्रतिबंध लगाए, तो इससे रूस की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंच सकती है। भारत भी इस नीति से प्रभावित हुआ है। भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने पर पहले ही 25% टैरिफ लगाया गया था, जिसे अब बढ़ाकर 50% कर दिया गया है। यह दरें 27 अगस्त से लागू हो चुकी हैं। ट्रंप और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष वॉन डेर लेयन के बीच इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई है, जिससे साफ है कि आने वाले समय में वैश्विक व्यापार पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।

















