पाकिस्तान में बच्चों के यौन शोषण की स्थिति लगातार बदतर होती गई है। वहां का सामाजिक ताना—बाना ऐसा है या लचर कानूनी सुरक्षा, इस प्रकार की घटनाएं अक्सर रिपोर्ट नहीं की जातीं, या रिपोर्ट दर्ज होती भी हैं तो उन पर पूरी कार्रवाई नहीं हो पाती। संभवत: इसी वजह से ऐसे अपराधी निर्भय होकर अपराध में लिप्त रहते हैं। सरकार तो वहां बस नाम की ही है, क्योंकि उसे कथित तानाशाह रहे सेना प्रमुखों से अपनी कुर्सी बचाने में ही पूरा वक्त खपाना पड़ता है, देश—समाज की चिंता करने की उसे फुर्सत कहां है। यही कारण है कि वहां महिलाएं और बच्चे सामाजिक सुरक्षा से बहुत दूर हैं। एक संस्था की रिपोर्ट है कि साल 2025 की पहली छमाही के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे इस संकट की गंभीरता को उजागर करते हैं। इस साल इस अवधि में ही दौरान बाल शोषण के 2130 मामले दर्ज हो चुके हैं। इतना ही नहीं, इस अपराध के शिकार हुए 103 बच्चों की तो जान ही जा चुकी है।
वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी की बड़े जतन से तैयार की गई रिपोर्ट बताती है कि 2025 की पहली छमाही में बाल शोषण के दर्ज मामलों में से 453 तो बस यौन शोषण से संबंधित हैं। इनमें से ही 103 बच्चों की मौत की पुष्टि हो पाई है। यानी कई मामलों में यौन शोषण का शिकार बनाने के बाद बच्चे की जान ही ले ली गई। इसी प्रकार इस अवधि में 62 नवजात शिशु या तो मरे पाए गए या कहीं बेसहारा छोड़ दिए गए।

रिपोर्ट का आकलन है कि बाल यौन शोषण के सबसे ज्यादा शिकार 11 से 15 साल के बच्चे हुए हैं। इस उम्र में बालक अबोध होते हैं इसलिए अपराधियों द्वारा आसानी से फुसला लिए जाते हैं। कुल मामलों में से पंजाब में सबसे अधिक 72 प्रतिशत मामले दर्ज हुए हैं, सिंध में 22 प्रतिशत मामले पुलिस ने दर्ज किए हैं।
ऐसे मामलों में दिक्कत यह है कि परिवार के लोग ही भय और अपमान के अंदेशे से पुलिस के सामने जाकर मामला दर्ज कराने से घबराते हैं। कुल मामलों में से 27 मामले ऐसे हैं जिनमें परिवार के लोग डर के मारे पुलिस तक भी नहीं पहुंचे कि कहीं कलंक न लगे या अपराधी बदला लेने न आ धमके।
रिपोर्ट बताती है कि बाल यौन शोषण के अपराधी ज्यादातर मामलों में परिचित ही होते हैं। यानी 49 प्रतिशत मामले ऐसे दिखे हैं जिनमें आरोपी बच्चे के परिवार वालों की जान-पहचान के थे। कोई रिश्तेदार था, कोई शिक्षक तो कोई पड़ोसी। आंकड़े बताते हैं कि ऐसे 59 प्रतिशत मामले तो शहरी इलाकों से ही सामने आए हैं। साफ है कि यह अपराध केवल देहाती इलाकों तक सीमित नहीं है।
संस्था की यही रिपोर्ट पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाती है। 83 प्रतिशत मामलों में तो पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की, लेकिन ढेरों ऐसे मामलों में पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज करने से मना कर दिया। जिन्ना के देश की न्याय प्रणाली तो जर्जर हो चुकी है। यही कारण है कि ज्यादातर मामलों में आरोपी को सजा ही नहीं मिलती, वह बेदाग बरी हो जाता है और पीड़ितों और उनके परिवारों का कानून से भरोसा ही उठ जाता है।

वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ऐ गैर सरकारी संस्था है, इसने और कुछ अन्य संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने इस संबंध में कोई ठोस कदम नहीं उठाती तो यह समस्या और विराल होती जाएगी।
इस एनजीओ की रिपोर्ट 2018 से 2023 के बीच के बाल यौन शोषण के मामलों का आंकड़ा भी सामने रखती है। पता चलता है कि इस प्रकार की घटनाएं लगातार बढ़ती ही गई हैं। हैरानी की बात नहीं कि इन मामलों में निशाने पर सबसे ज्यादा अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चे रहते हैं। हिंदू, ईसाई और अहमदी समुदायों को वहां दोयम दर्जे का माना ही जाता है इसलिए उनके बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के कई मामले सामने आते रहे हैं।
आरोप है कि जिन्ना के देश का मुख्यधारा मीडिया भी इस ओर अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा रहा है। मीडिया कई मौकों पर ऐसे मामलों को अनदेखा कर देता है या दबा देता है। कुछ मामले जरूर प्रकाश में लाए जाते हैं, जैसे लाहौर में मार्च 2025 में सामने आया मामला, जिसमें एक 13 साल की लड़की को उसके स्कूल शिक्षक ने कई महीनों तक शोषण का शिकार बनाया। जब यह बात उजागर हुई तो स्कूल प्रशासन ने आरोपी को ही बचाने की पूरी कोशिश की।
इसी तरह अप्रैल 2025 में कराची में एक मदरसे में 9 बच्चों के साथ यौन दुराचरण का मामला हुआ था। मदरसे के संचालक को गिरफ्तार किया गया, लेकिन राजनीतिक दबाव डाला गया और कोशिश हुई कि मामला तूल न पकड़े। फैसलाबाद में मई 2025 में एक फैक्ट्री में काम करने वाले बच्चों के साथ मालिक और सुपरवाइज़र ने यौन शोषण किया। सामाजिक संगठनों के दबाव के बाद ही वह मामला दर्ज हो पाया था।
जिन्ना के इस्लामवादी देश में बाल सुरक्षा कानून तो बन हुए हैं, लेकिन उनका जैसा क्रियान्वयन होना चाहिए वैसा नहीं होता। राजनीति करने वालों की उसकी चिंता भी नहीं है। 2020 में एक जैनाब अधिनियम बना था जिसके तहत लापता बच्चों की तत्काल खोज और रिपोर्टिंग की व्यवस्था की गई थी, लेकिन धरातल पर यह कानून प्रभाव ही नहीं दिखा पाता। बेशक, जब तक राज्य, समाज और न्याय प्रणाली मिलकर ठोस कदम नहीं उठाते, तब तक वहां यह संकट और गहराता जाएगा।

















