संत, ऋषि, माँ भारती के सुपुत्र, साधक व तपस्वी ऐसे तमाम अलंकरण जिसके व्यक्तित्व से एकाकार होकर यथार्थ में परिणित हो गए हों वह दुर्लभ देवतुल्य व्यक्तित्व थे श्रद्धेय शांताराम सर्राफ. माननीय शांताराम सर्राफ जी का जन्म महाराष्ट्र के जलगांव के यावल में श्री त्रयंबक सर्राफ एवं माता श्रीमती कमला देवी के यहां 1932 को हुआ.
परिवार और प्रारंभिक शिक्षा
श्री त्रयंबक एवं श्रीमती कमला देवी के चार पुत्र व एवं दो बेटियां हुई. सभी को उन्होंने अच्छी शिक्षा दी. श्री शांताराम भाई बहनों में दूसरे स्थान पर थे. उनका घर सनातन, संस्कार व स्वदेशी के विचारों से ओतप्रोत था. माता-पिता के मन में अंग्रेजी शासन के प्रति जो तिरस्कार का भाव था, उसने ही शांताराम जी के बाल मन में देशप्रेम का प्रारंभिक बीजारोपण किया.
प्रचारक जीवन की शुरुआत
स्कूली शिक्षा उन्होंने यावल में ही प्राप्त की. संघ में प्रचारक जीवन प्रारंभ करने से पूर्व वह मध्यप्रदेश के सागर में बैंक में पदस्थ थे. यहां उन्होंने डॉ हेडगेवार जी के कई प्रेरक बौद्धिक पढ़े, जो उनके लिए अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र कार्य हेतु समर्पित करने की फलश्रुति बन गया. सागर से ही वह प्रचारक जीवन में आए.
दुर्ग और रायपुर में जिम्मेदारी
1963 उनकी योजना दुर्ग में जिला प्रचारक के दायित्व में हुई. इसके बाद 1967 में रायपुर विभाग प्रचारक का दायित्व आया. उस समय बस्तर भी रायपुर विभाग में सम्मिलित था. वह कोंटा, भोपालपट्टनम, मोहला, मानपुर जैसे दूरस्थ अंचल का सतत प्रवास करते थे. रायपुर में जयस्तंभ चौक के पास जयराम टाकिज के ऊपर एक कमरे में संघ का कार्यालय लगता था, यहीं से संघ कार्य के विस्तार की योजनाएं बनीं.
छत्तीसगढ़ प्रांत कार्यालय जागृति मंडल
शांताराम सर्राफ जी के मार्गदर्शन में ही छत्तीसगढ़ प्रांत कार्यालय जागृति मंडल का निर्माण प्रारंभ हुआ. कई बार वह स्वयं श्रमिकों के साथ कार्य में जुट जाते थे. जागृति मंडल प्रकल्प की एक-एक ईंट में उन्होंने समाज का सहयोग लिया. 1989 में वह छत्तीसगढ़ प्रांत के पहले प्रांत प्रचारक बने.
लोकेष्णा से दूर
वह देश और समाज में घटित घटनाओं की जानकारी लेते रहते थे, लेकिन व्यक्तिगत जानकारी लेने पर नाराज़ हो जाते. मुझ समेत हज़ारों कार्यकर्ता उनमें दैवीय रूप का दर्शन करते हैं.
जब नर्स ने पूछा ये संघ भाई क्या होता है?
कुछ वर्ष पूर्व गुरुग्राम में उपचार के दौरान नर्स ने जब पूछा ये भाई हैं? तो उन्होंने उत्तर दिया – हाँ, हम संघ भाई हैं. हमारी माता भारत माँ और गुरु भगवा ध्वज है. यह सुनकर नर्स बहुत प्रसन्न हुई.
श्रेष्ठ नियोजक और सेवा प्रकल्प
वरिष्ठ प्रचारक के रूप में अत्यधिक आयु होने पर भी उनकी सक्रियता प्रेरणादायक रही. मदकू द्वीप को राष्ट्रीय धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन स्थल के रूप में पहचान दिलाने का श्रेय श्रद्धेय शांताराम को जाता है. यहाँ से 19 स्मार्थ शिवलिंग मिले. नवागढ़ के प्राचीन गणेश मंदिर का जीर्णोद्धार और सिमगा के पास ओडगन में राम मंदिर का निर्माण भी उनके प्रयासों से संभव हुआ.
आपातकाल और सेवा
वह आपातकाल में मीसाबंदी भी रहे. उन्हें मिलने वाली पेंशन भी सेवा प्रकल्पों को समर्पित कर दी. अंतिम समय तक वह अपने वैचारिक अधिष्ठान के प्रति अडिग रहे.
संस्मरण और लोकसंग्राहक व्यक्तित्व
भास्कर राव किन्हेकर कहते हैं, वह बिना अधिकार और पद के भी सबके हृदय में बसते थे. भानु सोनी ने उन्हें अद्भुत लोक संग्राहक बताया. वर्षों बाद भी किसी व्यक्ति का नाम याद रखकर उनसे मिलना उनका विशेष गुण था.
राजनीतिक और सामाजिक श्रद्धांजलि
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उन्हें प्रेरणादायी सेवाव्रती बताया. विधानसभा अध्यक्ष डॉ रमन सिंह ने कहा, मदकू द्वीप और नवागढ़ का गणेश मंदिर रहते तक वह अमर रहेंगे.
भक्ति और आध्यात्मिकता
शांताराम जी गणेश जी के पुजारी थे. स्नान के बाद गणपति जी को चंदन लगाना और शाम को हनुमान चालीसा का पाठ करना उनका नित्य कर्म था.
अंतिम यात्रा और आदर्श
5 सितंबर 2025 को संध्याकाल में 93 वर्ष की आयु में उन्होंने देवलोक की यात्रा की. प्रांत संघचालक श्री टोपलाल ने आह्वान किया कि संघ शताब्दी वर्ष में स्वयंसेवक उनके बताए मार्ग पर चलते हुए छत्तीसगढ़ के हर गांव तक सनातन, संस्कार और हिन्दू संस्कृति का भाव जागृत करें – यही उनकी सच्ची आदरांजलि होगी.

















