पाकिस्तान पर भारत की ऐतिहासिक जीत : आज ही के दिन भारतीय सेना ने दुश्मन को घर में घुसकर खदेड़ा था
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पाकिस्तान पर भारत की ऐतिहासिक जीत : आज ही के दिन भारतीय सेना ने दुश्मन को घर में घुसकर खदेड़ा था

भारतीय सेना ने 6 सितंबर 1965 को पाकिस्तान को करारी हार दी। लाहौर तक पहुंची सेना, 100 पैटन टैंक ध्वस्त हुए और ऑपरेशन जिब्राल्टर चूर-चूर ...

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Sep 6, 2025, 08:33 pm IST
inभारत, विश्लेषण, आजादी का अमृत महोत्सव
6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान को हराकर लाहौर तक खदेड़ा

6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान को हराकर लाहौर तक खदेड़ा

6 सितंबर, सन् 1965 का दिन भारत–पाक युद्ध के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दिन हिंद की सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पाकिस्तान को लाहौर तक खदेड़ा था। भारतीय सेना ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान छेड़ा था। लाहौर और सियालकोट की ओर तीव्रता से बढ़ते हुए अनेक रणनीतिक क्षेत्रों पर कब्जा किया और पाकिस्तान की सैन्य शक्ति को धूल चटाई थी।

सन् 1965 का भारत -पाकिस्तान युद्ध भारतीय इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण है, इस युद्ध में भारत की विजय ने, सन् 1962 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस की कूटनीतिक,राजनीतिक,और रणनीतिक विफलताओं के कारण जन्मे भारत-चीन युद्ध में भारतीय सेना की पराजय के बाद टूटे आत्मविश्वास, बिखरे गौरव और पराजय के मनोविज्ञान से मुक्त कर, पुनः भारतीय सेना की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता को पुर्नस्थापित किया,तदुपरान्त हिंद की सेना अपराजेय है।

नेहरू की असफल कश्मीर नीति

भारत-पाकिस्तान युद्धों से लेकर पहलगाम हमले तक की असली जड़,जवाहरलाल नेहरू और उनके इर्द-गिर्द घूमने वाले सहयोगियों की असफल कश्मीर नीति ही रही है, जिसका खामियाजा भारत आज भी भुगत रहा। पहलगाम हमले के बाद प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा था कि यदि 1948 में जवाहरलाल नेहरू जी ने सरदार वल्लभभाई पटेल के सुझाव मान लिए होते तो पहलगाम अटैक न झेलना पड़ता।

सरदार पटेल का मत

सन् 1965 के भारत -पाकिस्तान युद्ध की पूर्णपीठिका भी कश्मीर मसले से ही जुड़ी है। कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में उठाया जाए, सरदार पटेल इस बात के घोर विरोधी थे। उनका अभिमत था कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की आवश्यकता नहीं है। सरदार पटेल ने लार्ड माउंटबेटन के सामने भी कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय विषय मानने से इनकार किया था और कहा था कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना रणनीतिक भूल होगी। उन्होंने कहा था -If Hyderabad is our internal matter, so is Kashmir.’ अर्थात् “यदि हैदराबाद हमारा आंतरिक मसला है,तो कश्मीर भी है।” लेकिन नेहरू जी का कश्मीर प्रेम प्रकारान्तर से इतना उमड़ा कि उन्होंने सरदार पटेल की एक नहीं सुनी और 1 जनवरी 1948 को कश्मीर का मामला भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में उठाया गया। यहां तक कि यह जानकारी जानबूझकर सरदार पटेल को विलम्ब से दी गई।

ऑपरेशन जिब्राल्टर की उड़ी धज्जियां

बहरहाल अब युद्ध की ओर चलते हैं, आज के दिन “जय जवान का नारा बुलंद हुआ”और राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री एवं थल सेनाध्यक्ष जनरल जे.एन.चौधरी के नेतृत्व में सन् 1965 के युद्ध में पाकिस्तान(युद्ध के जिम्मेदार अयूब खान, मूसा खान एवं टिक्का खान) के विरुद्ध,भारतीय सेना ने पंजाब फ्रंट खोल दिया – ऑपरेशन जिब्राल्टर की धज्जियां उड़ाते हुए अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर, लाहौर की ओर कूच किया। वर्ष के नौवें महीने का छठा दिन देश के इतिहास में सेना के शौर्य की याद दिलाता है।

जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ का कोड वर्ड था

पाकिस्तान के ऑपरेशन जिब्राल्टर(Operation Gibraltar) का भारतीय सेना (Indian Army) ने 6 सितंबर 1965 को मुंहतोड़ जवाब दिया था। ऑपरेशन जिब्राल्टर पाकिस्तान की जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करने की रणनीति का कोड वर्ड था, जो भारतीय शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू करने के लिए किया गया था। सफल होने पर, पाकिस्तान को कश्मीर पर नियंत्रण हासिल करने की उम्मीद थी लेकिन उसके लिए यह अभियान एक बड़ी विफलता साबित हुआ। इसके जवाब में 6 सितंबर 1965 को भारतीय सैनिकों ने कार्रवाई की। अंतत: युद्ध छिड़ा और उसमें भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी।

100 पैटन टैंकों को किया ध्वस्त

असल का युद्ध (Battle of Asaal north) विश्व के प्रसिद्ध युद्धों में गिना जाता है, क्योंकि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद टैंकों का सबसे बड़ा युद्ध था। यह युद्ध 8 से 10 सितंबर के मध्य लड़ा गया। पाकिस्तान ने खेमकरण सेक्टर में अमेरिका के 100 से अधिक उन्नत पेटन टेंकों को उतारा, परन्तु भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए 100 पैटन टैंकों की धज्जियाँ उड़ाते हुए, शानदार विजय प्राप्त की। आज भी खेमकरण के उस क्षेत्र को” पैटन नगर” के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में भारत ने स्वदेशी तकनीक का भी इस्तेमाल किया और अमेरिका को अपने पैटन टैंकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

ऑपरेशन डेजर्ट हॉक की कमर पहले ही तोड़ दी

पाकिस्तान के ऑपरेशन डेजर्ट हॉक की कमर पहले ही तोड़ दी थी और आपरेशन ग्रेंड स्लेम को भी ध्वस्त कर दिया। 23 सितंबर को पाकिस्तान ने पूर्ण रुप से घुटने टेक दिए। भारत ने पाकिस्तान के 1500 वर्ग मील (3885वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था, जबकि पाकिस्तान ने 210वर्ग मील (648 वर्ग किलोमीटर) का असत्य दावा किया, परंतु 11 जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के चलते भारत ने पाकिस्तान को भूमि वापस कर दी।

लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु आज भी रहस्य

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु आज भी रहस्यमयी बनी हुई है। सूत्र बताते हैं,कि प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री अडिग थे कि भूमि तभी वापस होगी जब जिन्ना का देश पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) भारत को समर्पित करेगा तथा और भी बहुत कुछ था। परंतु ये बात कुछ वंशानुगत शासकों को रास नहीं आई, इसलिए विजय के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का बलिदान हुआ।

Topics: जम्मू-कश्मीरसरदार पटेललाल बहादुर शास्त्री
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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