कर्नाटक के धर्मस्थला का एक मंदिर, जो लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है, एक बार फिर निशाना बना है। एक शोध समूह ने जुलाई 2025 से अगस्त 2025 के बीच इस मंदिर के खिलाफ प्रकाशित 20 से अधिक लेख, पोस्ट और टिप्पणियों का संकलन किया। जिनका एक मात्र उद्देश्य मंदिर की पवित्र छवि को धूमिल करना था। यह पहली बार नहीं है जब धर्मस्थला पर हमला हुआ हो। इसके अनगिनत मामले हैं लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी किसी संत या मंदिर के खिलाफ दुष्प्रचार की योजना बनती है, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का पूरा इकोसिस्टम—जिसमें एनजीओ, शिक्षक, प्राध्यापक और मीडिया शामिल हैं—सक्रिय हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
4 जुलाई 2025 को, एक पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया ने सनसनीखेज आरोप लगाया कि 1995 से 2014 के बीच उसे सैकड़ों बलात्कार और हत्या के शिकार लोगों के शवों को दफनाने के लिए मजबूर किया गया। इस दावे ने पूरे राज्य में हलचल मचा दी। चिन्नैया ने इस पूरे मामले में शरारतपूर्ण तरीके से एक स्थानीय मंदिर का नाम जोड़ दिया था। हालांकि, 23 अगस्त 2025 को चिन्नैया को झूठी गवाही और नकली सबूत पेश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इसके बावजूद, ‘द न्यूज मिनट’ जैसे कई मीडिया पोर्टलों ने चिन्नैया के असत्यापित दावों को बिना जांच-पड़ताल के बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे मंदिर की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा। उन्होंने मिलकर मीडिया ट्रायल प्रारंभ किया। शोध समूह की रिपोर्ट के बाद यह बात अब साबित है कि जुलाई से अगस्त 2025 के बीच मंदिर के खिलाफ सुनियोजित दुष्प्रचार का अभियान कांग्रेस और लेफ्ट इको सिस्टम ने चलाया।
मीडिया की लापरवाही और कोर्ट के निर्देश
मीडिया की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन इसके साथ नैतिकता और जिम्मेदारी का पालन अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल के दिशानिर्देशों में इसकी महत्ता को रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त 2025 को मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध से इनकार करते हुए कहा कि यह केवल असाधारण परिस्थितियों में लागू हो सकता है और निचली अदालत को निष्पक्ष सुनवाई का आदेश दिया। इसी तरह, कर्नाटक हाई कोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को बेंगलुरु सिविल कोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें संस्थानों को खबर से जुड़ी लिंक और खबरें हटाने का निर्देश था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मीडिया की स्वतंत्रता को दबाने के लिए ठोस आधार जरूरी है।
हालांकि, इन निर्देशों के बावजूद, कुछ मीडिया संस्थानों ने गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाया। चिन्नैया की व्हिसलब्लोअर के रूप में पहचान उजागर कर दी गई, जबकि कोर्ट ने उनकी गोपनीयता बनाए रखने का आदेश दिया था। इससे उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ी और जांच प्रक्रिया बाधित हुई। साथ ही, कुछ यूट्यूब चैनलों और न्यूज पोर्टल्स ने बिना तथ्यों की पुष्टि के मंदिर को बदनाम करने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए, कुछ रिपोर्टों में मंदिर परिसर में सामूहिक कब्रों की अफवाह फैलाई गई, जबकि एसआईटी की जांच में ऐसी कोई पुष्टि नहीं हुई। इस तरह का ‘मीडिया ट्रायल’ न केवल तथ्यों को तोड़ता-मरोड़ता है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और विश्वास को भी नुकसान पहुंचाता है। इससे जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है और निर्दोष व्यक्तियों या संस्थानों की प्रतिष्ठा को अनुचित क्षति पहुंचती है।
इसलिए, कांग्रेस—लेफ्ट इकोसिस्टम वाले मीडिया समूहों को मंदिर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सनसनीखेज और अपुष्ट दावों से बचना चाहिए। धार्मिक संस्थानों को बदनाम करने की कोशिश न केवल सामाजिक तनाव को बढ़ावा देती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी कमजोर करती है। मीडिया को अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए और तथ्यों पर आधारित, संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए, ताकि समाज में विश्वास और शांति बनी रहे।
कांग्रेस का षड्यंत्र: हिंदू विरोधी नीतियों का पर्दाफाश
धर्मस्थला विवाद में कांग्रेस की भूमिका को समझने के लिए उसके इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। कांग्रेस पर लंबे समय से हिंदू विरोधी और मंदिर विरोधी नीतियों का आरोप लगता रहा है। 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में हिजाब के समर्थन में खड़े होकर कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत हासिल की थी। जबकि पार्टी से जुड़ा स्त्रीवादी समूह महिला स्वतंत्रता की बात करता है। इनके लोग हिन्दूओं के लिए ‘नो ब्रा’ का अभियान चलाते हैं और मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने के पक्ष में भी तर्क गढ़ते हैं। धीरे धीरे भारतीय समाज के सामने इनके हिन्दू विरोधी चरित्र का खुलासा हो रहा है। इस बार भी, कांग्रेस ने धर्मस्थला मामले को सियासी लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की है।
वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने एक वीडियो में कांग्रेस की हिंदू विरोधी नीतियों को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने कभी भी हिंदू धर्म और उसके प्रतीकों के प्रति सम्मान नहीं दिखाया है। जब भी देश में किसी संत या मंदिर के खिलाफ नकारात्मक प्रचार की जरूरत पड़ती है, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों, साथ ही वामपंथी संगठनों का पूरा इकोसिस्टम—जिसमें एनजीओ, प्राध्यापक, शिक्षक और मीडिया शामिल हैं—सक्रिय हो जाता है।
इकोसिस्टम का षड्यंत्र
धर्मस्थला मामले में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का इकोसिस्टम साफ दिखाई देता है। एनजीओ, शिक्षक और प्राध्यापक जैसे समूहों ने मंदिर के खिलाफ दुष्प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाई। उदाहरण के लिए, कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में मंदिर को ‘हिंदू आतंकवाद’ का केंद्र बताया गया, जो पूरी तरह बेबुनियाद था। इस इकोसिस्टम का मकसद मंदिर की छवि को धूमिल करना और हिंदू धर्म को बदनाम करना है।
‘न्यूज़लॉन्ड्री’ की मनीषा पांडे ने एक वीडियो में धर्मस्थला मामले को हवा देते हुए कहा कि स्वतंत्र मीडिया को समर्थन देना चाहिए, क्योंकि यह सच को उजागर करता है। हालांकि, इस वीडियो में तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा गया और मंदिर के खिलाफ मीडिया ट्रायल चलाया गया। इसी तरह, ‘द न्यूज मिनट’ जैसे पोर्टल्स ने चिन्नैया के झूठे दावों को बढ़ावा दिया, जो बाद में गलत साबित हुआ। यह स्पष्ट है कि इन संस्थानों का मकसद सच को सामने लाना नहीं, बल्कि एक निश्चित एजेंडा को बढ़ावा देना था।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इस मामले को सियासी लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन बीजेपी ने ‘धर्मयात्रा’ शुरू करके इस षड्यंत्र का पर्दाफाश किया। बीजेपी ने दावा किया कि कांग्रेस ने मंदिर को बदनाम करने के लिए इस मामले का राजनीतिकरण किया, जो हिंदू विरोधी मानसिकता को दर्शाता है।
मीडिया और सरकार की जिम्मेदारी
मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। कोर्ट के दिशानिर्देशों की अनदेखी कर सनसनीखेज पत्रकारिता करने से मंदिर की छवि को नुकसान पहुंचा है। सरकार को जांच में पारदर्शिता बरतनी होगी ताकि सच्चाई सामने आ सके। एसआईटी की जांच पूरी होने तक सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए, ताकि सामाजिक सौहार्द और कानूनी प्रक्रिया पर कोई आंच न आए।
धर्मस्थला मामला एक बार फिर साबित करता है कि कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम की भूमिका किसी संत या मंदिर के खिलाफ दुष्प्रचार में संदिग्ध होती है। मीडिया ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया, जबकि कांग्रेस ने इसे सियासी लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि कानून सबके लिए समान है, चाहे वह धार्मिक संस्था हो या व्यक्ति। इसलिए, इस मामले में तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। जांच पूरी होने तक संयम और पारदर्शिता ही इस विवाद को सुलझाने का रास्ता है।

















