अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बंगाल में कई बातें होती रहती हैं, वैसे अभिव्यक्ति की आजादी वहाँ पर इतनी है कि आज भी बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन वहाँ नहीं जा सकती हैं। आज भी उनकी पुस्तकों को लेकर वहाँ पर आयोजन नहीं हो सकते हैं।
बंगाल में कहां है अभिव्यक्ति की आजादी
अभिव्यक्ति की आजादी कितनी बंगाल में है, इसका एक उदाहरण और सामने आ रहा है, जब राज्य द्वारा संचालित पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने अपना एक आयोजन इसलिए स्थगित कर दिया, कि उसमें जावेद अख्तर को बुलाए जाने का विरोध इस्लामिक कट्टरपंथी कर रहे थे। यह आयोजन 31 अगस्त से आरंभ होने वाला था और चूंकि यह आयोजन हिन्दी सिनेमा में उर्दू को लेकर था, इसलिए जावेद अख्तर को भी आमंत्रित किया गया था। जावेद अख्तर को कोलकता मुशायरा में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। मगर इस आयोजन के आरंभ होने के कुछ ही समय पहले इसके स्थगित होने का समाचार आ गया। हालांकि यह कहा गया कि कुछ अपरिहार्य कारणों के कारण इस आयोजन को बाद में आयोजित किया जाएगा, परंतु यह बात पूरी तरह से सत्य है कि जावेद अख्तर को लेकर दो इस्लामी संगठनों ने अपना विरोध दर्ज किया था।
जावेद अख्तर खुद को कहते हैं नास्तिक
जमीयत उलेमा-ए-हिंद और वाहियान फाउंडेशन ने श्री अख्तर को इस कार्यक्रम में अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने पर अपना विरोध व्यक्त किया था। यह सभी को पता है कि जावेद अख्तर नास्तिक होने पर गर्व महसूस करते हैं, जिसका ये समूह विरोध करते हैं।
कुछ दिनों पहले ही जमीयत ए हिन्द की कोलकता इकाई के महासचिव जिलुर रहमान आरिफ़ ने जावेद अख्तर को मुशायरा में मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था। उन्होनें उर्दू अकादमी को एक पत्र भेजकर यह अनुरोध किया था कि हालांकि यह अवसर कलकता के लिए बहुत ही गर्व का विषय है, परंतु जावेद अख्तर को आमंत्रित करके कई लोगों में असंतोष फैला है। जावेद अख्तर चूंकि कई बातें इस्लाम के खिलाफ बोलते रहते हैं और साथ ही मुस्लिमों के भी खिलाफ और अल्लाह के भी खिलाफ, और उन्होनें जावेद अख्तर को इंसान के भेष में शैतान कहा था। उन्होनें कहा था कि यह अनुरोध है कि जावेद अख्तर को इस आयोजन में न बुलाया जाए।
अभिव्यक्ति की आजादी पर कट्टरता भारी?
जावेद अख्तर को लेकर मुस्लिम कट्टरपंथी इसलिए नाराज हैं क्योंकि वे अक्सर तालिबान आदि के खिलाफ बोलते रहते हैं। हालांकि जावेद अख्तर भारत के मुगल शासकों के लिए बहुत अच्छा बोलते है और अकबर आदि की प्रशंसा करते रहते हैं। फिर भी जावेद अख्तर, चूंकि खुद को खुले आम नास्तिक कहते हैं, इसलिए वे इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं। और अब शायद बंगाल में चुनाव भी नजदीक हैं, तो यह भी हो सकता है कि बंगाल की सरकार न ही कथित धर्म निरपेक्ष वर्ग को नाराज करना चाहती है और न ही कट्टरपंथियों को। इसलिए उसने बीच का मार्ग चुना होगा, कि आयोजन को अपरिहार्य कारणों से स्थगित करवा दिया जाए।
इस निर्णय को लेकर हालांकि लोगों में निराशा का भाव है। पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी की सलाहकार बॉडी और जनरल कौंसिल की सदस्य गजाला यासमीन ने कहा कि वे इस आयोजन के स्थगित होने से निराश हैं, मगर उन्होनें आशा जताई कि बाद में किसी और तारीख पर और बेहतर आयोजन होगा।
सोशल मीडिया पर भी इस निर्णय को लेकर निराशा व्यक्त की जा रही है। मगर चूंकि यह निर्णय बंगाल का है, तो शायद इसका विरोध इस प्रकार नहीं होगा, जिस प्रकार से किसी और प्रांत में ऐसी किसी भी घटना के होने से होता।

















