आधुनिक समय में बटाला कस्बा अपने लौह उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। इस कस्बे की मिट्टी को लोहे की ढलाई के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, परन्तु यह शहर अपने को इतिहास के बहुत से पृष्ठों में भी समेटे है। उसी कारण यह नगर पंजाब के ऐतिहासिक शहर के नाम से विख्यात है। कुछ ऐतिहासिक पन्ने इसके दर्द को बयान करते हैं तो कुछेक पन्ने वे हैं जो सुनहरी अक्षरों में लिखे जा सकते हैं। उन्हीं में से एक पृष्ठ श्री गुरु नानक देव जी की शादी से सम्बन्धित है और यह ऐतिहासिक पृष्ठ यहां के नागरिकों में गर्व व हर्षोल्लास का भाव भरता है। श्री गुरु नानक देव जी के चरण-स्पर्श की कहानी इस शहर के नागरिकों को एक अद्भुत अनुभूति प्रदान करती है। बटाला श्री गुरु नानक देव जी का ससुराल घर है। उनका विवाह बटाला के श्री मूलचन्द खत्री व श्रीमती चन्दो रानी की बेटी बीबी सुलक्खनी से भादों सुदी सप्तमी सम्वत् 1544 (सन् 1487 ई.) को हुआ था।
श्री गुरु नानक देव जी तब सुल्तानपुर लोधी (जिला कपूरथला) में नवाब दौलत खाँ लोधी के मोदीखाने में नौकरी करते थे। उनका जन्म राय-भोय की तलवण्डी (श्री ननकाना साहिब) में हुआ था। पिता श्री मेहता कालू उनको बाकी सांसारिक पिताओं की तरह अच्छा कमाने वाला व्यक्ति देखना चाहते थे, परन्तु उनका मन अध्यात्म में ही लगा रहता था। वह हमेशा भक्ति व ईश्वरीय आराधना में ही लीन रहते थे। सच्चे सौदे की घटना से उनके पिता अपने पुत्र के भविष्य के बारे में बहुत चिन्तित रहने लगे थे तब श्री गुरु नानक देव जी की बड़ी बहन बेबे नानकी उनको सुल्तानपुर लोधी अपने पास ले आई थी।
बेबे नानकी ने गुरु नानक के आध्यात्मिक व्यक्तित्व को पहचाना
श्री गुरुनानक देव जी के जीजा श्री जयराम ने अपने प्रभाव से उनको मोदीखाने (भण्डार गृह) की नौकरी दिलाई थी। वे बेबे नानकी ही थीं जिसने सबसे पहले श्री गुरु नानक देव जी के अलौकिक व आध्यात्मिक व्यक्तित्व को पहचान लिया था। वह उनमें अगाध श्रद्धा व स्नेह रखती थीं। उनको यह बर्दाश्त नहीं था कि कोई भी, चाहे उनके माता-पिता भी, गुरु नानक देव जी को भला-बुरा कहें। बेबे नानकी पिता जी की व्यथिता को देखकर गुरु नानक जी को सुल्तानपुर लोधी अपने ससुराल घर ले आई थीं।
यहीं पर गुरु नानक देव जी की सगाई हुई और यहीं से उनकी बारात बटाला की ओर रवाना हुई। उनके पिता, चाचा व बेदी वंश के बाकी लोग तलवण्डी से सुल्तानपुर लोधी आये थे। पिता मेहता कालू राम अपने गाँव के पटवारी थे इसलिए काफी प्रभावशाली व अमीर व्यक्ति थे। इस कारण बारात में भी बड़े प्रभावशाली व्यक्ति शामिल थे। पिता कालू, जगत राय, जीजा जयराम, जीजा के पिता परमानन्द पलटे व नाना रामा इत्यादि प्रभावशाली व्यक्ति बारात के साथ चले थे। बटाला पहुंचने पर बीबी सुलक्खणी के पिता मूलचन्द चौणे, पक्खोके रन्धावा के चौधरी अजिता रन्धावा व चौणा बिरादरी के लोगों ने बारात का भव्य स्वागत किया।
श्री गुरु नानक देव जी जब शादी की रस्मों के शुरू होने से पहले आराम करने के लिए एक खुली जगह पर बैठे थे तो एक वृद्धा ने उनके पास आकर चेतावनी स्वरूप कहा कि बेटा जिस दीवार (कन्ध) के साये में आप बैठे हो, वह कभी भी गिर सकती है इसलिए कृपया इसके पास न बैठो। ये शब्द सुनकर कच्ची मिट्टी की बनी दीवार के पास बैठे हुए गुरु नानक देव जी ने कहा कि यह दीवार सदियों तक नहीं गिरेगी। आज भी वह दीवार बरकरार है।
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गुरु नानक देव जी की याद में वहां गुरुद्वारा ‘कन्ध साहिब’ निर्मित किया हुआ है और दीवार को भी शीशे की चादर से मढ़वा कर सुशोभित किया गया है। दूर-दूर से लोग गुरुद्वारा श्री कन्ध साहिब में उस इतिहास की साक्षी दीवार के दर्शन करने और गुरुवाणी का अमर सन्देश सुनने के लिए बड़ी संख्या में रो•ााना आते हैं। गुरुद्वारा श्री कन्ध साहिब के पास ही माता सुलक्खणी का घर है। वहां विवाह सम्बन्धी सारे रिति-रिवा•ा सम्पन्न हुए थे। आजकल वह स्थान गुरुद्वारा ‘डेरा साहिब’ के नाम से प्रसिद्ध है। संगत श्री गुरुद्वारा कन्ध साहिब से होकर गुरुद्वारा श्री डेरा साहिब के दर्शनों के लिए भी जाती है और अपने आप को धन्य महसूस करती है।
‘बाबे दा विवाह’ पर्व का इतिहास
हर साल बटाला में श्री गुरु नानक देव जी का विवाह पर्व ‘बाबे दा विवाह’ बड़ी धूम-धाम व हर्षोल्लास से मनाया जाता है। हर साल भाद्रपद महीने की शुक्ल (सुदी) सप्तमी को यह पर्व मनाया जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले कार्यक्रमों की छटा निराली होती है। परम्परागत मिठाइयों को भी लंगर में परोसा जाता है। शादी से दो दिन पहले एक नगर कीर्तन सुल्तानपुर लोधी की ओर गुरुवाणी का कीर्तन करते हुए रवाना होता है। दूसरे दिन सुल्तानपुर लोधी से एक भव्य बारात रूपी नगर कीर्तन निकलता है और बटाला की ओर रवाना होता है।
विवाह पर्व वाले दिन श्री गुरुद्वारा डेरा साहिब से श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पावन स्वरूप को पालकी में लेकर नगर कीर्तन निकलता है। नाम का सिमरन करते हुए संगत पीछे-पीछे चलती है। शहर में निकलते नगर कीर्तन में संगतों का शामिल होना जारी रहता है। ह•ाारों की संख्या में लोग शामिल होते जाते हैं। स्थान-स्थान पर नगर कीर्तन का भव्य स्वागत होता है। लंगरों व पानी की छबीलों की भरमार नजर आती है। सारा शहर एक मेले का स्वरूप धारण किये होता है। चारों ओर एक हर्षोल्लास व भक्ति का रंग नगर आता है।














