जिनपिंग ने मुर्मू को लिखी थी चिट्ठी! क्या ट्रंप की टैरिफ धमकियों का तोड़ साबित होगी भारत-चीन निकटता!
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जिनपिंग ने मुर्मू को लिखी थी चिट्ठी! क्या ट्रंप की टैरिफ धमकियों का तोड़ साबित होगी भारत-चीन निकटता!

आज 2025 में, दोनों देश एक बार फिर से संवाद और सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं। यह सहयोग केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि परिस्थितियां एक बहुध्रुवीय एशिया की ओर इशारा कर रही हैं

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Aug 29, 2025, 12:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (बाएं ) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (दाएं)।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (बाएं ) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (दाएं)।

भारत-चीन संबंधों में इधर कुछ समय से गतिविधियां तेज होती दिखी हैं। भारत से उच्च स्तरीय अधिकारियों और विदेश मंत्री का चीन जाना और बीजिंग से भी सकारात्मकता के संकेत आना इस बात की पुष्टि करता है कि 2020 में गलवान संघर्ष से पटरी से उतरे दोनों देशों के संबंधों में अब निखार आता जा रहा है। हाल में चीनी विदेश मंत्री वांग ली ने भारत आकर भविष्य की भूराजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए दोनों पक्षों के बीच समन्वय बढ़ाने की बात की है। संभव है, इसके पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समझ से परे टैरिफ बढ़ाने की नीति है, जो दोनों देशों पर समान रूप से असर डाल सकती है। हालांकि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसकी काट का रास्ता भी सामने रखा है जो है स्वदेशी का उपयोग और मेक इन इंडिया पर विशेष ध्यान देना। साथ ही भारत लगभग 40 देशों के साथ व्यापार की संभावनाएं भी खंगाल रहा है।

खास खबर इसमें यह भी है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने गत मार्च में भारत की राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के नाम एक पत्र भेजा था। उस पत्र के मिलने के बाद दोनों देशों के बीच वार्तालाप और सकारात्मक बयान आने लगे थे। बताया जा रहा है कि उस पत्र के माध्यम से चीन ने भारत को सहयोग के लिए प्रस्ताव भेजा था, जिसे तमाम आकलन के बाद मोदी सरकार ने भारत के हित में जानते हुए आगे बढ़ने का फैसला किया।

चीनी राष्ट्रपति का वह पत्र, जो पहले सार्वजनिक नहीं हुआ था, अब कुछ रिपोर्ट के अनुसार सामने आया है और भारत-चीन संबंधों को ठोस प्रयासों के जरिए पटरी पर लाने के संदर्भ में संकेत देता है। प्रधानमंत्री मोदी आज से तीन दिन बाद चीन में होंगे। वे विशेष रूप से शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं। मोदी का यह चीन दौरा उस पत्र की पृष्ठभूमि में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। कह सकते हैं, यह यात्रा गलवान संघर्ष (2020) के बाद दोनों देशों के बीच पहली उच्चस्तरीय भेंट होगी, जो विश्वास बहाली की दिशा में एक बड़े कदम के तौर पर देखी जा रही है।

जयशंकर और शी जिनपिंग (File Photo)

अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ाए हैं, जबकि टैरिफ में चीन को कुछ राहत दी गई है। ट्रंप का मानना है कि उनका यह कदम भारत के लिए आर्थिक दबाव का कारण बनेगा और वह रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश और व्यापार नीति पर चलते हुए ऐसा करने का कोई संकेत नहीं दिया है।

ऐसे में चीन का भारत के साथ सहयोग करने को लालायित होना भूराजनीति के बदलते समीकरणों की ओर भी इशारा करता है। भारत का चीन से निकटता बढ़ाता एक रणनीतिक कदम बन सकता है, जिससे अमेरिका को संदेश जाए कि भारत बहुपक्षीय विकल्पों को अपनाने में सक्षम है।

वांग यी और प्रधानमंत्री मोदी (File Photo)

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के प्रमुख औद्योगिक समूह, जैसे रिलायंस, अदानी और जेएसडब्ल्यू चीनी कंपनियों के साथ स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी की संभावनाएं तलाश रहे हैं। यह सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित संक्रमण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। चीन की तकनीकी दक्षता और भारत की मांग—दोनों मिलकर वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक नया मॉडल प्रस्तुत कर सकते हैं।

जल्दी ही भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानों को पुनः शुरू करने की योजना है, जिसके बारे में उच्च स्तरीय घोषणा हो चुकी है। ये उड़ानें कोविड-19 के बाद पहली बार दोनों देशों को फिर से जोड़ सकती है। चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा पर भी नए सिरे से विचार हो रहा है, जिससे सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

एनएसए अजित डोवल और राष्ट्रपति शी (File Photo)

ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि क्या भारत-चीन निकटता अमेरिका की टैरिफ धमकियों को संतुलित कर सकती है? 2014 से मोदी सरकार के तहत भारत की विदेश नीति स्वतंत्र रही है। चीन के साथ सहयोग बढ़ाना इस नीति का विस्तार हो सकता है, लेकिन इसे अमेरिका के प्रतिकार के तौर पर भी देखा जा सकता है। अमेरिका के टैरिफ भारत को चीन के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, लेकिन यह सहयोग सीमित और क्षेत्रीय हो सकता है। वैसे, भारत अभी भी क्वाड, आईपीईएफ और अन्य अमेरिकी-प्रभावित मंचों का हिस्सा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत किसी एक ध्रुव की ओर झुकने को तैयार नहीं है और अपने राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रखता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से भारत और चीन के संबंधों का आकलन करें तो दोनों देशों के बीच 1950 में राजनयिक संबंधों की शुरुआत हुई थी। लेकिन नेहरू सरकार के दौरान 1962 में चीन ने भारत पर युद्ध थोपा था। इसके बाद 1988 में राजीव गांधी की चीन यात्रा हुई। फिर 2020 में गलवान संघर्ष ​देखने में आया। इन सभी घटनाक्रमों से गुजरते हुए भारत-चीन संबंध आगे बढ़े हैं।

आज 2025 में, दोनों देश एक बार फिर से संवाद और सहयोग की ओर बढ़ रहे हैं। यह सहयोग केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि परिस्थितियां एक बहुध्रुवीय एशिया की ओर इशारा कर रही हैं जिनमें भारत एक प्रभावी भूमिका में आता दिख रहा है। भारत-चीन निकटता अमेरिका के टैरिफ के सामने एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकती है, जो भारत को वैश्विक मंच पर अधिक लचीलापन और स्वायत्तता प्रदान करता है। हालांकि, भारत को आगे कदम फूंक—फूंक कर रखने होंगे। लेकिन विशेषज्ञ कहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी तथा विदेश मंत्री जयशंकर कूटनीति के गहन जानकार हैं इसलिए वे जानते हैं, किसके साथ कितना लचीला होना है। ट्रंप इस बाबत बखूबी जान गए होंगे।

Topics: Jaishankarभारत चीन संबंधराष्ट्रपति शी जिनपिंगPresident Xi Jinpingindo china relationsamerican tariffPM Modiप्रधानमंत्री मोदीअमेरिकाtrumpSCO summit
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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