नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला में सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने सभागार में उपस्थित लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि शुद्ध सात्विक प्रेम ही संघ है। यही अपने कार्य का आधार है। विरोध बहुत कम हो गया है और जो है उसकी धार कुंद हो गई है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि अनुकूलता मिली है, तो सुविधाभोगी नहीं होना है। आराम नहीं करना है। संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने के लक्ष्य को पाने तक सतत चलते रहना है। सज्जन लोगों से मैत्री करना है। दुर्जनों से घृणा नहीं करना, उनकी करुणा करना। संघ में इन्सेंटिव नहीं है, डिसइन्सेंटिव बहुत है। संघ में आकर तुमको कुछ नहीं मिलेगा जो पास है वो भी चला जाएगा ऐसा मैं कहता हूं। हम जो कर रहे हैं, वो अनुभव की बात है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि धर्म यानी रिलिजन नहीं। पूजा पाठ से परे धर्म है। धर्म संतुलन सिखाता है, हमें भी जीना है और समाज को भी जीना है। धर्म बैलेंस है, वह किसी एक्स्ट्रीमिटी पर जाने नहीं देता।

















