पाकिस्तान का सबसे बड़ा और संसाधन-समृद्ध प्रांत बलूचिस्तान में आक्रोश का उफान लगातार बढ़ता जा रहा है। आज वह प्रांत वैश्विक भू-राजनीति की रस्साकशी का केंद्र बनता दिख रहा है, जहां पाकिस्तान के कंधे पर सवार होकर चीन और अब अमेरिका भी वहां मौजूद खनिज संपदा—विशेष रूप से दुर्लभ मृदा तत्व जिन्हें अंग्रेजी में Rare Earth Elements कहते हैं, के पीछे पड़ गया दिखता है। ये दुर्लभ मृदा तत्व, जैसे डिस्प्रोसियम, टर्बियम और यिट्रियम—आधुनिक तकनीक, रक्षा प्रणालियों और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अनुमान है कि बलूचिस्तान में 6 से 8 खरब डॉलर मूल्य की खनिज संपदा छिपी हुई है। यही कारण है कि चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों की नजरें इस क्षेत्र पर गढ़ गई हैं। पाकिस्तान की वैश्विक समुदाय में खास कोई हैसियत नहीं है इसलिए उसे गफलत में डालकर चीन उस देश में अपनी मनमानी करता ही आ रहा है, लेकिन अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी चीन की देखादेखी जिन्ना के देश पर डोरे डाल रहे हैं।
लेकिन बलूचिस्तान के बलूच इससे खुश नहीं हैं। राजनीतिक दलों के अलावा वहां बलूचों के विद्रोही संगठन भी खड़े हुए और उन्होंने अपने तरीके से जिन्ना के देश से आजाद होने की बात करते हुए उसकी नाक में दम कर रखा है। उन्हीं में से एक विद्रोही संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट ने कल एक तीखा बयान जारी किया है, जिसमें साफ कहा गया है कि बलूचिस्तान के संसाधनों पर नजर डालने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। संगठन का दावा है कि बलूच स्वतंत्रता संग्राम कोई ‘आतंकवादी आंदोलन’ नहीं है, बल्कि यह तो आत्मनिर्णय और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए चल रहा संघर्ष है। संगठन ने अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और अन्य देशों को चेतावनी दी है कि पाकिस्तान के साथ मिलकर बलूचिस्तान में निवेश करने वाले विदेशी ताकतों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
सब जानते हैं कि चीन ने बलूचिस्तान में भारी निवेश किया है, विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत वहां अनेक परियोजनाएं चल रही हैं। ग्वादर बंदरगाह और रेको डिक जैसी परियोजनाएं जिन्ना के देश पर चीन की रणनीतिक पकड़ को दर्शाती हैं। हालांकि, बलूच विद्रोही इन परियोजनाओं को नव-औपनिवेशिक बताते हैं और लगातार चीनी हितों पर हमले करते रहे हैं।
हाल ही में अमेरिका ने जिन्ना के देश के सेना प्रमुख ‘फील्ड मार्शल’ असीम मुनीर को अपने प्रभाव में लेकर उस देश के साथ खनिज समझौते किए हैं, जिससे बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट की नाराजगी बढ़नी स्वाभाविक ही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की रणनीति चीन के प्रभाव को संतुलित करने की है, लेकिन इसके लिए उसे बलूचिस्तान की अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा।
अमेरिकी कंपनियां फिलहाल बहुत संभल कर कदम उठा रही हैं, लेकिन भू-राजनीतिक रस्साकशी उन्हें आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर सकती है।
यह कोई छुपी बात नहीं है कि बलूचिस्तान दशकों से हिंसा, सैन्य कब्जे और मानवाधिकार उल्लंघनों का शिकार रहा है। स्थानीय समुदायों का मानना है कि बाहरी ताकतें उनके संसाधनों का दोहन कर रही हैं, जबकि उन्हें उसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है। सारा पैसा इस्लामाबाद में डकार लिया जा रहा है और उनके यहां बेरोजगारी और महंगाई, बुनियादी जरूरतों का अभाव है जिस पर सत्ता में आने वाले नेता ध्यान नहीं देते। रेको डिक और साइंदक जैसी परियोजनाओं से स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिला, उनको कोई विकास नहीं हुआ, बल्कि इलाके में चीनियों और फौजियों की आवाजाही और अनैतिकता ही बढ़ी है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचा, सो अलग।
बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और अन्य विद्रोही गुटों का विरोध केवल जिन्ना के देश की सरकार से नहीं है, बल्कि उन विदेशी ताकतों से भी है जो पाकिस्तान के साथ मिलकर उनके इलाके के संसाधनों का दोहन करना चाहते हैं। उनका संघर्ष आत्मनिर्णय, सांस्कृतिक पहचान और संसाधनों पर स्वदेशी अधिकार के लिए है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए, बलूचिस्तान में संसाधनों का दोहन करना चीन और अमेरिका दोनों के लिए आसान नहीं होगा। यहां की अस्थिरता, स्थानीय प्रतिरोध और सुरक्षा के खतरे किसी भी निवेश को जोखिम में डालने वाले हैं। चीन के अनेक नागरिक पहले ही बलूच विद्रोहियों के हमलों के शिकार बन चुके हैं। बेशक, अमेरिका को भी इसी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
कहना न होगा कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान एक ऐसा क्षेत्र है जहां भू-राजनीतिक महत्व और स्थानीय असंतोष में भीषण टकराहट है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा आहत स्थानीय आवाजों को नजरअंदाज करना भी इस संघर्ष को और गहरा रहा है। यहां से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तभी संभव होगा जब स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए और उनके अधिकारों का सम्मान किया जाए।
साफ है कि बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट की चेतावनी केवल एक बयान नहीं, बल्कि उस गहरे असंतोष की झलक है जो दशकों से उबल रहा है। यदि वैश्विक शक्तियां इस क्षेत्र को केवल एक ‘खजाने’ के रूप में देखेंगी, तो बयान के अनुसार, उन्हें बलूच प्रतिरोध का सामना करना ही पड़ेगा। चीन और अमेरिका के लिए यह एक कूटनीतिक परीक्षा हो सकती है।

















