राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ सरिता के ‘भगीरथ’ श्रीगुरुजी
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ सरिता के ‘भगीरथ’ श्रीगुरुजी

आज समाज जीवन के प्राय: हर क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य है। इसके लिए अनेक आनुषंगिक संगठन हैं। इन ज्यादातर संगठनों की नींव श्रीगुरुजी के कार्यकाल में रखी गई थी

Written byविजय कुमारविजय कुमार
Aug 22, 2025, 07:22 am IST
inभारत, विश्लेषण, संघ @100
RSS के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी

RSS के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी का जन्म 19 फरवरी, 1906 (फा.कृ.11, विजया एकादशी) को नागपुर में अपने ननिहाल में हुआ था। नौ भाई-बहनों के बीच एकमात्र जीवित बचे माधव के पिता श्री सदाशिव गोलवलकर अध्यापक थे। माधव की प्रतिभा बचपन से ही प्रकट होने लगी थी। उन्होंने सब परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से जीव विज्ञान में एम.एससी. कर वे मद्रास में शोध करने लगे; पर वहां का मौसम उन्हें अनुकूल नहीं था। अतः वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने। उनकी पढ़ाने की अनुपम शैली, सादा जीवन और छात्रों के प्रति प्रेम के कारण सब उन्हें ‘गुरुजी’ कहने लगे।

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

इसी दौरान वे संघ से परिचित हुए। संघ के विचार, कार्यप्रणाली तथा डॉ. हेडगेवार से वे बहुत प्रभावित हुए। श्रीगुरुजी एक आध्यात्मिक विभूति थे। नागपुर में वे रामकृष्ण मिशन के संपर्क में भी थे। बंगाल के सारगाछी आश्रम में उन्होंने विवेकानंद के गुरु भाई स्वामी अखंडानंद से दीक्षा ली; पर इसके कुछ ही दिन बाद स्वामी जी का देहांत हो गया। अतः वे नागपुर आकर संघ को समर्पित हो गए। 1940 में डॉ. हेडगेवार के देहांत के बाद वे सरसंघचालक बने। उनके कार्यकाल में संघ पर न केवल बाह्य, अपितु आंतरिक रूप से भी भारी संकट आया। इस तूफान से उन्होंने संगठन की नाव को कैसे निकाला, यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

नेहरू ने लगाया प्रतिबंध

1940 में जब वे सरसंघचालक बने, तब संघ का काम देश के हर राज्य में पहुंच चुका था। विभाजन की आशंका से ग्रस्त पंजाब और सिंध में प्रायः सभी नगरों और बड़े गांवों में शाखा लगती थी। हर शाखा पर औसत दो-ढाई सौ युवक आते थे। विभाजन के दौर में स्वयंसेवकों ने पंजाब में हिंदू और सिखों को सुरक्षित भारत लाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पर जब संघ विस्थापितों की सेवा एवं पुनर्वास में लगा था, तब एक भारी संकट आन पड़ा था।
30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की हत्या कर दी। नाथूराम का संघ से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था; पर नेहरू जी ने इस कांड में संघ को लपेट लिया। वस्तुतः वे संघ की बढ़ती शक्ति से चिंतित थे। उन्हें लगता था कि संघ सत्ता पर कब्जा करना चाहता है अतः वे उसे कुचलना चाहते थे। उन्होंने संघ पर प्रतिबंध लगा कर श्रीगुरुजी को जेल भेज दिया।

श्रीगुरुजी ने पत्र लिखकर उन्हें समझाने का प्रयास किया। सरदार पटेल जानते थे कि संघ निर्दोष है; पर वे भी नेहरू जी की जिद के आगे बेबस थे। वामपंथी सोच वाले नेहरू जी को लगता था कि संघ के रहते वे भारत को रूस की कार्बन कॉपी नहीं बना सकते। इसलिए उन्होंने श्रीगुरुजी से मिलना तो दूर, उनके पत्रों के उत्तर तक नहीं दिए।

मजबूर होकर संघ ने सत्याग्रह का सहारा लिया। हजारों स्वयंसेवक जेल गए। न्यायालय ने भी संघ को निर्दोष बताया। अब लोग पूछने लगे कि संघ का दोष क्या है? तब नेहरू जी ने संघ का संविधान न होने का बहाना बनाया। इस पर संघ ने अपना संविधान दे दिया। अतः प्रतिबंध हटाना पड़ा। इस प्रकार संघ पर बाहर से थोपे संकट का अंत हुआ। श्रीगुरुजी ने कार्यकर्ताओं से सब बातें भूलकर शाखा विस्तार में शक्ति लगाने को कहा।

29 अगस्त, 1964 को सांदीपनि आश्रम, मुंबई में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के समय (बाएं से) स्वामी चिन्मयानंद जी, श्रीगुरुजी, श्री दादा साहेब आप्टे, संत तुकड़ो जी महाराज और परम पूज्य शंकराचार्य

उन्होंने पूरे देश का प्रवास कर संगठन में नए प्राण फूंके; पर इसी दौरान एक नया संकट उनकी प्रतीक्षा कर रहा था, जो बाहर नहीं, अंदर से आया था। अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के मन में यह प्रश्न घूम रहा था कि निरपराध होते हुए भी संघ पर प्रतिबंध लगा; पर संसद में कोई नहीं बोला। अतः अब संघ को राजनीतिक दल के रूप में काम करना चाहिए; पर श्रीगुरुजी का स्पष्ट मत था कि यदि हिंदू समाज सबल नहीं हुआ, तो कल कोई दूसरा दल या नेता भी निरंकुश हो सकता है। जब कुछ कार्यकर्ताओं ने बहुत जिद की तो उन्होंने साफ कह दिया कि ‘मुझे डॉ. हेडगेवार ने शाखा चलाने के लिए सरसंघचालक बनाया है इसलिए मैं तो यही करूंगा। जिन्हें दूसरा मार्ग पसंद है, वे इसके लिए स्वतंत्र हैं। यदि सब लोग भी संघ छोड़ देंगे, तो मैं नए सिरे से शुरू करूंगा।’ उनका प्रसिद्ध वाक्य है-I shall begain from the begaing. इतिहास साक्षी है कि उनकी बात सत्य सिद्ध हुई।

दूरदर्शी व्यक्तित्व

आगे चलकर भारत में अनेक राजनीतिक दल बने; पर अधिकांश भ्रष्टाचार, वंशवाद, अपराधीकरण और मुस्लिम तुष्टीकरण की राह पर चल रहे हैं। स्वयंसेवक भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करते हुए राजनीति में जाएं, इससे वे सहमत थे। इसलिए जब डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, तो उनके आग्रह पर श्रीगुरुजी ने नानाजी देशमुख, पं. दीनदयाल उपाध्याय, सुंदर सिंह भंडारी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कार्यकर्ता उन्हें दिए। डॉ. मुखर्जी के असमय निधन से जनसंघ की बागडोर पूरी तरह इन लोगों के हाथ में आ गयी। इस दौरान अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता संघ छोड़ गए। आगे चलकर प्रायः उन सबको अपनी भूल अनुभव हुई। वे फिर से संघ के काम में लगे; पर उस समय जो क्षति हुई, उसकी पूर्ति नहीं हो पाई।

इस संकट में भी श्रीगुरुजी ने संघ की नौका को सकुशल पार कराया। देश में सतत भ्रमण के दौरान कार्यकर्ताओं से उनकी भेंट होती थी। देश की दशा और दिशा के प्रति वे सदा जागरूक रहते थे। अतः उन्होंने स्वयंसेवकों को समाज जीवन के अनेक नए क्षेत्रों में काम के लिए प्रेरित किया। आज संघ की प्रेरणा से चल रहे अनेक बहुचर्चित संगठनों की स्थापना उन दिनों ही हुई थी। विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्र सेविका समिति, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती.. आदि ऐसे अनेक नाम हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में आज शीर्ष पर हैं। यह श्रीगुरुजी की दूरदर्शिता का ही सुपरिणाम है।

Topics: वनवासी कल्याण आश्रमपाञ्चजन्य विशेषद्वितीय सरसंघचालकश्रीगुरुजीमाधवराव सदाशिवराव गोलवलकरअखिल भारतीय विद्यार्थी परिषदविश्व हिंदू परिषदविद्या भारतीकाशी हिंदू विश्वविद्यालयडॉ. हेडगेवारराष्ट्र सेविका समितिभारतीय मजदूर संघ
विजय कुमार
विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ [Read more]
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