आगामी 23 से 29 अगस्त को भारत में पूर्वनिर्धारित भारत—अमेरिका व्यापार वार्ता अब स्थगित कर दी गई है। अमेरिका स्थित सूत्रों के अनुसार, अब इस वार्ता की नई तारीखें घोषित की जाएंगी। इस कदम से दो दिन पहले वरिष्ठ अमेरिकी सलाहकार पीटर नवारो द्वारा भारत को रूस से तेल खरीद बंद करने की घुड़की दी गई थी। ये दोनों परिदृश्य बताते हैं कि अमेरिकी प्रशासन भारत की स्वाभिमानी और स्वतंत्र विदेश नीति को लेकर मन मसोसे बैठा है और चाहता है कि व्यापार के क्षेत्र में भारत रूस से पर्याप्त दूरी बना ले। हालांकि भारत एक नहीं, अनेक मौकों पर कह चुका है कि सभी फैसले राष्ट्रीय हित को देखते हुए लिए जाते हैं और हम अपनी विदेश नीति पर कोई दबाव स्वीकार नहीं करेंगे।
अगस्त के अंत में दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार वार्ता को अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की ओर से रद्द करने के पीछे कारण जो भी बताए जा रहे हों, लेकिन यह तो साफ दिख रहा है कि ट्रंप प्रशासन भारत को अपनी थानेदारी दिखाना चाहता है और भारत इस स्वीकारने के लिए किसी सूरत में तैयार नहीं है। भारत द्वारा रूस से तेल आयात जारी रखने और अमेरिका द्वारा भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाकर कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंचाने के पीछे अमेरिका की एकतरफा जिद है।
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जिस प्रकार से जोर दिया था वह इस संदर्भ में एक दूरगामी संकेत माना जा रहा है। यह हो सकता है कि 50 प्रतिशत टैरिफ से भारत के निर्यातकों पर दबाव बढ़े और उन्हें अपने माल के लिए अन्य बाजार खंगालने पड़ें, विशेषकर टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स और फार्मा सेक्टर में। लेकिन मोदी सरकार का स्वदेशी का संकल्प देखकर लगता है, मुश्किल का दौर ज्यादा नहीं टिकने वाला है। भारत को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अब अधिक रणनीतिक प्रयास करने होंगे।

जैसा पहले बताया, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत को बेमांगी ‘सलाह’ देते हुए कहा है कि अगर उसे अमेरिका का रणनीतिक साझेदार बने रहना है, तो रूस से तेल खरीदना बंद करना होगा। ट्रंप की तरह नवारो का भी वही घिसा—पिटा तर्क है कि भारत की इस खरीद से रूस को यूक्रेन युद्ध जारी रखने के लिए वित्तीय सहायता मिल रही है। भारत ने पहले भी साफ कहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है और रूस से तेल खरीदना उसकी संप्रभु नीति का हिस्सा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा बयान जारी करके अमेरिका की टैरिफ नीति को “अनुचित और अतार्किक” बताया है।
उधर अमेरिका को भारत-चीन के बीच बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियों पर भी आपत्ति है। प्रधानमंत्री मोदी का शी जिनपिंग से संभावित मुलाकात इस असंतोष को और बढ़ा सकती है। आज 18 अगस्त को चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत आ रहे हैं, जिनके एजेंडे में आपसी रिश्तों की सलवटें दूर करना, सीमा विवाद को तार्किक परिणति तक ले जाना और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे विषय शामिल हैं। यह बात भी ट्रंप प्रशासन को जरूर चुभ रही होगी। हालांकि अपनी ओर से राष्ट्रपति ट्रंप भी ऐसे संकेत दे चुके हैं कि वह चीन के साथ संबंधों को पटरी पर लाने के इच्छुक हैं।
ऐसा नहीं है कि अमेरिका ने भारत पर ही टैरिफ थोपे हैं। भारत के अलावा कई अन्य देशों पर भी अमेरिका की ओर से टैरिफ बढ़ाए गए हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि भारत को ‘सलाहें’ देने वाले ट्रंप प्रशासन ने रूस के साथ अपना व्यापार 20 प्रतिशत बढ़ाया ही है। ऐसे में विशेषज्ञ स्वाभाविक ही उसकी नीति पर सवाल उठा रहे हैं।

भारत ने डेयरी और जीएम फसलों पर सख्त रुख बनाए रखा है और ऑटोमोबाइल सेक्टर में सीमित छूट देने की बात कही है। मोदी सरकार अक्तूबर-नवंबर तक पहले चरण के व्यापार समझौते के सिरे चढ़ने की उम्मीद कर रही है, लेकिन ऐसा न होने की सूरत में जो हो सकता है, उसके लिए भी तैयार हो चुकी है। इस माहौल में भारत के लिए अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखना भी आवश्यक है, ताकि रणनीतिक साझेदारी को बनी रह सके।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का स्थगित होना केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी से जुड़ा एक जटिल विषय है। भारत सरकार संतुलन साधते हुए अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रही है और इस संदर्भ में भारत के नगारिक सरकार के साथ खड़े हैं। लेकिन भारत को अमेरिका के साथ सहयोग के रास्ते भी खुले रखने होंगे, क्योंकि यह रणनीतिक और कूटनीतिक आवश्यकता है।

















